भारतकोश
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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर

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सं० १९९२
प्रथम संस्करण
३२५०

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<p align="right"><b>मूल्य ।=) सात आना</b></p>

निवेदन

मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेदके मन्त्रभागके अन्तर्गत है। इसमें तीन मुण्डक हैं और एक-एक मुण्डकके दो-दो खण्ड हैं। ग्रन्थके आरम्भमें ग्रन्थोक्त विद्याकी आचार्यपरम्परा दी गयी है। वहाँ बतलाया है कि यह विद्या ब्रह्माजीसे अथर्वाको प्राप्त हुई और अथर्वासे क्रमशः अङ्गी और भारद्वाजके द्वारा अङ्गिराको प्राप्त हुई। उन अङ्गिरा मुनिके पास महागृहस्थ शौनक ने विधिवत् आकर पूछा कि 'भगवन् ! ऐसी कौन-सी वस्तु है जिस एकके जान लेनेपर सब कुछ जान लिया जाता है?' महर्षि शौनकका यह प्रश्न प्राणिमात्रके लिये बड़ा कुतूहलजनक है, क्योंकि सभी जीव अधिक-से-अधिक वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।

इसके उत्तरमें महर्षि अङ्गिराने परा और अपरा नामक दो विद्याओंका निरूपण किया है। जिसके द्वारा ऐहिक और आमुष्मिक अनात्म पदार्थोंका ज्ञान होता है उसे अपरा विद्या कहा है, तथा जिससे अखण्ड, अविनाशी एवं निष्प्रपञ्च परमार्थतत्त्वका बोध होता है उसे परा विद्या कहा गया है। सारा संसार अपरा विद्याका विषय है तथा संसारी पुरुषोंकी प्रवृत्ति भी उसीकी ओर है। उसीके द्वारा ऐसे किसी एक ही अखण्ड तत्त्वका ज्ञान नहीं हो सकता जो सम्पूर्ण ज्ञानोंका अधिष्ठान हो, क्योंकि उसके विषयभूत जितने पदार्थ हैं वे सब-के-सब परिच्छिन्न ही हैं। अपरा विद्या वस्तुतः अविद्या ही है; व्यवहारमें उपयोगी होनेके कारण ही उसे विद्या कहा जाता है। अखण्ड और अव्यय तत्त्वके जिज्ञासुके लिये वह त्याज्य ही है। इसीलिये आचार्य अङ्गिराने यहाँ उसका उल्लेख किया है।

इस प्रकार विद्याके दो भेद कर फिर सम्पूर्ण ग्रन्थमें उन्हींका सविस्तर वर्णन किया गया है। ग्रन्थका पूर्वार्ध प्रधानतया अपरा विद्याका

( २ )

निरूपण करता है और उत्तरार्धमें मुख्यतया परा विद्या और उसकी प्राप्तिके साधनोंका विवेचन है। इस उपनिषद्की वर्णनशैली बड़ी ही उदात्त एवं हृदयहारिणी है, जिससे स्वभावतः ही जिज्ञासुओंका हृदय इसकी ओर आकर्षित हो जाता है।

उपनिषदोंका जो प्रचलित क्रम है उसके अनुसार इसका अध्ययन प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् किया जाता है। परन्तु प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ठ ९४ पर भगवान् शङ्कराचार्य लिखते हैं—'वक्ष्यति च 'न येषु जिह्ममनृतं न माया च' इति' अर्थात् 'जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में) 'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता, अनृत और माया नहीं है' इत्यादि वाक्यद्वारा कहेंगे भी।' इस प्रकार प्रश्नोपनिषद्के प्रथम प्रश्नके अन्तिम मन्त्रका भविष्यत्कालिक उल्लेख करके आचार्य सूचित करते हैं कि पहले मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये और उसके पश्चात् प्रश्नका। प्रश्नोपनिषद्का भाष्य आरम्भ करते हुए तो उन्होंने इसका स्पष्टतया उल्लेख किया है। अतः शाङ्करसम्प्रदायके वेदान्तविद्यार्थियोंको उपनिषद्भाष्यका इसी क्रमसे अध्ययन करना चाहिये। अस्तु, भगवान्‌से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थके अनुशीलनद्वारा हमें ऐसी योग्यता प्रदान करें जिससे हम उनके सर्वाधिष्ठानभूत परात्पर स्वरूपका रहस्य हृदयङ्गम कर सकें।

अनुवादक

श्रीहरिः

विषय-सूची


विषयपृष्ठ
१. शान्तिपाठ......

