भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९


मार्गेषु हि कर्मसु कर्मपरिणामा-किया जानेपर ही कर्मफलके अनुसार
नुरूपेण भूरादयः सत्यान्ताःभूर्लोकसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त
सप्त लोकाः फलं प्राप्यन्ते । तेसात लोक फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।
लोका एवंभूतेनाग्निहोत्रादि-वे लोक इस प्रकारके अग्निहोत्रादि
कर्मणा त्वप्राप्यत्वाद्विंस्यन्त इव ।कर्मसे तो अप्राप्य होनेके कारण
मानो नष्ट ही कर दिये जाते हैं ।
आयातमात्रं त्वव्यभिचारीत्यतोहाँ उसका परिश्रममात्र फल तो
हिनस्तीत्युच्यते ।अव्यभिचारी—अनिवार्य है, इसी-
लिये 'हिनस्ति' [ अर्थात् वह
अग्निहोत्र उसके सातों लोकोंको
नष्ट कर देता है ] ऐसा कहा है ।
पिण्डदानाद्यनुग्रहेण वाअथवा पिण्डदानादि अनुग्रहके
द्वारा यजमानसे सम्बद्ध पिता,
सम्बन्ध्यमानाः पितृपितामह-पितामह और प्रपितामह [ ये तीन
पूर्वपुरुष ] तथा पुत्र, पौत्र और
प्रपितामहाः पुत्रपौत्रप्रपौत्राःप्रपौत्र [ ये तीन आगे होनेवाली
सन्ततियाँ ये ही अपने सहित ]
स्वात्मोपकाराः सप्त लोका उक्त-अपना उपकार करनेवाले सात
लोक हैं । ये उक्त प्रकारके अग्निहोत्र
प्रकारेणाग्निहोत्रादिना न भव-आदिसे प्राप्त नहीं होते; इसलिये 'नष्ट
कर दिये जाते हैं' इस प्रकार कहा
न्तीति हिंस्यन्त इत्युच्यते ॥३॥जाता है ॥ ३ ॥

अग्निकी सात जिह्वाएँ

काली कराली च मनोजवा च
सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।

३० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १


स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥

काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची देवी—ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥

कालीकरालीचमनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः । काल्याद्या विश्वरुच्यन्ता लेलायमाना अग्नेर्हविराहुतिग्रसनार्था एताः सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची देवी—ये अग्निकी लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। कालीसे लेकर विश्वरुचीतक—ये अग्निकी सात चञ्चल जिह्वाएँ हवि—आहुतिका ग्रास करनेके लिये हैं ॥ ४ ॥

विधिवत् अग्निहोत्रादिसे स्वर्गप्राप्ति

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥

जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्निशिखाओंमें यथासमय आहुतियाँ देता हुआ [ अग्निहोत्रादि कर्मका ] आचरण करता है उसे ये सूर्यकी किरणें होकर वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी [ इन्द्र ] रहता है ॥ ५ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


एतेष्वग्निजिह्वाभेदेषु योऽग्निहोत्री चरते कर्माचरत्यग्निहोत्रादि भ्राजमानेषु दीप्यमानेषु । यथाकालं च यस्य कर्मणो यः कालस्तत्कालं यथाकालं यजमानमाददायन्नाददाना आहुतयो यजमानेन निर्वर्त्तितास्तं नयन्ति प्रापयन्त्येता आहुतयो या इमा अनेन निर्वर्त्तिताः सूर्यस्य रश्मयो भूत्वा रश्मिद्वारैरित्यर्थः । यत्र यस्मिन्स्वर्गे देवानां पतिरिन्द्र एकः सर्वानुपर्यधि वसतीत्यधिवासः ॥ ५ ॥जो अग्निहोत्री इन भ्राजमान—दीप्तिमान् अग्निजिह्वाके भेदोंमें यथाकाल यानी जिस कर्मका जो काल है उस कालका अतिक्रमण न करते हुए अग्निहोत्रादि कर्मका आचरण करता है, उस यजमानको इसकी दी हुई वे आहुतियाँ सूर्यकी किरणें होकर अर्थात् सूर्यकी किरणोंद्वारा वहाँ पहुँचा देती हैं जहाँ—जिस स्वर्गलोकमें देवताओंका एकमात्र पति इन्द्र सबके ऊपर अधिवास—अधिष्ठान करता है ।५।

