भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९


मार्गेषु हि कर्मसु कर्मपरिणामा-किया जानेपर ही कर्मफलके अनुसार
नुरूपेण भूरादयः सत्यान्ताःभूर्लोकसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त
सप्त लोकाः फलं प्राप्यन्ते । तेसात लोक फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।
लोका एवंभूतेनाग्निहोत्रादि-वे लोक इस प्रकारके अग्निहोत्रादि
कर्मणा त्वप्राप्यत्वाद्विंस्यन्त इव ।कर्मसे तो अप्राप्य होनेके कारण
मानो नष्ट ही कर दिये जाते हैं ।
आयातमात्रं त्वव्यभिचारीत्यतोहाँ उसका परिश्रममात्र फल तो
हिनस्तीत्युच्यते ।अव्यभिचारी—अनिवार्य है, इसी-
लिये 'हिनस्ति' [ अर्थात् वह
अग्निहोत्र उसके सातों लोकोंको
नष्ट कर देता है ] ऐसा कहा है ।
पिण्डदानाद्यनुग्रहेण वाअथवा पिण्डदानादि अनुग्रहके
द्वारा यजमानसे सम्बद्ध पिता,
सम्बन्ध्यमानाः पितृपितामह-पितामह और प्रपितामह [ ये तीन
पूर्वपुरुष ] तथा पुत्र, पौत्र और
प्रपितामहाः पुत्रपौत्रप्रपौत्राःप्रपौत्र [ ये तीन आगे होनेवाली
सन्ततियाँ ये ही अपने सहित ]
स्वात्मोपकाराः सप्त लोका उक्त-अपना उपकार करनेवाले सात
लोक हैं । ये उक्त प्रकारके अग्निहोत्र
प्रकारेणाग्निहोत्रादिना न भव-आदिसे प्राप्त नहीं होते; इसलिये 'नष्ट
कर दिये जाते हैं' इस प्रकार कहा
न्तीति हिंस्यन्त इत्युच्यते ॥३॥जाता है ॥ ३ ॥

अग्निकी सात जिह्वाएँ

काली कराली च मनोजवा च
सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।