प्रथम मुण्डक

प्रथम खण्ड

विषयपृष्ठ
२. सम्बन्धभाष्य......
३. आचार्यपरम्परा......
४. शौनककी गुरूपसत्ति और प्रश्न......
५. अङ्गिराका उत्तर—विद्या दो प्रकारकी है......११
६. परा और अपरा विद्याका स्वरूप......१२
७. परविद्याप्रदर्शन......१५
८. अक्षरब्रह्मका विश्वकारणत्व......१८
९. सृष्टिक्रम......१९
१०. प्रकरणका उपसंहार......२१

द्वितीय खण्ड

विषयपृष्ठ
११. कर्मनिरूपण......२३
१२. अग्निहोत्रका वर्णन......२६
१३. विधिहीन कर्मका कुफल......२७
१४. अग्निकी सात जिह्वाएँ......२९
१५. विधिवत् अग्निहोत्रादिसे स्वर्गप्राप्ति......३०
१६. ज्ञानरहित कर्मकी निन्दा......३२
१७. अविद्याग्रस्त कर्मठोंकी दुर्दशा......३४
१८. ऐहिक और पारलौकिक भोगोंकी असारता देखनेवाले पुरुषके लिये संन्यास और गुरूपसदनका विधान......३९
१९. गुरुके लिये उपदेशप्रदानकी विधि......४२

( २ )

विषयपृष्ठ
द्वितीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
२०. अग्निसे स्फुलिङ्गोंके समान ब्रह्मसे जगत्‌की उत्पत्ति... ... ४४
२१. ब्रह्मका पारमार्थिक स्वरूप... ... ४६
२२. ब्रह्मका सर्वकारणत्व... ... ५०
२३. सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्मका विश्वरूप... ... ५२
२४. अक्षर पुरुषसे चराचरकी उत्पत्तिका क्रम... ... ५४
२५. कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं... ... ५५
२६. इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं... ... ५७
२७. पर्वत, नदी और ओषधि आदिका ब्रह्मजन्यत्व... ... ५९
२८. ब्रह्म और जगत्‌का अभेद तथा ब्रह्मज्ञानसे अविद्या-ग्रन्थिका नाश... ... ६०
द्वितीय खण्ड
२९. ब्रह्मका स्वरूपनिर्देश तथा उसे जाननेके लिये आदेश... ... ६२
३०. ब्रह्ममें मनोनिवेश करनेका विधान... ... ६४
३१. ब्रह्मवेधनकी विधि... ... ६६
३२. वेधनके लिये ग्रहण किये जानेवाले धनुषादिका स्पष्टीकरण... ... ६७
३३. आत्मसाक्षात्कारके लिये पुनः विधि... ... ६९
३४. ओंकाररूपसे ब्रह्मचिन्तनकी विधि... ... ७०
३५. अपर ब्रह्मका वर्णन तथा उसके चिन्तनका प्रकार... ... ७२
३६. ब्रह्मसाक्षात्कारका फल... ... ७५
३७. ज्योतिर्मय ब्रह्म... ... ७६
३८. ब्रह्मका सर्वप्रकाशकत्व... ... ७८
३९. ब्रह्मका सर्वव्यापकत्व... ... ८०
तृतीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
४०. प्रकारान्तरसे ब्रह्मनिरूपण... ... ८२
४१. समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी... ... ८३

( ३ )

विषयपृष्ठ
४२. ईश्वरदर्शनसे जीवकी शोकनिवृत्ति......८५
४३. श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ......८८
४४. आत्मदर्शनके साधन......९२
४५. सत्यकी महिमा......९४
४६. परमपदका स्वरूप......९६
४७. आत्मसाक्षात्कारका असाधारण साधन—चित्तशुद्धि...९८
४८. शरीरमें इन्द्रियरूपसे अनुप्रविष्ट हुए आत्माका चित्तशुद्धिद्वारा साक्षात्कार......१००
४९. आत्मज्ञका वैभव और उसकी पूजाका विधान...१०१