कथं सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्तीत्युच्यते—वे सूर्यकी किरणोंद्वारा यजमानको किस प्रकार ले जाती हैं, सो बतलाया जाता है—

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः
सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य
एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥

वे दीप्तिमती आहुतियाँ 'आओ, आओ, यह तुम्हारे सुकृतसे प्राप्त हुआ पवित्र ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है' ऐसी प्रियवाणी कहकर यजमानका अर्चन (सत्कार) करती हुई उसे ले जाती हैं ॥ ६ ॥

३२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १


एह्येहीत्याह्वयन्त्यः सुवर्चसो दीप्तिमत्यः किं च प्रियाम् इष्टां वाचं स्तुत्यादिलक्षणामभिवदन्त्य उच्चारयन्त्योऽर्चयन्त्यः पूजयन्त्यश्चैष वो युष्माकं पुण्यः सुकृतः पन्था ब्रह्मलोकः फलरूपः। एवं प्रियां वाचमभिवदन्त्यो वहन्तीत्यर्थः । ब्रह्मलोकः स्वर्गः प्रकरणात् ॥ ६ ॥वे दीप्तिमती आहुतियाँ 'आओ, आओ' इस प्रकार पुकारती तथा प्रिय यानी स्तुति आदिरूप इष्ट वाणी बोलकर उसका अर्चन—पूजन करती हुई अर्थात् 'यह तुम्हारे सुकृतका फल-स्वरूप पवित्र ब्रह्मलोक है' इस प्रकार प्रिय वाणी कहती हुई उसे ले जाती हैं । यहाँ स्वर्गहीको ब्रह्मलोक कहा है, क्योंकि प्रकरणसे यही ठीक मालूम होता है ॥६॥

ज्ञानरहित कर्मकी निन्दा

एतच्च ज्ञानरहितं कर्मैतावत्फलमविद्याकामकर्मकार्यमतोऽसारं दुःखमूलमिति निन्द्यते—इस प्रकार यह ज्ञानरहित कर्म इतने ही फलवाला है । यह अविद्या काम और कर्मका कार्य है; इसलिये असार और दुःखकी जड़ है, सो इसकी निन्दा की जाती है—

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा
अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा
जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥

जिनमें [ ज्ञानबाह्य होनेसे ] अवर—निकृष्टकर्म आश्रित कहा गया है वे [ सोलह ऋत्विक् तथा यजमान और यजमानपत्नी ] ये अठारह यज्ञरूप ( यज्ञके साधन ) अस्थिर एवं नाशवान् बतलाये गये हैं। जो मूढ 'यही श्रेय है' इस प्रकार इनका अभिनन्दन करते हैं, वे फिर भी जरा-मरणको प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


