भारतकोश
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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

तृतीय मुण्डक (प्रथम खण्ड) - द्वा सुपर्णा व सत्यमेव जयते

तृतीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

प्रकारान्तरसे ब्रह्मनिरूपण

परा विद्योक्ता यया तदक्षरं पुरुषाख्यं सत्यमधिगम्यते । यदधिगमे हृदयग्रन्थ्यादिसंसारकारणस्यात्यन्तिकविनाशः स्यात् । तद्दर्शनोपायश्च योगो धनुराद्युपादानकल्पनयोक्तः । अथेदानीं तत्सहकारीणि सत्यादिसाधनानि वक्तव्यानीति तदर्थमुत्तरारम्भः । प्राधान्येन तत्त्वनिर्धारणं च प्रकारान्तरेण क्रियते अत्यन्तदुरवगाह्यत्वात्कृतमपि । तत्र सूत्रभूतो मन्त्रः परमार्थवस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्यते—जिससे उस अक्षर पुरुषसंज्ञक सत्यका ज्ञान होता है उस परा विद्याका वर्णन किया गया, जिसका ज्ञान होनेपर हृदयग्रन्थि आदि संसारके कारणका आत्यन्तिक नाश हो जाता है । तथा धनुर्ग्रहण आदिकी कल्पनासे उसके साक्षात्कारके उपाय योगका भी उल्लेख किया गया । अब उसके सहकारी सत्यादि साधनोंका वर्णन करना है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । यद्यपि ऊपर तत्त्वका निश्चय किया जा चुका है तो भी अत्यन्त दुर्बोध होनेके कारण उसका प्रधानतासे दूसरी तरह फिर निश्चय किया जाता है । अतः परमार्थवस्तुको समझनेके लिये पहले इस सूत्रभूत मन्त्रका उपन्यास (उल्लेख) करते हैं—

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३


समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥

साथ-साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी एक ही वृक्षका आश्रय करके रहते हैं । उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है ॥ १ ॥


द्वा द्वौ सुपर्णा सुपर्णौ शोभनपतनौ सुपर्णौ पक्षिसामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा सयुजौ सहैव सर्वदा युक्तौ सखाया सखायौ समानाख्यानौ समानाभिव्यक्तिकारणावेवंभूतौ सन्तौ समानम् अविशेषोपलब्ध्यधिष्ठानतयैकं वृक्षं वृक्षमिवोच्छेदनसामान्याच्छरीरं[जीव और ईश्वररूप] दो सुपर्ण—सुन्दर पर्णवाले अर्थात् [नियम्य-नियामकभावकी प्राप्तिरूप] शोभन पतनवाले* अथवा पक्षियोंके समान [वृक्षपर निवास तथा फलभोग करनेवाले] होनेसे सुपर्ण—पक्षी तथा संयुज—सर्वदा साथ-साथ ही रहनेवाले और सखा यानी समान आख्यानवाले अर्थात् जिनकी अभिव्यक्तिका कारण समान है ऐसे दो सुपर्ण समान—सामान्यरूपसे [दोनोंकी] उपलब्धिका कारण होनेसे एक ही वृक्ष—वृक्षके समान उच्छेदमें समानता होनेके कारण शरीररूप

* ईश्वर सर्वज्ञ होनेके कारण नियामक है तथा जीव अल्पज्ञ होनेसे नियम्य है । इसलिये उनमें नियम्य-नियामकभावकी प्राप्ति उचित ही है ।

८४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३ ]


वृक्षं परिषस्वजाते परिष्वक्त-वृक्षपर आलिङ्गन किये हुए हैं,
वन्तौ सुपर्णाविवैकं वृक्षं फलोप-अर्थात् फलोपभोगके लिये पक्षियोंके
भोगार्थम् ।समान एक ही वृक्षपर निवास करते हैं ।
अयं हि वृक्ष ऊर्ध्वमूलोऽवा-अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ
क्शाखोऽश्वत्थोऽव्यक्तमूलप्रभवःसम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलका आश्रय-
क्षेत्रसंज्ञकः सर्वप्राणिकर्मफला-भूत यह क्षेत्रसंज्ञक अश्वत्थवृक्ष
श्रयस्तं परिष्वक्तौ सुपर्णाविवा-ऊपरको मूल और नीचेकी ओर
विद्याकामकर्मवासनाश्रयलिङ्गो-शाखाओंवाला है । उस वृक्षपर
पाध्यात्मेश्वरौ । तयोः परिष्वक्त-अविद्या, काम, कर्म और वासनाके
योरन्य एकः क्षेत्रज्ञो लिङ्गो-आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप उपाधिवाले
पाधिवृक्षमाश्रितः पिप्पलं कर्म-जीव और ईश्वर दो पक्षियोंके समान
निष्पन्नं सुखदुःखलक्षणं फलंआलिङ्गन किये निवास करते हैं ।
स्वाद्वनेकविचित्रवेदनास्वादरूपंइस प्रकार आलिङ्गन करके रहने-
स्वाद्वत्ति भक्षयत्युपभुङ्क्तेऽविवे-वाले उन दोनोंमेंसे एक—
कतः । अनश्नन्नन्य इतर ईश्वरोलिङ्गोपाधिरूप वृक्षको आश्रित
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सर्वज्ञःकरनेवाला क्षेत्रज्ञ पिप्पल यानी
सर्वसत्त्वोपाधीरीश्वरो नाश्नाति ।अपने कर्मसे प्राप्त होनेवाला सुख-
प्रेरयिता ह्यसावुभयोर्भोज्य-दुःखरूप फल, जो अनेक प्रकारसे विचित्र अनुभवरूप स्वादके कारण स्वादु है, खाता—भक्षण करता यानी अविवेकवश भोगता है । किन्तु अन्य—दूसरा, जो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप सर्वज्ञ मायोपाधिक ईश्वर है, उसे ग्रहण न करता हुआ नहीं भोगता । यह तो साक्षित्वरूप सत्तामात्रसे भोक्ता और