द्वितीय खण्ड

५०. आत्मवेत्ताकी पूजाका फल | ... | ... | १०३ ५१. निष्कामतासे पुनर्जन्मनिवृत्ति | ... | ... | १०४ ५२. आत्मदर्शनका प्रधान साधन—जिज्ञासा | ... | ... | १०६ ५३. आत्मदर्शनके अन्य साधन | ... | ... | १०७ ५४. आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्रकार | ... | ... | १०९ ५५. ज्ञातज्ञेयकी मोक्षप्राप्ति | ... | ... | ११० ५६. मोक्षका स्वरूप | ... | ... | ११३ ५७. ब्रह्मप्राप्तिमें नदी आदिका दृष्टान्त | ... | ... | ११५ ५८. ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है | ... | ... | ११५ ५९. विद्याप्रदानकी विधि | ... | ... | ११७ ६०. उपसंहार | ... | ... | ११९ ६१. शान्तिपाठः | ... | ... | १२१

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अङ्गिरस और शौनकका संवाद

प्रथम मुण्डक (प्रथम खण्ड) - परा व अपरा विद्या

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

मुण्डकोपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

भावाभावपदातीतं भावाभावात्मकं च यत् ।
तद् वन्दे भावनातीतं स्वात्मभूतं परं महः ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

हे देवगण ! हम कानोंसे कल्याणमय वचन सुनें; यज्ञकर्ममें समर्थ होकर नेत्रोंसे शुभ दर्शन करें; अपने स्थिर अङ्ग और शरीरोंसे स्तुति करनेवाले हमलोग देवताओंके लिये हितकर आयुका भोग करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करे, परम ज्ञानवान् [ अथवा परम धनवान् ] पूषा हमारा कल्याण करे, अरिष्टोंके [ नाशके ] लिये चक्ररूप गरुड हमारा कल्याण करे तथा बृहस्पतिजी हमारा कल्याण करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

प्रथम मुण्डक

प्रथम खण्ड

सम्बन्धभाष्यम्

ॐ ब्रह्मा देवानामित्याद्याथर्वणोपनिषत्। अस्याश्च विद्यासम्प्रदायकर्तृपारम्पर्यलक्षणसम्बन्धम् आदावेवाह स्वयमेव स्तुत्यर्थम्। एवं हि महद्भिः परमपुरुषार्थसाधनत्वेन गुरुणायासेन लब्धा विद्येति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय विद्यां महीकरोति। स्तुत्या प्ररोचितायां हि विद्यायां सादराः प्रवर्तेरन्निति।<br><br><sub>[उपक्रमः]</sub><br><br>प्रयोजनेन तु विद्यायाः साध्यसाधनलक्षणसम्बन्धम् उत्तरत्र वक्ष्यति 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' (मु० उ० २।२।८)।<br><br><sub>[ब्रह्मविद्यायाः सम्बन्धप्रयोजन-निरूपणम्]</sub>'ॐ ब्रह्मा देवानाम्' इत्यादि [वाक्यसे आरम्भ होनेवाली] उपनिषद् अथर्ववेदकी है। श्रुति इसकी स्तुतिके लिये इसके विद्यासम्प्रदायके कर्त्ताओंकी परम्परास्वरूप सम्बन्धका सबसे पहले स्वयं ही वर्णन करती है। इस प्रकार यह दिखलाकर कि 'इस विद्याको परमपुरुषार्थके साधनरूपसे महापुरुषोंने अत्यन्त परिश्रमसे प्राप्त किया था' श्रुति श्रोताओंकी बुद्धिमें इसके लिये रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी महत्ता दिखलाती है, जिससे कि लोग स्तुतिके कारण रुचिकर प्रतीत हुई विद्याके उपार्जनमें आदरपूर्वक प्रवृत्त हों।<br><br>अपने प्रयोजनके साथ ब्रह्मविद्याका साध्यसाधनरूप सम्बन्ध आगे चलकर 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि मन्त्रद्वारा बतलाया जायगा।
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ

संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
इत्यादिना, अत्र चापरशब्दवाच्या-<br>यामृग्वेदादिलक्षणायां विधिप्रति-<br>षेधमात्रपरायां विद्यायां संसार-<br>कारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं<br>नास्तीति स्वयमेवोक्त्वा परापर-<br>विद्याभेदकरणपूर्वकम् ‘अविद्या-<br>यामन्तरे वर्तमानाः’ (मु० उ०<br>१।२।८) इत्यादिना । तथा<br>परप्राप्तिसाधनं सर्वसाधनसाध्य-<br>विषयवैराग्यपूर्वकं गुरुप्रसाद-<br>लभ्यां ब्रह्मविद्यामाह—‘परीक्ष्य<br>लोकान्’ (मु० उ० १।२।१२)<br>इत्यादिना । प्रयोजनं चास-<br>कृद्ब्रवीति ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव<br>भवति’ (मु० उ० ३।२।९) इति<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’<br>(मु० उ० ३। २। ६) इति च ।यहाँ तो ‘विधि-प्रतिषेधमात्रमें तत्पर<br>अपर शब्दवाच्य ऋग्वेदादिरूप<br>विद्या संसारके कारणभूत अज्ञान<br>आदि दोषकी निवृत्ति करनेवाली नहीं<br>है’—यह बात ‘अविद्यायामन्तरे<br>वर्तमानाः’ इत्यादि वाक्योंसे विद्याके<br>पर और अपर भेद करते हुए स्वयं<br>ही बतलाकर फिर ‘परीक्ष्य लोकान्’<br>इत्यादि वाक्योंसे साधन-साध्यरूप<br>सब प्रकारके विषयोंसे वैराग्यपूर्वक<br>गुरुकृपासे प्राप्य ब्रह्मविद्याको ही<br>परब्रह्मकी प्राप्तिका साधन बतलाया<br>है । तथा ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’ इत्यादि<br>वाक्योंसे उसका प्रयोजन तो<br>बारम्बार बतलाया है ।
ज्ञानमात्रे यद्यपि सर्वाश्रमिणाम्<br><sub>[संन्यासनिष्ठैव ब्रह्मविद्या मोक्षसाधनम्]</sub> अधिकारस्तथापि<br>संन्यासनिष्ठैव ब्रह्म-<br>विद्या मोक्षसाधनं<br>न कर्मसहितेति ‘भैक्ष्यचर्यां<br>चरन्तः’ (मु० उ० १।२।११)<br>‘संन्यासयोगात्’ (मु० उ०<br>३।२।६) इति च ब्रुवन्दर्शयति ।यद्यपि ज्ञानमात्रमें सभी आश्रम-<br>वालोंका अधिकार है तथापि<br>ब्रह्मविद्या केवल संन्यासगत होनेपर<br>ही मोक्षका साधन होती है कर्म-<br>सहित नहीं—यह बात श्रुति<br>‘भैक्ष्यचर्यां चरन्तः’ ‘संन्यासयोगात्’<br>इत्यादि कहते हुए प्रदर्शित<br>करती है ।
मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १
(संस्कृत-भाष्य)(हिन्दी-अनुवाद)
ज्ञानकर्मविरोध-निरूपणम्<br>विद्याकर्मविरोधाच्च । न हि ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन सह कर्म स्वप्नेऽपि सम्पादयितुं शक्यम्। विद्यायाः कालविशेषाभावादनियतनिमित्तत्वात्कालसङ्कोचानुपपत्तिः ।इसके सिवा विद्या और कर्मका विरोध होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है। ब्रह्मात्मैक्यदर्शनके साथ तो कर्मोंका सम्पादन स्वप्नमें भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि विद्यासम्पादनका कोई कालविशेष नहीं है और न उसका कोई नियत निमित्त ही है; अतः किसी काल-विशेषद्वारा उसका संकोच कर देना उचित नहीं है।
यत्तु गृहस्थेषु ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृत्वादि लिङ्गं न तत्स्थितन्यायं बाधितुमुत्सहते । न हि विधिशतेनापि तमःप्रकाशयोरेकत्र सद्भावः शक्यते कर्तुं किमुत लिङ्गैः केवलैरिति ।गृहस्थोंमें जो ब्रह्मविद्याका सम्प्रदायकर्तृत्व आदि लिङ्ग (अस्तित्व-सूचक निदर्शन) देखा गया है वह पूर्वप्रदर्शित स्थिरतर नियमको बाधित करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि तम और प्रकाशकी एकत्र स्थिति तो सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं की जा सकती, फिर केवल लिङ्गोंकी तो बात ही क्या है ?
उपनिषच्छब्द-निरुक्तिः<br>एवमुक्तसम्बन्धप्रयोजनाया उपनिषदोऽल्पाक्षरं ग्रन्थविवरणमारभ्यते। य इमां ब्रह्मविद्यामुपयन्त्यात्मभावेन श्रद्धाभक्तिपुरःसराःइस प्रकार जिसके सम्बन्ध और प्रयोजनका निर्देश किया है उस [ मुण्डक ] उपनिषद्‌की यह संक्षिप्त व्याख्या आरम्भ की जाती है। जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आत्मभावसे इस ब्रह्मविद्याके समीप