प्लवा विनाशिन इत्यर्थः । हि यस्मादेतेऽदृढा अस्थिरा यज्ञरूपा यज्ञस्य रूपाणि यज्ञरूपा यज्ञनिर्वर्तका अष्टादशाष्टादशसंख्याकाः षोडशर्त्विजः पत्नी यजमानश्चेत्यष्टादश, एतदाश्रयं कर्मोक्तं कथितं शास्त्रेण, येष्वष्टादशस्ववरं केवलं ज्ञानवर्जितं कर्म; अतस्तेषामवरकर्माश्रयाणामष्टादशानामदृढतया प्लवत्वात्प्लवते सह फलेन तत्साध्यं कर्म ; कुण्डविनाशादिव क्षीरदध्यादीनां तत्स्थानां नाशः ।‘प्लव’ का अर्थ विनाशी है । क्योंकि सोलह ऋत्विक् तथा यजमान और पत्नी—ये अठारह यज्ञरूप—यज्ञके रूप यानी यज्ञके सम्पादक, जिनमें केवल ज्ञानरहित कर्म आश्रित है, अदृढ—अस्थिर हैं और शास्त्रोंमें इन्हींके आश्रित कर्म बतलाया है; अतः उस अवर कर्मके उन अठारह आश्रयोंके अदृढ़तावश प्लव अर्थात् विनाशशील होनेके कारण उनसे निष्पन्न होनेवाला कर्म, कूँडेके नाशसे उसमें रखे हुए दूध और दही आदिके नाशके समान, नष्ट हो जाता है ।
यत एवमेतत्कर्म श्रेयः श्रेयःकरणमिति येऽभिनन्दन्त्यभिहृष्यन्त्यविवेकिनो मूढा अतस्ते जरां च मृत्युं च जरामृत्युं किञ्चित्कालं स्वर्गे स्थित्वा पुनरेवापि यन्ति -भूयोऽपि गच्छन्ति ॥७॥क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये जो अविवेकी मूढ़ पुरुष ‘यह कर्म श्रेय यानी श्रेयका साधन है’ ऐसा मानकर अभिनन्दित—अत्यन्त हर्षित होते हैं वे इस (हर्ष) के द्वारा जरा और मृत्युको प्राप्त होते हैं; अर्थात् कुछ समय स्वर्गमें रहकर फिर भी उसी जन्म-मरणको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

३५मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

अविद्याग्रस्त कर्मठोंकी दुर्दशा

किञ्च— | तथा—

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥

अविद्याके मध्यमें रहनेवाले और अपनेको बड़ा बुद्धिमान् तथा पण्डित माननेवाले वे मूढ पुरुष अन्धेसे ले जाये जाते हुए अन्धेके समान पीडित होते सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ८ ॥

अविद्यायामन्तरे मध्ये वर्तमाना अविवेकप्रायाः स्वयं वयमेव धीरा धीमन्तः पण्डिता विदितवेदितव्याश्चेति मन्यमाना आत्मानं सम्भावयन्तस्ते च जङ्घन्यमाना जरारोगाद्यनेकानर्थव्रातैः हन्यमाना भृशं पीड्यमानाः परियन्ति विभ्रमन्ति मूढाः । दर्शनवर्जितत्वादन्धेनैवाचक्षुष्केणैव नीयमानाः प्रदर्श्यमानमार्गा यथा लोकेऽन्धा अक्षिरहिता गर्तकण्टकादौ पतन्ति तद्वत् ॥ ८ ॥अविद्याके मध्यमें रहनेवाले बहुधा अविवेकी किन्तु 'हम ही बड़े बुद्धिमान् और पण्डित—ज्ञेय वस्तुको जाननेवाले हैं' ऐसा मानकर अपनेको सम्मानित करनेवाले वे मूढ पुरुष—जरारोग आदि अनेक अनर्थजालसे जङ्घन्यमान—हन्यमान अर्थात् अत्यन्त पीड़ित होते सब ओर घूमते—भटकते रहते हैं । जिस प्रकार लोकमें दृष्टिहीन होनेके कारण अन्धे अर्थात् नेत्रहीनसे ले जाये जाते हुए—मार्ग प्रदर्शित किये जाते हुए अन्धे—नेत्रहीन पुरुष गड्ढे और काँटे आदिमें गिरते रहते हैं उसी प्रकार [ वे भी पीडा-पर-पीडा उठाते रहते हैं] ॥८॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५


किञ्च—तथा—

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना
वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागा-
त्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ६ ॥

बहुधा अविद्यामें ही रहनेवाले वे मूर्खलोग 'हम कृतार्थ हो गये हैं' इस प्रकार अभिमान किया करते हैं। क्योंकि कर्मठलोगोंको कर्मफलविषयक रागके कारण तत्त्वका ज्ञान नहीं होता, इसलिये वे दुःखार्त्त होकर [ कर्मफल क्षीण होनेपर ] स्वर्गसे च्युत हो जाते हैं ॥ ९ ॥