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


भोक्त्रोर्नित्यसाक्षित्वसत्तामात्रेण । स त्वनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति पश्यत्येव केवलम् । दर्शनमात्रं हि तस्य प्रेरयितृत्वं राजवत् ॥१॥भोग्य दोनोंका प्रेरक ही है । अतः वह दूसरा तो फल-भोग न करके केवल देखता ही है—उसका प्रेरकत्व तो राजाके समान केवल दर्शनमात्र ही है ॥ १ ॥

ईश्वरदर्शनसे जीवकी शोकनिवृत्ति

तत्रैवं सति—अतः ऐसा होनेसे—

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य
महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥

[ ईश्वरके साथ ] एक ही वृक्षपर रहनेवाला जीव अपने दीन-स्वभावके कारण मोहित होकर शोक करता है । वह जिस समय [ ध्यानद्वारा ] अपनेसे विलक्षण योगिसेवित ईश्वर और उसकी महिमा [ संसार ] को देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥

समाने वृक्षे यथोक्ते शरीरे पुरुषो भोक्ता जीवोऽविद्याकाम-कर्मफलरागादिगुरुभाराक्रान्तो-ऽलाबुरिव सामुद्रे जले निमग्नो निश्चयेन देहात्मभावमापन्नोऽयम् एवाहममुष्य पुत्रोऽस्य नप्ता कृशःसमान वृक्षपर यानी पूर्वोक्त शरीरमें अविद्या, कामना, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होकर समुद्रके जलमें डूबे हुए तूँवेके समान निमग्न—निश्चयपूर्वक देहात्मभावको प्राप्त हुआ यह भोक्ता जीव 'मैं यही हूँ', 'मैं अमुकका पुत्र हूँ', 'इसका नाती हूँ', 'कृश हूँ',

८६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


स्थूलो गुणवान्निर्गुणः सुखी दुःखीत्येवंप्रत्ययो नास्त्यन्योऽस्मादिति जायते म्रियते संयुज्यते वियुज्यते च सम्बन्धिबान्धवैः ।<br><br>अतोऽनीशया न कस्यचित् समर्थोऽहं पुत्रो मम विनष्टो मृता मे भार्या किं मे जीवितेनेत्येवं दीनभावोऽनीशा तया शोचति सन्तप्यते मुह्यमानोऽनेकैरनर्थप्रकारैरविवेकतया चिन्तामापद्यमानः।<br><br>स एवं प्रेततिर्यङ्मनुष्यादियोनिष्वाजवं जवीभावमापन्नः कदाचिदनेकजन्मसु शुद्धधर्मसञ्चितनिमित्ततः केनचित्परमकारुणिकेन दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्मचर्यसर्वत्यागशमदमादिसम्पन्नः समाहितात्मा सन् जुष्टं सेवितमनेकैर्योगाग्मैः'स्थूल हूँ', 'गुणवान् हूँ', 'गुणहीन हूँ', 'सुखी हूँ', 'दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारके प्रत्ययोंवाला होनेसे तथा 'इस देहसे भिन्न और कुछ नहीं है' ऐसा समझनेके कारण उत्पन्न होता, मरता एवं अपने सम्बन्धियोंसे मिलता और बिछुड़ता रहता है।<br><br>अतः अनीशावश—'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया और स्त्री भी मर गयी, अब मेरे जीवनसे क्या लाभ है ?'—इस प्रकारके दीनभावको अनीशा कहते हैं, उससे युक्त होकर अविवेकवश अनेकों अनर्थमय प्रकारोंसे मोहित अर्थात् आन्तरिक चिन्ताको प्राप्त हुआ वह शोक यानी सन्ताप करता रहता है।<br><br>इस प्रकार प्रेत, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें निरन्तर लघुताको प्राप्त हुआ वह जिस समय अनेकों जन्मोंमें कभी अपने शुद्ध धर्मके सञ्चयके कारण किसी परम कारुणिक गुरुके द्वारा योगमार्ग दिखलाये जानेपर अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग और शम-दमादि-से सम्पन्न तथा समाहितचित्त होकर ध्यान करनेपर अनेकों योगमार्गों और