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


सन्तस्तेषां गर्भजन्मजरारोगा-<br>द्यनर्थपूगं निशातयति परं वा<br>ब्रह्म गमयत्यविद्यादिसंसार-<br>कारणं चात्यन्तमवसादयति<br>विनाशयतीत्युपनिषत् । उपनि-<br>पूर्वस्य सदेरेवमर्थस्मरणात् ।जाते हैं यह उनके गर्भ, जन्म,<br>जरा और रोग आदि अनर्थसमूहका<br>छेदन करती है, अथवा उन्हें परब्रह्मको<br>प्राप्त करा देती है, या संसारके<br>कारणरूप अविद्या आदिका अत्यन्त<br>अवसादन—विनाश कर देती है;<br>इसीलिये इसे 'उपनिषद्' कहते हैं,<br>क्योंकि 'उप' और 'नि' पूर्वक 'सद्'<br>धातुका यही अर्थ माना गया है ।

आचार्यपरम्परा

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा- मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

सम्पूर्ण देवताओंमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ । वह विश्वका रचयिता और त्रिभुवनका रक्षक था । उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वाको समस्त विद्याओंकी आश्रयभूत ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया ॥ १ ॥

ब्रह्मा परिवृढो महान्धर्मज्ञान-<br>वैराग्यैश्वर्यैः सर्वानन्यानतिशेते<br>इति । देवानां द्योतनवतामिन्द्रा-<br>दीनां प्रथमो गुणैः प्रधानः सन्<br>प्रथमोऽग्रे वा सम्बभूवाभिव्यक्तः<br>सम्यक्स्वातन्त्र्येणेत्यभिप्रायः ।<br>न तथा यथा धर्माधर्मवशात्ब्रह्मा—परिवृढ ( सबसे बढ़ा<br>हुआ ) अर्थात् महान्, जो धर्म,<br>ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यमें अन्य सबसे<br>बढ़ा हुआ था, देवताओं—द्योतन<br>करनेवालों ( प्रकाशमानों ), इन्द्रा-<br>दिकोंमें प्रथम—गुणोंद्वारा प्रधान-<br>रूपसे अथवा सम्यक् स्वतन्त्रता-<br>पूर्वक सबसे पहले उत्पन्न हुआ<br>था यह इसका तात्पर्य है; क्योंकि<br>“जो यह अतीन्द्रिय, अग्राह्य…………है