अविद्यायां बहुधा बहुप्रकारं वर्तमाना वयमेव कृतार्थाः कृतप्रयोजना इत्येवमभिमन्यन्त्यभिमानं कुर्वन्ति बाला अज्ञानिनः । यद्यस्मादेवं कर्मिणो न प्रवेदयन्ति तत्त्वं न जानन्ति रागात्कर्मफलरागाभिभवनििमत्तं तेन कारणेन आतुरा दुःखार्ताः सन्तः क्षीणलोकाः क्षीणकर्मफलाः स्वर्गलोकाच्च्यवन्ते ॥९॥अविद्यामें बहुधा—अनेक प्रकारसे विद्यमान वे अज्ञानी पुरुष 'केवल हम ही कृतार्थ—कृतकृत्य हो गये हैं' इसी प्रकार अभिमान किया करते हैं। क्योंकि इस प्रकार वे कर्मीलोग रागवश यानी कर्मफलसम्बन्धी रागसे बुद्धिके अभिभूत हो जानेके कारण तत्त्वको नहीं जान पाते इसलिये वे आतुर—दुःखार्त्त होकर कर्मफल क्षीण हो जानेपर स्वर्गसे च्युत हो जाते हैं॥९॥

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वे-
मं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०॥

३६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही सर्वोत्तम माननेवाले वे महामूढ़ किसी अन्य वस्तुको श्रेयस्कर नहीं समझते। वे स्वर्गलोकके उच्च स्थानमें अपने कर्मफलोंका अनुभव कर इस [मनुष्य] लोक अथवा इससे भी निकृष्ट लोकमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इष्टं यागादि श्रौतं कर्म, पूर्तं वापीकूपतडागादि स्मार्तं मन्यमाना एतदेवातिशयेन पुरुषार्थसाधनं वरिष्ठं प्रधानमिति चिन्तयन्तोऽन्यदात्मज्ञानाख्यं श्रेयःसाधनं न वेदयन्ते न जानन्ति, प्रमूढाः पुत्रपशुबान्धवादिषु प्रमत्ततया मूढाः । ते च नाकस्य स्वर्गस्य पृष्ठ उपरिस्थाने सुकृते भोगायतनेऽनुभूत्वानुभूय कर्मफलं पुनरिमं लोकं मानुषमस्माद्धीनतरं वा तिर्यङ्नरकादिलक्षणं यथाकर्मशेषं विशन्ति ॥१०॥इष्ट यानी यागादि श्रौतकर्म और पूर्त—वापी-कूप-तडागादि स्मार्त कर्म 'ये ही अधिकतासे पुरुषार्थके साधन हैं, अतः ये ही सर्वश्रेष्ठ यानी प्रधान हैं' इस प्रकार मानते अर्थात् चिन्तन करते हुए वे प्रमूढ—प्रमत्ततावश पुत्र, पशु और बान्धवादिमें मूढ हुए लोग आत्मज्ञानसंज्ञक किसी और श्रेयःसाधनको नहीं जानतेवे नाक यानी स्वर्गके पृष्ठ—उच्च स्थानमें अपने सुकृत—भोगायतन (पुण्यभोगके लिये प्राप्त हुए दिव्य देह) में कर्मफलका अनुभव कर अपने अवशिष्ट कर्मानुसार फिर इसी मनुष्यलोक अथवा इससे निकृष्टतर तिर्यङ्नरकादिरूप योनियोंमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये

शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः ।

सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति

यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


किन्तु जो शान्त और विद्वान्लोग वनमें रहकर भिक्षावृत्तिका आचरण करते हुए तप और श्रद्धाका सेवन करते हैं वे पापरहित होकर सूर्य्यद्वार ( उत्तरायणमार्ग ) से वहाँ जाते हैं जहाँ वह अमृत और अव्यय-स्वरूप पुरुष रहता है ॥ ११ ॥