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७


कर्मभिश्च यदा यस्मिन्काले पश्यति ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणाद्विलक्षणमीशमसंसारिणम् अशनायापिपासाशोकमोहजरामृत्यतीतमीशं सर्वस्य जगतोऽयमहमस्म्यात्मा सर्वस्य समः सर्वभूतस्थो नेतरोऽविद्याजनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मेति विभूतिं महिमानं च जगद्रूपम् अस्यैव मम परमेश्वरस्येति यदैवं द्रष्टा तदा वीतशोको भवति सर्वस्माच्छोकसागराद्विप्रमुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः ॥ २ ॥कर्मोंद्वारा सेवित अन्य—वृक्षरूप उपाधिसे विलक्षण ईश्वर यानी भूख, प्यास, शोक, मोह और जरा-मृत्यु आदिसे अतीत संसारधर्मशून्य सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामीको 'मैं यह सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सबके लिये समान आत्मा ही हूँ, अविद्याजनित उपाधिसे परिच्छिन्न दूसरा मायात्मा नहीं हूँ' इस प्रकार देखता है तथा उसकी महिमा यानी जगत्रूप विभूतिको 'यह इस परमेश्वरस्वरूप मेरी ही है' इस प्रकार [जानता है] उस समय वह शोकरहित हो जाता है—सम्पूर्ण शोकसागरसे मुक्त हो जाता है अर्थात् कृतकृत्य हो जाता है ॥२॥
अन्योऽपि मन्त्र इममेवार्थमाह सविस्तरम्—दूसरा मन्त्र भी इसी बातको विस्तारपूर्वक बतलाता है—

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं

कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।

तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय

निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥

जिस समय द्रष्टा सुवर्णवर्ण और ब्रह्माके भी उत्पत्तिस्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुषको देखता है उस समय वह विद्वान् पाप-पुण्य दोनोंको त्यागकर निर्मल हो अत्यन्त समताको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥

८८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


यदा यस्मिन्काले पश्यः पश्यतीति विद्वान्साधक इत्यर्थः। पश्यते पश्यति पूर्ववद्रुक्मवर्णं स्वयंज्योतिःस्वभावं रुक्मस्येव वा ज्योतिरस्याविनाशि कर्तारं सर्वस्य जगत ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिं ब्रह्म च तयोनिश्चासौ ब्रह्मयोनिस्तं ब्रह्मयोनिं ब्रह्मणो वापरस्य योनिं स यदा चैवं पश्यति तदा स विद्वान्पश्यः पुण्यपापे बन्धनभूते कर्मणी समूले विधूय निरस्य दग्ध्वा निरञ्जनो निर्लेपो विगतक्लेशः परमं प्रकृष्टं निरतिशयं साम्यं समतामद्वयलक्षणं द्वैतविषयाणि साम्यान्यतोऽर्वाञ्च्येवातोऽद्वयलक्षणमेतत्परमं साम्यमुपैति प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥जिस समय देखनेवाला होनेके कारण पश्य—द्रष्टा विद्वान् अर्थात् साधक रुक्मवर्ण—स्वयंप्रकाशस्वरूप अथवा सुवर्णके समान जिसका प्रकाश अविनाशी है उस सकल जगत्कर्ता ईश्वर पुरुष ब्रह्मयोनिको—जो ब्रह्म है और योनि भी है अथवा जो अपर ब्रह्म (ब्रह्मा) की योनि है उस ब्रह्मयोनिको इस प्रकार पूर्ववत् देखता है उस समय वह विद्वान् द्रष्टा पुण्य-पाप यानी अपने बन्धनभूत कर्मोंको समूल त्यागकर—भस्म करके निरञ्जन—निर्लेप अर्थात् क्लेशरहित होकर अद्वयरूप परम—उत्कृष्ट यानी निरतिशय समताको प्राप्त हो जाता है । द्वैतविषयक समता इस अद्वैतरूप साम्यसे निकृष्ट ही है; अतः वह अद्वैतरूप परम साम्यको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥

श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ

किं च—तथा—

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति

विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९


आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा-

नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥

यह, जो सम्पूर्ण भूतोंके रूपमें भासमान हो रहा है प्राण है। इसे जानकर विद्वान् अतिवादी नहीं होता। यह आत्मामें क्रीडा करनेवाला और आत्मामें ही रमण करनेवाला क्रियावान् पुरुष ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठतम है ॥ ४ ॥

योऽयं प्राणस्य प्राणः पर ईश्वरो ह्येष प्रकृतः सर्वैर्भूतैर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तैः, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया, सर्वभूतस्थः सर्वात्मा सन्नित्यर्थः, विभाति विविधं दीप्यते । एवं सर्वभूतस्थं यः साक्षादात्मभावेनायमहमस्मीति विजानन्विद्वान्नवाक्यार्थज्ञानमात्रेण स भवते भवति न भवतीत्येतत् किमतिवाद्यतीत्य सर्वानन्यान वदितुं शीलमस्येत्यतिवादी ।यह जो प्राणका प्राण परमेश्वर है वह प्रकृत [परमात्मा] ही सम्पूर्ण भूतों—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियोंके द्वारा अर्थात् सर्वभूतस्थ सर्वात्मा होकर विभासित यानी विविध प्रकारसे देदीप्यमान हो रहा है। 'सर्वभूतैः' इस पदमें इत्थंभूतलक्षणा तृतीया* है। इस प्रकार जो विद्वान् उस सर्वभूतस्थ प्राणको 'मैं यही हूँ' ऐसा साक्षात् आत्मस्वरूपसे जाननेवाला है वह उस वाक्यके अर्थज्ञानमात्रसे भी नहीं होता। क्या नहीं होता ? [इसपर कहते हैं—] अतिवादी नहीं होता। जिसका स्वभाव और सबको अतिक्रमण करके बोलनेका होता है उसे अतिवादी कहते हैं।