६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १


संसारिणोऽन्ये जायन्ते ।<br><br>“योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः···”<br><br>(मनु० १।७) इत्यादिसमृतेः ।<br><br>विश्वस्य सर्वस्य जगतः कर्तोत्पादयिता । भुवनस्योत्पन्नस्य गोप्ता पालयितेति विशेषणं ब्रह्मणो विद्यास्तुतये । स एवं प्रख्यातमहत्त्वो ब्रह्मा ब्रह्मविद्यां ब्रह्मणः परमात्मनो विद्यां ब्रह्मविद्यां 'येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्' (मु०उ० १।२।१३) इति विशेषणात्परमात्मविषया हि सा ब्रह्मणा वाग्रजेनोक्तेति ब्रह्मविद्या तां सर्वविद्याप्रतिष्ठां सर्वविद्याभिव्यक्तिहेतुत्वात्सर्वविद्याश्रयामित्यर्थः; सर्वविद्यावेद्यं वा वस्त्वनयैव विज्ञायत इति,<br><br>“येनाश्रुतं श्रुतं भवति अमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्” (छा० उ० ६।१।३) इति श्रुतेः ।[ वह परमात्मा स्वयं उत्पन्न हुआ ]"<br>इत्यादि स्मृतिके अनुसार वह, जैसे अन्य संसारी जीव उत्पन्न होते हैं उस तरह धर्म या अधर्मके वशीभूत होकर उत्पन्न नहीं हुआ ।<br><br>'विश्व अर्थात् सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता—उत्पन्न करनेवाला तथा उत्पन्न हुए भुवनका गोप्ता—पालन करनेवाला' ये ब्रह्माके विशेषण [ उसकी उपदेश की हुई ] विद्याकी स्तुतिके लिये हैं । जिसका महत्त्व इस प्रकार प्रसिद्ध है उस ब्रह्माने ब्रह्मविद्याको—ब्रह्म यानी परमात्माकी विद्याको, जो 'जिससे अक्षर और सत्य पुरुषको जानता है' ऐसे विशेषणसे युक्त होनेके कारण, परमात्मसम्बन्धिनी ही है अथवा अग्रजन्मा ब्रह्माके द्वारा कही जानेके कारण जो ब्रह्मविद्या कहलाती है उस ब्रह्मविद्याको, जो समस्त विद्याओंकी अभिव्यक्तिकी हेतुभूत होनेसे, अथवा “जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, मनन न किया हुआ मनन हो जाता है तथा अज्ञात ज्ञात हो जाता है” इस श्रुतिके अनुसार इसीसे सर्वविद्यावेद्य वस्तुका ज्ञान होता है, इसलिये जो सर्वविद्याप्रतिष्ठा यानी सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रयभूता है, अपने ज्येष्ठ पुत्र

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


सर्वविद्याप्रतिष्ठामिति च स्तौति । विद्यामंथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह । ज्येष्ठश्चासौ पुत्रश्चानेकेषु ब्रह्मणः सृष्टिप्रकारेष्वन्यतमस्य सृष्टिप्रकारस्य प्रमुखे पूर्वमथर्वा सृष्ट इति ज्येष्ठस्तस्मै ज्येष्ठपुत्राय प्राहोक्तवान् ॥ १ ॥अथर्वासे कहा । यहाँ 'सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्' इस पदसे विद्याकी स्तुति करते हैं । जो ज्येष्ठ ( सबसे बड़ा ) पुत्र हो उसे ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं । ब्रह्माकी सृष्टिके अनेकों प्रकारोंमें किसी एक सृष्टिप्रकारके आदिमें सबसे पहले अथर्वाको ही उत्पन्न किया गया था, इसलिये वह ज्येष्ठ है। उस ज्येष्ठ पुत्रसे कहा ॥ १ ॥

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा- थर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥

अथर्वाको ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्मविद्या पूर्वकालमें अथर्वाने अङ्गीको सिखायी । अङ्गीने उसे भरद्वाजके पुत्र सत्यवहसे कहा तथा भरद्वाजपुत्र ( सत्यवह ) ने इस प्रकार श्रेष्ठसे कनिष्ठको प्राप्त होती हुई वह विद्या अङ्गिरासे कही ॥ २ ॥

यामेतामथर्वणे प्रवदेतावद्-ब्रह्मविद्यां ब्रह्मा तामेव ब्रह्मणः प्राप्तामथर्वा पुरा पूर्वमुवाचोक्तवानङ्गिरेऽङ्गिर्नाम्ने ब्रह्मविद्याम् । स चाङ्गीर्भारद्वाजाय भरद्वाज-जिस ब्रह्मविद्याको ब्रह्मा ने अथर्वासे कहा था, ब्रह्मासे प्राप्त हुई उसी ब्रह्मविद्याको पूर्वकालमें अथर्वाने अङ्गीसे यानी अङ्गी नामक मुनिसे कहा । फिर उस अङ्गी मुनिने उसे भारद्वाज सत्यवहसे यानी भरद्वाजगोत्रमें उत्पन्न