ये पुनस्तद्विपरीता ज्ञानयुक्ता वानप्रस्थाः संन्यासिनश्च तपःश्रद्धे हि तपः स्वाश्रमविहितं कर्म श्रद्धा हिरण्यगर्भादिविषया विद्या; ते तपःश्रद्धे उपवसन्ति सेवन्तेऽरण्ये वर्तमानाः सन्तः; शान्ता उपरतकरणग्रामाः, विद्वांसो गृहस्थाश्च ज्ञानप्रधाना इत्यर्थः । भैक्ष्यचर्यां चरन्तः परिग्रहाभावादुपवसन्त्यरण्य इति सम्बन्धः सूर्य्यद्वारेण सूर्य्योपलक्षितेनोत्तरायणेन पथा ते विरजा विरजसः क्षीणपुण्यपापकर्माणः सन्तः इत्यर्थः; प्रयान्ति प्रकर्षेण यान्ति यत्र यस्मिन्सत्यलोकादावमृतः स पुरुषः प्रथमजो हिरण्यगर्भो ह्यव्ययात्माव्ययस्वभावो यावत्संसारस्थायी । एतदन्तास्तु संसारगतयोऽपरविद्यागम्याः ।किन्तु इसके विपरीत जो ज्ञानसम्पन्न वानप्रस्थ और संन्यासी लोग तप और श्रद्धाका—अपने आश्रमविहित कर्मका नाम ‘तप’ है और हिरण्यगर्भादिविषयक विद्याको ‘श्रद्धा’ कहते हैं, उन तप और श्रद्धाका वनमें रहकर सेवन करते हैं; तथा जो शान्त—जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं ऐसे विद्वान्लोग तथा ज्ञानप्रधान गृहस्थलोग परिग्रह न करनेके कारण भिक्षाचर्याका आचरण करते हुए वनमें रहते हैं वे विरज अर्थात् जिनके पाप-पुण्य क्षीण हो गये हैं ऐसे होकर सूर्य्यद्वारसे—सूर्योपलक्षित उत्तरमार्गसे वहाँ प्रयाण करते—प्रकर्षतः गमन करते हैं जहाँ—जिस सत्यलोकादिमें वह अमृत और अव्ययात्मा—संसारकी स्थितिपर्यन्त रहनेवाला अव्ययस्वभाव पुरुष अर्थात् सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ रहता है । अपरा विद्यासे प्राप्त होनेवाली सांसारिक गतियाँ तो बस यहींतक हैं ।
३८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

| ननु-एतं मोक्षमिच्छन्ति केचित् । | शङ्का— परन्तु कोई-कोई तो इसीको मोक्ष समझते हैं ? | | न; "इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" (मु० उ० ३ । २ । २)<br><br>"ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति" (मु० उ० ३ । २ । ५) इत्यादि-श्रुतिभ्योऽप्रकरणाच्च । अपर-विद्याप्रकरणे हि प्रवृत्ते न ह्यक-स्मान्मोक्षप्रसङ्गोऽस्ति । विरज-स्त्वं त्वापेक्षिकम् । समस्तमपर-विद्याकार्यं साध्यसाधनलक्षणं क्रियाकारकफलभेदभिन्नं द्वैतम् एतावदेव यद्धिरण्यगर्भप्राप्त्यव-सानम् । तथा च मनुनेोक्तं स्था-वराद्यां संसारगतिमनुक्रामता<br><br>"ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महान-व्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्वि- | समाधान— ऐसा समझना उचित नहीं है। "उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" "वे संयतचित्त धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्मको सब ओर प्राप्तकर सभीमें प्रवेश कर जाते हैं" इत्यादि श्रुतियोंसे [ ब्रह्म-वेत्ताको इसी लोकमें सम्पूर्ण कामना-ओंसे मुक्ति और सर्वात्मभावकी प्राप्ति बतलायी गयी है ] । इसके सिवा यह मोक्षका प्रकरण भी नहीं है । अपरा विद्याके प्रकरणके चालू रहते हुए अकस्मात् मोक्षका प्रसङ्ग नहीं आ सकता । और उसकी विरजस्कता ( निष्पापता ) तो आपेक्षिक है । अपरा विद्याका समस्त कार्य साध्य-साधनरूप, क्रिया-कारक और फलरूप भेदोंसे भिन्न तथा द्वैतमय होनेसे इतना ही है जिसका कि हिरण्यगर्भकी प्राप्तिमें ही पर्यवसान होता है । स्थावरोंसे लेकर क्रमशः संसारगतिकी गणना करते हुए मनुजीने भी ऐसा ही कहा है—"ब्रह्मा, मरीचि आदि प्रजापतिगण, यमराज, महत्तत्त्व और अव्यक्त