* इत्थंभूतलक्षणे (२।३।२१) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ तृतीया विभक्ति हुई है। किसी प्रकारकी विशेषताको प्राप्त हुई वस्तुको जो लक्षित कराता है

९०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

| यस्त्वेवं साक्षादात्मानं प्राणस्य प्राण विद्दानतिवादी स न भवतीत्यर्थः । सर्वं यदात्मैव नान्यदस्तीति दृष्टं तदा किं ह्यसावतीत्य वदेत् । यस्य त्यपरम् अन्यदृष्टमस्ति स तदतीत्य वदति । अयं तु विद्वानात्मनोऽन्यन्न पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । अतो नातिवदति । | तात्पर्य यह कि जो इस प्रकार प्राणके प्राण साक्षात् आत्माको जाननेवाला है वह अतिवादी नहीं होता । जब कि उसने यह देखा है कि सब आत्मा ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है तब वह किसका अतिक्रमण करके बोलेगा ? जिसकी दृष्टिमें कुछ और दीखनेवाला पदार्थ है वही उसका अतिक्रमण करके बोलता है । किन्तु यह विद्वान् तो आत्मासे भिन्न न कुछ देखता है, न सुनता है और न कुछ जानता ही है । इसलिये यह अतिवादन भी नहीं करता । | | किं चात्मक्रीड आत्मन्येव च क्रीडा क्रीडनं यस्य नान्यत्र पुत्रदारादिषु स आत्मक्रीडः। तथात्मरतिरात्मन्येव च रती रमणं प्रीतिर्यस्य स आत्मरतिः । क्रीडा बाह्यसाधनसापेक्षा, रतिस्तु | यही नहीं, वह [आत्मक्रीड, आत्मरति और क्रियावान् हो जाता है।] आत्मक्रीड—जिसकी आत्मामें ही क्रीडा हो, अन्य स्त्री-पुत्रादिमें न हो उसे आत्मक्रीड कहते हैं; तथा जिसकी आत्मामें ही रति— रमण यानी प्रीति हो वह आत्मरति कहलाता है । क्रीडा बाह्य साधनकी अपेक्षा रखनेवाली होती है और |


वह 'इत्थंभूतलक्षण' कहलाता है; उसमें तृतीया विभक्ति होती है । जैसे 'जटाभिस्तापसः' ( जटाओंसे तपस्वी है ) इस वाक्यमें जटाओंके द्वारा तपस्वी होना लक्षित होता है; अतः 'जटा' में तृतीया विभक्ति है । इसी प्रकार 'सर्वभूत' शब्दसे ईश्वरका सब भूतोंमें स्थित होना लक्षित होता है ।

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१

साधननिरपेक्षा बाह्यविषयप्रीतिमात्रमिति विशेषः । तथा क्रियावाञ्ज्ञानध्यानवैराग्यादिक्रिया यस्य सोऽयं क्रियावान् । समासपाठ आत्मरतिरेव क्रियास्य विद्यत इति बहुव्रीहिमत्वर्थयोरन्यतरोऽतिरिच्यते ।रति साधनकी अपेक्षा न करके बाह्य विषयकी प्रीतिमात्रको कहते हैं—यही इन दोनोंमें विशेषता (अन्तर) है । तथा क्रियावान् अर्थात् जिसकी ज्ञान, ध्यान एवं वैराग्यादि क्रियाएँ हों उसे क्रियावान् कहते हैं । किन्तु ['आत्मरति-क्रियावान्' ऐसा] समासयुक्त पाठ होनेपर 'आत्मरति ही जिसकी क्रिया है' [ऐसा अर्थ होनेसे] बहुव्रीहि समास और 'मतुप्' प्रत्ययका अर्थ—इन दोनोंमेंसे एक (मतुप् प्रत्ययका अर्थ) अधिक हो जाता है ।
केचित्त्वग्निहोत्रादिकर्मब्रह्मविद्ययोः समुच्चयार्थमिच्छन्ति । <br>(समुच्चयवादिमत-खण्डनम्) <br>तच्चैष ब्रह्मविदां वरिष्ठ इत्यनेन मुख्यार्थवचनेन विरुध्यते । न हि बाह्यक्रियावानात्मक्रीड आत्मरतिश्च भवितुं शक्तः, कश्चिद्वाह्यक्रियाविनिवृत्तो ह्यात्मक्रीडो भवति बाह्यक्रियात्मक्रीडयोर्विरोधात् । न हि तमःप्रकाशयोर्युगपदेकत्र स्थितिः संभवति ।कोई-कोई (समुच्चयवादी) तो [आत्मरति और क्रियावान् इन दोनों विशेषणोंको] अग्निहोत्रादि कर्म और ब्रह्मविद्याके समुच्चयके लिये समझते हैं । किन्तु उनका यह अभिप्राय 'ब्रह्मविदां वरिष्ठः' इस मुख्यार्थवाची कथनसे विरुद्ध है । बाह्यक्रियावान् पुरुष आत्मक्रीड और आत्मरति हो ही नहीं सकता । कोई भी पुरुष कभी-न-कभी बाह्य क्रियासे निवृत्त होकर ही आत्मक्रीड हो सकता है, क्योंकि बाह्य क्रिया और आत्मक्रीडाका परस्पर विरोध है । अन्धकार और प्रकाशकी एक स्थानपर एक ही समय स्थिति हो ही नहीं सकती ।