८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १

गोत्राय सत्यवहाय सत्यवहनाम्ने प्राह प्रोक्तवान्। भारद्वाजोऽङ्गिरसे स्वशिष्याय पुत्राय वा परावरां परस्मात्परस्मादवरेण प्राप्तेति परावरा परापरसर्वविद्याविषयव्याप्तेर्वा तां परावरामङ्गिरसे प्राहेत्यनुषङ्गः ॥ २ ॥हुए सत्यवह नामक मुनिसे कहा। तथा भारद्वाजने अपने शिष्य अथवा पुत्र अङ्गिरासे वह परावरा—पर (उत्कृष्ट) से अवर (कनिष्ठ) को प्राप्त हुई, अथवा पर और अवर सब विद्याओंके विषयोंकी व्याप्तिके कारण 'परावरा' कही जानेवाली वह विद्या अङ्गिरासे कही। इस प्रकार 'परावराम्' इस कर्मपदका पूर्वोक्त 'प्राह' क्रियासे सम्बन्ध है ॥ २ ॥

शौनकी गुरूपपत्ति और प्रश्न

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थने अङ्गिराके पास विधिपूर्वक जाकर पूछा—'भगवन् ! किसके जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?' ॥ ३ ॥

शौनकः शौनकस्यापत्यं महाशालो महागृहस्थोऽङ्गिरसं भारद्वाजशिष्यमाचार्यं विधिवद्यथाशास्त्रमित्येतत् । उपसन्न उपगतः सन्पप्रच्छ पृष्टवान् । शौनकाङ्गिरसोः संबन्धादर्वाग्महाशाल—महागृहस्थ शौनक—शुनकके पुत्रने भारद्वाजके शिष्य आचार्य अङ्गिराके पास विधिवत् अर्थात् शास्त्रानुसार जाकर पूछा। शौनक और अङ्गिराके सम्बन्धसे पश्चात् 'विधिवत्' विशेषण मिलनेसे

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९


विधिवद्विशेषणादुपसदनविधेः पूर्वेषामनियम इति गम्यते । मर्यादाकरणार्थं मध्यदीपिकान्यायार्थं वा विशेषणम्; अस्मदादिष्वप्युपसदनविधेरिष्टत्वात् । <br><br> किमित्याह—कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते नु इति वितर्के, भगवो हे भगवन्सर्वं यदिदं विज्ञेयं विज्ञातं विशेषेण ज्ञातमवगतं भवतीति एकस्मिञ्ज्ञाते सर्वविद्भवतीति शिष्टप्रवादं श्रुतवाञ्शौनकस्तद्विशेषं विज्ञातुकामः सन्कस्मिन्न्विति वितर्कयन्पप्रच्छ । अथवा लोकसामान्यदृष्ट्या ज्ञात्वैव पप्रच्छ । सन्ति लोकेयह जाना जाता है कि इनसे पूर्व आचार्योंमें [ गुरूपसदनका ] कोई नियम नहीं था । अतः इसकी मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये अथवा मध्यदीपिकान्यायके लिये* यह विशेषण दिया गया है, क्योंकि यह उपसदनविधि हमलोगोंमें भी माननीय है। <br><br> शौनकने क्या पूछा, सो बतलाते हैं—भगवः—हे भगवन् ! 'कस्मिन्नु' किस वस्तुके जान लिये जानेपर यह सब विज्ञेय पदार्थ विज्ञात—विशेषरूपसे ज्ञात यानी अवगत हो जाता है ? यहाँ 'नु' का प्रयोग वितर्क (संशय) के लिये किया गया है । शौनकने 'एकहीको जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है' ऐसी कोई सभ्य पुरुषोंकी कहावत सुनी थी । उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे ही उसने 'कस्मिन्नु' इत्यादि रूपसे वितर्क करते हुए पूछा । अथवा लोगोंकी सामान्य दृष्टिसे जान-बूझकर ही पूछा । लोकमें

* देहलीपर दीपक रखनेसे उसका प्रकाश भीतर-बाहर दोनों ओर पड़ता है—इसीको मध्यदीपिका या देहलीदीपन्याय कहते हैं। अतः यदि यह कथन इस न्यायसे ही हो तो यह समझना चाहिये कि गुरूपसदन-विधि इससे पूर्व भी थी और उससे पीछे हमलोगोंके लिये भी आवश्यक है; और यदि यह कथन मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये हो तो यह समझना चाहिये कि यहींसे इस पद्धतिका आरम्भ हुआ ।

१० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १ ]