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९


कीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः" (मनु० १२।५०) इति ॥११॥होना ]—यह विद्वानोंने उत्तम सात्त्विकी गति बतलायी है"॥११॥

ऐहिक और पारलौकिक भोगोंकी असारता देखनेवाले पुरुषके लिये संन्यास और गुरूपसदनका विधान

अथेदानीमसात्साध्यसाधनरूपात्सर्वस्मात्संसाराद्विरक्तस्य परस्यां विद्यायामधिकारप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—तत्पश्चात् अब इस साध्य-साधनरूप सम्पूर्ण संसारसे विरक्त हुए पुरुषका परा विद्यामें अधिकार दिखानेके लिये यह कहा जाता है—

परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो

निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्

समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२॥

कर्मद्वारा प्राप्त हुए लोकोंकी परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेदको प्राप्त हो जाय, [क्योंकि संसारमें] अकृत (नित्य पदार्थ) नहीं है, और कृतसे [हमें प्रयोजन क्या है ?] अतः उस नित्य वस्तुका साक्षात् ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही पास जाना चाहिये ॥ १२ ॥

परीक्ष्य यदेतदृग्वेदाद्यपरविद्याविषयं स्वाभाविक्याविद्याकामकर्मदोषवत्पुरुषानुष्ठेयम् अविद्यादिदोषवन्तमेव पुरुषं प्रति विहितत्वात्तदनुष्ठानकार्यभूताश्चयह जो ऋग्वेदादि अपरविद्याविषयक, तथा अविद्यादि दोषयुक्त पुरुषके लिये ही विहित होनेके कारण स्वभावसे ही अविद्या काम और कर्मरूप दोषसे युक्त पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान किये जानेयोग्य कर्म है तथा उसके अनुष्ठानके कार्यभूत
४०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