९२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


. तस्मादसत्प्रलपितमेवैतदनेन ज्ञानकर्मसमुच्चयप्रतिपादनम् । "अन्या वाचो विमुञ्चथ" (मु० उ० २।२।५) "संन्यासयोगात्" (मु० उ० ३।२।६) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । तस्मादयम् एवेह क्रियावान्यो ज्ञानध्यानादि-क्रियावानसंभिन्नार्यमर्यादः संन्यासी । य एवंलक्षणो नातिवाद्यात्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावान्ब्रह्मनिष्ठः स ब्रह्मविदां सर्वेषां वरिष्ठः प्रधानः ॥ ४ ॥अतः इस वचनके द्वारा यह ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन मिथ्या प्रलाप ही है। यही बात "अन्या वाचो विमुञ्चथ" "संन्यासयोगात्" इत्यादि श्रुतियोंसे भी सिद्ध होती है। अतएव इस जगह उसीको 'क्रियावान्' कहा है जो ज्ञान-ध्यानादि क्रियाओंवाला और आर्यमर्यादाका भंग न करने-वाला संन्यासी है। जो ऐसे लक्षणोंवाला अनतिवादी, आत्म-क्रीड, आत्मरति और क्रियावान् ब्रह्मनिष्ठ है वही समस्त ब्रह्मवेत्ताओं-में वरिष्ठ यानी प्रधान है ॥ ४ ॥

आत्मदर्शनके साधन

अधुना सत्यादीनि भिक्षोः सम्यग्ज्ञानसहकारीणि साधनानि विधीयन्ते निवृत्तिप्रधानानि—अब भिक्षुके लिये सम्यग्ज्ञानके सहकारी सत्य आदि निवृत्तिप्रधान साधनोंका विधान किया जाता है—

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥

खंड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३


यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जिसे दोषहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीरके भीतर रहता है ॥ ५ ॥


सत्येनानृतत्यागेन मृषावदनत्यागेन लभ्यः प्राप्तव्यः । किं च तपसा हीन्द्रियमनैकाग्रतया "मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः" ( महा० शा० २५० । ४ ) इति स्मरणात् । तद्धह्यनुकूलमात्मदर्शनाभिमुखीभावात्परमं साधनं तपो नेतरच्चान्द्रायणादि । एष आत्मा लभ्य इत्यनुषङ्गः सर्वत्र । सम्यग्ज्ञानेन यथाभूतात्मदर्शनेन ब्रह्मचर्येण मैथुनासमाचारेण । नित्यं सत्येन नित्यं तपसा नित्यं सम्यग्ज्ञानेनेति सर्वत्र नित्यशब्दोऽन्तर्दीपिकान्यायेन अनुषक्तव्यः ।[ यह आत्मा ] सत्यसे अर्थात् अनृत यानी मिथ्या-भाषणके त्यागद्वारा प्राप्त किया जा सकता है । तथा "मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है" इस स्मृतिके अनुसार तप यानी इन्द्रिय और मनकी एकाग्रतासे भी [ इस आत्माकी उपलब्धि हो सकती है], क्योंकि आत्मदर्शनके अभिमुख रहनेके कारण यही तप उसका अनुकूल परम साधन है—दूसरा चान्द्रायणादि तप उसका साधन नहीं है [ इसके सिवा ] सम्यग्ज्ञान—यथार्थ आत्मदर्शन और ब्रह्मचर्य—मैथुनके त्यागसे भी नित्य अर्थात् सर्वदा [ इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है]; यहाँ 'एष आत्मा लभ्यः' ( इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है) इस वाक्यका सर्वत्र सम्बन्ध है। 'सर्वदा सत्यसे', 'सर्वदा तपसे' और 'सर्वदा सम्यग्ज्ञानसे' इस प्रकार अन्तर्दीपिकान्यायसे ( मध्यवर्ती दीपकोंके समान ) सभीके साथ 'नित्य' शब्दका सम्बन्ध लगाना चाहिये;

९४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


वक्ष्यति च—"न येषु जिह्मम-जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में)
नृतं न माया च" (प्र०कहेंगे भी *'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता,
उ० १।१६) इति ।अनृत और माया नहीं है' इत्यादि ।
कोऽसावात्मा य एतैः साध-जो आत्मा इन साधनोंसे प्राप्त
नैर्लभ्य इत्युच्यते । अन्तःशरीरे-किया जाता है वह कौन है—
ऽन्तर्मध्ये शरीरस्य पुण्डरीकाकाशेइसपर कहा जाता है—'अन्तः-
ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रःशरीरे' अर्थात् शरीरके भीतर
शुद्धो यमात्मानं पश्यन्त्युपलभन्तेपुण्डरीकाकाशमें जो ज्योतिर्मय
यतयो यतनशीलाः संन्यासिनःसुवर्णवर्ण शुभ्र यानी शुद्ध आत्मा
क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्त-है, जिसे कि क्षीणदोष यानी
मलाः । स आत्मा नित्यं सत्या-जिनके क्रोधादि मनोमल क्षीण हो
दिसाधनैः संन्यासिभिर्लभ्यते ।गये हैं वे यतिजन—यत्नशील
न कादाचित्कैः सत्यादिभिःसंन्यासीलोग देखते अर्थात् उपलब्ध
लभ्यते । सत्यादिसाधनस्तु-करते हैं । तात्पर्य यह है कि वह
त्यर्थोऽयमर्थवादः ॥ ५ ॥आत्मा सर्वदा सत्यादि साधनोंसे ही
संन्यासियोंद्वारा प्राप्त किया जा
सकता है—कभी-कभी व्यवहार
किये जानेवाले सत्यादिसे प्राप्त नहीं
होता । यह अर्थवाद सत्यादि
साधनोंकी स्तुतिके लिये है ॥ ५ ॥