सुवर्णादिशकलभेदाः सुवर्णत्वाद्येकत्वविज्ञानेन विज्ञायमाना लौकिकैः । तथा किं न्वस्ति सर्वस्य जगद्भेदस्यैकं कारणम्, यदेकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवतीति ।सुवर्णादि खण्डोंके ऐसे भेद हैं जो सुवर्णरूप होनेके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा [ स्वर्णदृष्टिसे ] उनकी एकताका ज्ञान होनेपर जान लिये जाते हैं । इसी प्रकार [ प्रश्न होता है कि ] 'सम्पूर्ण जगद्भेदका वह एक कारण कौन-सा है जिस एकके ही जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?'
नन्वविदिते हि कस्मिन्निति प्रश्नोऽनुपपन्नः । किमस्ति तदिति तदा प्रश्नो युक्तः । सिद्धे ह्यस्तित्वे कस्मिन्निति स्यात्, यथा कस्मिन्निधेयमिति ।शङ्का—जिस वस्तुका ज्ञान नहीं होता उसके विषयमें 'कस्मिन्' ( किसको )* इस प्रकार प्रश्न करना तो बन नहीं सकता । उस समय तो 'क्या वह है ?' ऐसा प्रश्न ही उचित है; फिर उसका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर ही 'कस्मिन्' ऐसा प्रश्न हो सकता है। जैसा कि [ अनेक आधारोंका ज्ञान होनेपर ] 'किसमें रखा जाय' ऐसा प्रश्न किया जाता है ।
न; अक्षरबाहुल्यादायासभीरुत्वात्प्रश्नः सम्भवत्येव कस्मिन्नेकस्मिन्विज्ञाते सर्ववित्स्यात् इति ॥ ३ ॥समाधान—ऐसा मत कहो, क्योंकि [ तुम्हारे कथनानुसार प्रश्न करनेसे ] अक्षरोंकी अधिकता होती है और अधिक आयासका भय रहता है, अतः 'किस एकके ही जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ?' ऐसा प्रश्न बन सकता है ॥ ३ ॥

* क्योंकि 'किस' या 'कौन' सर्वनामका प्रयोग वहीं होता है जहाँ अनेकोंकी सत्ता स्वीकारकर उनमेंसे किसी एकका निश्चय करना होता है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११


अङ्गिराका उत्तर—विद्या दो प्रकारकी है

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥

उससे उसने कहा—'ब्रह्मवेत्ताओंने कहा है कि दो विद्याएँ जाननेयोग्य हैं—एक परा और दूसरी अपरा' ॥ ४ ॥

संस्कृत टीकाहिन्दी अनुवाद
तस्मै शौनकायाङ्गिरा आह किलोवाच । किमित्युच्यते । द्वे विद्ये वेदितव्ये इत्येवं ह स्म किल यद्ब्रह्मविदो वेदार्थाभिज्ञाः परमार्थदर्शिनो वदन्ति । के ते इत्याह—परा च परमात्मविद्या । अपरा च धर्माधर्मसाधनतत्फलविषया ।उस शौनकसे अङ्गिराने कहा । क्या कहा ? सो बतलाते हैं—'दो विद्याएँ वेदितव्य अर्थात् जाननेयोग्य हैं' ऐसा जो ब्रह्मविद्—वेदके अर्थको जाननेवाले परमार्थदर्शी हैं वे कहते हैं। वे दो विद्याएँ कौन-सी हैं ? इसपर कहते हैं—परा अर्थात् परमात्मविद्या और अपरा—धर्म, अधर्मके साधन और उनके फलसे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ।'
ननु कस्मिन्विदिते सर्वमिदं भवतीति शौनकेन पृष्टं तस्मिन्वक्तव्येऽपृष्टमाहाङ्गिरा द्वे विद्ये इत्यादिना ।शङ्का— शौनक ने तो यह पूछा था कि 'किसको जान लेनेपर पुरुष सर्वज्ञ हो जाता है ?' उसके उत्तरमें जो कहना चाहिये था उसकी जगह 'दो विद्याएँ हैं' आदि बातें तो अङ्गिराने बिना पूछी ही कही हैं ।
नैष दोषः; क्रमापेक्षत्वात् प्रतिवचनस्य । अपरा हि विद्याविद्या सा निराकर्तव्या । तद्-समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्तर तो क्रमकी अपेक्षा रखता है । अपरा विद्या तो अविद्या ही है; अतः उसका निराकरण किया जाना चाहिये । उसके