लोका ये दक्षिणोत्तरमार्गलक्षणाः फलभूताः, ये च विहिताकरण-प्रतिषेधातिक्रमदोषसाध्या नरक-तिर्यक्प्रेतलक्षणास्तानेतानपरीक्ष्य प्रत्यक्षानुमानोपमानागमैः सर्वतो याथात्म्येनावधार्य । लोकान् संसारगतिभूतान् अव्यक्तादि-स्थावरान्तानव्याकृताव्याकृत-लक्षणान् बीजाङ्कुरवदितरेतरोत्प-त्तिनिमित्ताननेकानर्थशतसहस्र-सङ्कुलान्कदलीगर्भषदसारान् मायामरीच्युदकगन्धर्वनगराकार-स्वप्नजलबुद्बुदफेनसमान्प्रति-क्षणप्रध्वंसानपृष्ठतः कृत्वाविद्या-कामदोषप्रवर्तितकर्मचितान्धर्मा-धर्मनिर्वर्त्तितानित्येतत् । ब्राह्मण-स्यैव विशेषतोऽधिकारः सर्वत्या-गेन ब्रह्मविद्यायामिति ब्राह्मण-ग्रहणम्।परीक्ष्य लोकान्किं कुर्यात्अर्थात् फलरूप दक्षिण एवं उत्तरमार्गरूप लोक हैं और विहित कर्मके न करने एवं प्रतिषिद्धके करनेके दोषसे प्राप्त होनेवाली जो नरक, तिर्यक् तथा प्रेतादि योनियाँ हैं उन इन सभीकी परीक्षा कर अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम—इन चारों प्रमाणोंसे सब प्रकार उनका यथावत् निश्चय कर जो बीज और अङ्कुरके समान एक-दूसरेकी उत्पत्तिके कारण हैं अनेकों—सैकड़ों-हजारों अनर्थोंसे व्याप्त हैं, केलेके भीतरी भागके समान सारहीन हैं, माया, मृगजल और गन्धर्वनगरके समान भ्रमपूर्ण तथा स्वप्न, जलबुद्बुद और फेनके सदृश क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं और अविद्या एवं कामरूप दोषसे प्रवर्तित कर्मोंसे प्राप्त यानी धर्मा-धर्मजनित हैं उन व्यक्त-अव्यक्तरूप तथा संसारगतिभूत अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त लोकोंकी ओरसे मुख मोड़कर ब्राह्मण [ उनसे विरक्त हो जाय ] । सर्व-त्यागके द्वारा ब्राह्मणका ही ब्रह्म-विद्यामें विशेषरूपसे अधिकार है; इसलिये यहाँ 'ब्राह्मण' पदका ग्रहण किया गया है। इस प्रकार लोकोंकी परीक्षा कर वह क्या करे, सो बत-
इत्युच्यते—निर्वेदं निःपूर्वोलाते हैं—‘निर्वेद करे’। यहाँ ‘नि’
विदिरत्र वैराग्यार्थे वैराग्य-पूर्वक ‘विद्’ धातु वैराग्य अर्थमें है;
मायात्कुर्यादित्येतत् ।अतः तात्पर्य यह है कि ‘वैराग्य करे’।
स वैराग्यप्रकारः प्रदर्श्यते ।अब वह वैराग्यका प्रकार
इह संसारे नास्ति कश्चिदप्यकृतःदिखलाया जाता है । इस संसारमें
पदार्थः । सर्व एव हि लोकाःकोई भी अकृत (नित्य) पदार्थ
कर्मचिताः कर्मकृतत्वाच्चानित्याः,नहीं है । सभी लोक कर्मसे सम्पादन
न नित्यं किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः।किये जानेवाले हैं और कर्मकृत
सर्वं तु कर्मानित्यस्यैव साधनम्।होनेके कारण अनित्य हैं । तात्पर्य
यस्माच्चतुर्विधमेव हि सर्वं कर्मयह कि इस संसारमें नित्य कुछ भी
कार्यमुत्पाद्यमाप्यं संस्कार्यंनहीं है । सारा कर्म अनित्य फलका
विकार्यं वा, नातः परं कर्मणोकार्य, उत्पाद्य, आप्य और विकार्य
विशेषोऽस्ति । अहं च नित्येनअथवा संस्कार्य चार ही प्रकारके
अमृतेनाभयेन कूटस्थेनाचलेनहैं, इनसे भिन्न कर्मका और कोई
ध्रुवेणार्थेनार्थी न तद्विपरीतेन ।प्रकार नहीं है । किन्तु मैं तो एक
अतः किं कृतेन कर्मणायासबहु-नित्य, अमृत, अभय, कूटस्थ, अचल
लेनानर्थसाधनेनेत्येवं निर्विण्णो-और ध्रुव पदार्थकी इच्छा करनेवाला
ऽभयं शिवमकृतं नित्यं पदंहूँ; उससे विपरीत स्वभाववालेकी
यत्तद्विज्ञानार्थं विशेषेणाधिगमार्थंमुझे आवश्यकता नहीं है । अतः
स निर्विण्णो ब्राह्मणो गुरुमेवा-इस श्रमबहुल एवं अनर्थके साधन-
चार्यं शमदमदयादिसम्पन्नमभि-भूत कृत—कर्मसे मुझे क्या प्रयो-
गच्छेत्। शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येणजन है? इस प्रकार विरक्त होकर जो
अभय, शिव, अकृत और नित्य-
पद है उसके विज्ञानके लिये—
विशेषतया जाननेके लिये वह विरक्त
ब्राह्मण शम-दमादिसम्पन्न गुरु यानी
आचार्यके पास ही जाय । शास्त्रज्ञ
होनेपर भी स्वतन्त्रतापूर्वक ब्रह्मज्ञान-