सत्यकी महिमा

सत्यमेव जयति नानृतं

सत्येन पन्था विततो देवयानः ।


* इस भविष्यत्कालिक उक्तिसे विदित होता है कि उपनिषद्भाष्यके विद्यार्थियोंको प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५


येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा

यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

सत्य ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या नहीं । सत्यसे देवयान-मार्गका विस्तार होता है, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिलोग उस पदको प्राप्त होते हैं जहाँ वह सत्यका परम निधान ( भण्डार ) वर्तमान है ॥६॥


मूल भाष्यभाष्यार्थ
सत्यमेव सत्यवानेव जयति नानृतं नानृतवादीत्यर्थः । न हि सत्यानृतयोः केवलयोः पुरुषानाश्रितयोर्जयः पराजयो वा सम्भवति । प्रसिद्धं लोके सत्यवादिनानृतवाद्यभिभूयते न विपर्ययोऽतः सिद्धं सत्यस्य बलवत्साधनत्वम् ।<br><br>किं च शास्त्रतोऽप्यवगम्यते सत्यस्य साधनातिशयत्वम् । कथम् ? सत्येन यथाभूतवादव्यवस्थया पन्था देवयानाख्यो विततो विस्तीर्णः सातत्येन प्रवृत्तः येन यथा ह्याक्रमन्ति क्रमन्त ऋषयो दर्शनवन्तः 'कुहकमाया-सत्य अर्थात् सत्यवान् ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या यानी मिथ्यावादी नहीं । [ यह ‘सत्य’ और ‘अनृत’ का सत्यवान् और मिथ्यावादी अर्थ इसलिये किया गया है कि ] पुरुषका आश्रय न करनेवाले केवल सत्य और मिथ्याका ही जय या पराजय नहीं हो सकता । लोकमें प्रसिद्ध ही है कि सत्यवादीसे मिथ्यावादीको ही नीचा देखना पड़ता है, इसके विपरीत नहीं होता । इससे सत्यका प्रवल साधनत्व सिद्ध होता है ।<br><br>यही नहीं, सत्यका उत्कृष्ट साधनत्व शास्त्रसे भी जाना जाता है । किस प्रकार ? [ सो बंतलाते हैं— ] सत्य अर्थात् यथार्थ वचनकी व्यवस्थासे देवयानसंज्ञक मार्ग विस्तीर्ण यानी नैरन्तर्यसे प्रवृत्त होता है, जिस मार्गसे कपट, छल, शठता, अहङ्कार, दम्भ और अनृतसे
९६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
शाठ्याहंकारदम्भानृतवर्जिता ह्याप्तकामा विगततृष्णाः सर्वतो यत्र यस्मिंस्तत्परमार्थतत्त्वं सत्यस्योत्तमसाधनस्य सम्बन्धि साध्यं परमं प्रकृष्टं निधानं पुरुषार्थरूपेण निधीयत इति निधानं वर्तते । तत्र च येन पथाक्रमन्ति स सत्येन वितत इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ६ ॥रहित तथा सब ओरसे पूर्णकाम और तृणारहित ऋषिगण—[अतीन्द्रिय वस्तुको] देखनेवाले पुरुष [उस पदपर] आरूढ होते हैं, जिसमें कि सत्यसंज्ञक उत्कृष्ट साधनका सम्बन्धी उसका साध्यरूप परमार्थतत्त्व जो पुरुषार्थरूपसे निहित होनेके कारण निधान है वह परम यानी प्रकृष्ट निधान वर्तमान है । 'उस पदमें जिस मार्गसे आरूढ होते हैं वह सत्यसे ही विस्तीर्ण हो रहा है'—इस प्रकार इसका पूर्व-वाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ६ ॥

परमपदका स्वरूप

किं तत्किन्धर्मकं च तदित्युच्यते—वह क्या है और किन धर्मोंवाला है ? इसपर कहा जाता है—

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं

सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति ।

दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च

पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥

वह महान् दिव्य और अचिन्त्यरूप है । वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर भासमान होता है तथा दूरसे भी दूर और इस शरीरमें अत्यन्त समीप भी है । वह चेतनावान् प्राणियोंमें इस शरीरके भीतर उनकी बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ है ॥ ७ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
बृहन्महच्च तत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यादिसाधनं सर्वतो व्याप्तत्वात् । दिव्यं स्वयंप्रभमनिन्द्रियगोचरमत एव न चिन्तयितुं शक्यतेऽस्य रूपमित्यचिन्त्यरूपम् । सूक्ष्मादाकाशादेरपि तत्सूक्ष्मतरम्, निरतिशयं हि सौक्ष्म्यमस्य सर्वकारणत्वात्, विभाति विविधमादित्यचन्द्राद्याकारेण भाति दीप्यते ।सत्यादि जिसकी प्राप्तिके साधन हैं वह प्रकृत ब्रह्म सब ओर व्याप्त होनेके कारण बृहत्—महान् है । वह दिव्य—स्वयंप्रभ यानी इन्द्रियोंका अविषय है, इसलिये जिसका रूप चिन्तन न किया जा सके ऐसा अचिन्त्यरूप है । वह आकाशादि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी सूक्ष्मतर है । सबका कारण होनेसे इसकी सूक्ष्मता सबसे अधिक है । इस प्रकार वह सूर्य-चन्द्र आदि रूपोंसे अनेक प्रकार भासित यानी दीप्त हो रहा है ।
किं च दूराद्विप्रकृष्टदेशात्सुदूरे विप्रकृष्टतरे देशे वर्ततेऽविदुषामत्यन्तागम्यत्वात्तद्ब्रह्म । इह देहेऽन्तिके समीपे च विदुषामात्मत्वात् । सर्वान्तरत्वाच्चाकाशास्याप्यन्तरश्रुतेः । इह पश्यत्सु चेतनावत्स्वित्येतन्निहितं स्थितं दर्शनादिक्रियावत्त्वेन योगिभिर्लक्ष्यमाणम् । क्व? गुहायांइसके सिवा वह ब्रह्म अज्ञानियोंके लिये अत्यन्त अगम्य होनेके कारण दूर यानी दूरस्थ देशसे भी अधिक दूर—अत्यन्त दूरस्थ देशमें वर्तमान है; तथा विद्वानोंका आत्मा होनेके कारण इस शरीरमें अत्यन्त समीप भी है । यह श्रुतिके कथनानुसार सबके भीतर रहनेवाला होनेसे आकाशके भीतर भी स्थित है । यह इस लोकमें 'पश्यत्सु' अर्थात् चेतनावान् प्राणियोंमें योगियोंद्वारा दर्शनादिक्रियावत्त्वरूपसे स्थित देखा जाता है । कहाँ देखा जाता है ?
९८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
बुद्धिलक्षणायाम्। तत्र हि निगूढं लक्ष्यते विद्वद्भिः । तथाप्यविद्यया संवृतं सन्न लक्ष्यते तत्रस्थमेवाविद्वद्भिः ॥ ७ ॥उनकी बुद्धिरूप गुहामें । यह विद्वानोंको उसीमें छिपा हुआ दिखायी देता है । तो भी अविद्यासे आच्छादित रहनेके कारण यह अज्ञानियोंको वहाँ स्थित रहनेपर भी दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥

आत्मसाक्षात्कारका असाधारण साधन—चित्तशुद्धि

पुनरप्यसाधारणं तदुपलब्धिसाधनमुच्यते—फिर भी उसकी उपलब्धिका असाधारण साधन बतलाया जाता है—

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व-
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥

[ यह आत्मा ] न नेत्रसे ग्रहण किया जाता है, न वाणीसे, न अन्य इन्द्रियोंसे और न तप अथवा कर्मसे ही । ज्ञानके प्रसादसे पुरुष विशुद्धचित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करनेपर उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ॥ ८ ॥

यस्मान्न चक्षुषा गृह्यते केनचिदप्यरूपत्वान्नापि गृह्यते वाचानभिधेयत्वान्न चान्यैर्देवैरितरेन्द्रियैः । तपसः सर्वप्राप्तिसाधनत्वेऽपि न तपसाक्योंकि रूपहीन होनेके कारण यह आत्मा किसीसे भी नेत्रद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, अवाच्य होनेके कारण वाणीसे गृहीत नहीं होता और न अन्य इन्द्रियोंका ही विषय होता है। तप सभीकी प्राप्तिका साधन है; तथापि
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९९
गृह्यते। तथा वैदिकेनाग्निहोत्रादि-कर्मणा प्रसिद्धमहत्त्वेनापि न गृह्यते । किं पुनरतस्य ग्रहणे साधनमित्याह—<br><br>ज्ञानप्रसादेन। आत्मावबोधनसमर्थमपि स्वभावेन सर्वप्राणिनां ज्ञानं बाह्यविषयरागादिदोषकलुषितमप्रसन्नमशुद्धं सन्नावबोधयति नित्यं संनिहितमप्यात्मतत्त्वं मलावनद्धमिवादर्शनम्, विल्लुलितमिव सलिलम्। तद्यदेन्द्रियविषयसंसर्गजनितरागादिमलकालुष्यापनयनादादर्शसलिलादिवत्प्रसादितं स्वच्छं शान्तमवतिष्ठते तदा ज्ञानस्य प्रसादः स्यात् ।<br><br> तेन ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वो विशुद्धान्तःकरणो योग्यो ब्रह्म द्रष्टुं यस्मात्ततस्तस्मात्तु तमात्मानं पश्यते पश्यत्युपलभतेयह तपसे भी ग्रहण नहीं किया जाता और न जिसका महत्त्व सुप्रसिद्ध है उस अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मसे ही गृहीत होता है। तो फिर उसके ग्रहण करनेमें क्या साधन है ? इसपर कहते हैं—<br><br> ज्ञान (ज्ञानकी साधनभूता बुद्धि) के प्रसादसे [उसका ग्रहण हो सकता है]। सम्पूर्ण प्राणियोंका ज्ञान स्वभावसे आत्मबोध करानेमें समर्थ होनेपर भी, बाह्य विषयोंके रागादि दोषसे कलुषित—अप्रसन्न यानी अशुद्ध हो जानेके कारण उस आत्मतत्त्वका, सर्वदा समीपस्थ होनेपर भी, मलसे ढके हुए दर्पण तथा चञ्चल जलके समान बोध नहीं करा सकता। जिस समय इन्द्रिय और विषयोंके संसर्गसे होनेवाले रागादि दोषरूप मलके दूर हो जानेपर दर्पण या जल आदिके समान चित्त प्रसन्न—स्वच्छ अर्थात् शान्तभावसे स्थित हो जाता है उस समय ज्ञानका प्रसाद होता है।<br><br> क्योंकि उस ज्ञानप्रसादसे विशुद्धसत्त्व यानी शुद्धचित्त हुआ पुरुष ब्रह्मका साक्षात्कार करने योग्य होता है इसलिये तब वह ध्यान करके अर्थात् सत्यादि साधनसम्पन्न
१००मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

निष्कलँ सर्वावयवभेदवर्जितंहोकर इन्द्रियोंका निरोध कर एकाग्रचित्तसे ध्यान—चिन्तन करता हुआ उस निष्कल यानी सम्पूर्ण अवयवभेदसे रहित आत्माको देखता—उपलब्ध करता है ॥८॥
ध्यायमानः सत्यादिसाधन-
वानुपसंहृतकरण एकाग्रेण मनसा
ध्यायमानश्चिन्तयन् ॥ ८ ॥

शरीरमें इन्द्रियरूपसे अनुप्रविष्ट हुए आत्माका चित्तशुद्धिद्वारा साक्षात्कार

यमात्मानमेवं पश्यति—जिस आत्माको साधक इस प्रकार देखता है—

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो
यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां
यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥

वह सूक्ष्म आत्मा, जिस [शरीर] में पाँच प्रकारसे प्राण प्रविष्ट है उस शरीरके भीतर ही विशुद्ध विज्ञानद्वारा जानने योग्य है। उसने इन्द्रियोंद्वारा प्रजावर्गके सम्पूर्ण चित्तोंको व्याप्त किया हुआ है, जिसके शुद्ध हो जानेपर यह आत्मस्वरूपसे प्रकाशित होने लगता है ॥ ९ ॥

एषोऽणुः सूक्ष्मश्चेतसा विशुद्धज्ञानेन केवलेन वेदितव्यः। क्वासौ ? यस्मिञ्शरीरे प्राणो वायुः पञ्चधा प्राणापानादिभेदेन संविवेश सम्यक्प्रविष्टस्तस्मिन्नेव शरीरे हृदये चेतसा ज्ञेय इत्यर्थः ।वह अणु—सूक्ष्म आत्मा चित्त यानी केवल विशुद्ध ज्ञानसे जानने योग्य है। वह कहाँ जानने योग्य है ? जिस शरीरमें प्राणवायु, प्राण-अपान आदि भेदसे पाँच प्रकारका होकर सम्यक् रीतिसे प्रविष्ट हो रहा है उसी शरीरमें हृदयके भीतर यह चित्तद्वारा जानने योग्य है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०१

कीदृशेन चेतसा वेदितव्य इत्याह—प्राणैः सहेन्द्रियैश्चित्तं सर्वमन्तःकरणं प्रजानामोतं व्याप्तं येन क्षीरमिव स्नेहेन काष्ठमिवाग्निना । सर्वं हि प्रजानामन्तःकरणं चेतनावत्प्रसिद्धं लोके । यस्मिश्च चित्ते क्लेशादिमलवियुक्ते शुद्धे विभवत्येष उक्त आत्मा विशेषेण स्वेनात्मना विभवत्यात्मानं प्रकाशयतीत्यर्थः ॥ ९ ॥वह किस प्रकारके चित्त (ज्ञान) से ज्ञातव्य है ? इसपर कहते हैं—दूध जिस प्रकार घृतसे और काष्ठ जिस प्रकार अग्निसे व्याप्त है उसी प्रकार जिससे प्राण यानी इन्द्रियोंके सहित प्रजाके समस्त चित्त—अन्तःकरण व्याप्त हैं, क्योंकि लोकमें प्रजाके सभी अन्तःकरण चेतनायुक्त प्रसिद्ध हैं और जिस चित्तके शुद्ध यानी क्लेशादि मलसे वियुक्त होनेपर यह पूर्वोक्त आत्मा अपने विशेषरूपसे प्रकट होता है अर्थात् अपनेको प्रकाशित कर देता है [उस विशुद्ध और विभु विज्ञानसे ही उस आत्मतत्त्वका अनुभव किया जा सकता है] ॥९॥

आत्मज्ञका वैभव और उसकी पूजाका विधान

य एवमुक्तलक्षणं सर्वात्मानमात्मत्वेन प्रतिपन्नस्तस्य सर्वात्मत्वादेव सर्वावाप्तिलक्षणं फलमाह—इस प्रकार जो उपर्युक्त सर्वात्माको आत्मस्वरूपसे जानता है उसका सर्वात्मा होनेसे ही सर्वप्राप्तिरूप फल बतलाते हैं—

यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामां-
स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥ १० ॥