४२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १


ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यादित्येतद्<br><br>गुरुमेवेत्यवधारणफलम् ।<br><br>समित्पाणिः समिद्भारगृहीत-<br><br>हस्तः श्रोत्रियमध्ययनश्रुतार्थ-<br><br>सम्पन्नं ब्रह्मनिष्ठम् । हित्वा सर्व-<br><br>कर्माणि केवलेऽद्वये ब्रह्मणि निष्ठा<br><br>यस्य सोऽयं ब्रह्मनिष्ठो जपनिष्ठ-<br><br>स्तपोनिष्ठ इति यद्वत् । न हि<br><br>कर्मिणो ब्रह्मनिष्ठता सम्भवति<br><br>कर्मात्मज्ञानयोर्विरोधात् । स<br><br>तं गुरुं विधिवदुपसन्नः प्रसाद्य<br><br>पृच्छेदक्षरं पुरुषं सत्यम् ॥१२॥का अन्वेषण न करे—यही ‘गुरुमेव’ इस पदसमूहमें आये हुए निश्चयात्मक ‘एव’ पदका अभिप्राय है ।<br><br>समित्पाणिः अर्थात् हाथमें समिधाओंका भार लेकर श्रोत्रिय यानी अध्ययन और श्रवण किये अर्थसे सम्पन्न तथा ब्रह्मनिष्ठ [ गुरुके पास जाय ]—सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर जिसकी केवल अद्वितीय ब्रह्ममें ही निष्ठा है वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है; जपनिष्ठ तपोनिष्ठ आदिके समान ही यह ‘ब्रह्मनिष्ठ’ शब्द है । कर्मठ पुरुषको ब्रह्मनिष्ठा कभी नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म और आत्मज्ञानका परस्पर विरोध है । इस प्रकार उन गुरुदेवके पास विधिपूर्वक जाकर उन्हें प्रसन्नकर सत्य और अक्षर पुरुषके सम्बन्धमें पूछे ॥ १२ ॥

गुरुके लिये उपदेशप्रदानकी विधि

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्य-
क्प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं
प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३


वह विद्वान् गुरु अपने समीप आये हुए उस पूर्णतया शान्तचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्यको उस ब्रह्मविद्याका तत्त्वतः उपदेश करे जिससे उस सत्य और अक्षर पुरुषका ज्ञान होता है ॥ १३ ॥

तस्मै स विद्वान् गुरुर्ब्रह्मविद् उपसन्नायोपगताय सम्यग्यथाशास्त्रमित्येतत् , प्रशान्तचित्ताय उपरतदर्पादिदोषाय शमान्विताय बाह्येन्द्रियोपरमेण च युक्ताय सर्वतो विरक्तायेत्येतत् । येन विज्ञानेन यया विद्यया परयाक्षरमद्रेश्यादिविशेषणं तद्देवाक्षरं पुरुषशब्दवाच्यं पूर्णत्वात् पुरिशयनाच्च सत्यं तदेव परमार्थस्वाभाव्यादक्षरं चाक्षरणादक्षतत्वादक्षयत्वाच्च वेद विजानाति तां ब्रह्मविद्यां तत्त्वतो यथावत् प्रोवाच प्रब्रूयादित्यर्थः। आचार्यस्याप्ययं नियमो यन्न्यायप्राप्तसच्छिष्यनिस्तारणमविद्यामहोदधेः ॥ १३ ॥वह विद्वान्—ब्रह्मवेत्ता गुरु अपने समीप आये हुए उस सम्यक्—यथाशास्त्र प्रशान्तचित्त—गर्व आदि दोषोंसे रहित तथा शमसम्पन्न—बाह्य इन्द्रियोंकी उपरतिसे युक्त और सब ओरसे विरक्त हुए शिष्यको, जिस विज्ञान अथवा जिस परा विद्यासे उस अद्रेश्यादि विशेषणवाले तथा पूर्ण होने या शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण 'पुरुष' शब्दवाच्य अक्षरको, जो क्षरण (च्युत होना) क्षत (व्रण) और क्षय (नाश) से रहित होनेके कारण 'अक्षर' कहलाता है, जानता है उस ब्रह्मविद्याका तत्त्वतः—यथावत् उपदेश करे—यह इसका भावार्थ है। आचार्यके लिये भी यही नियम है कि न्यायानुसार अपने समीप आये हुए सच्छिष्यको अविद्यामहासमुद्रसे पार कर दे ॥ १३ ॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

समाप्तमिदं प्रथमं मुण्डकम् ।

द्वितीय मुण्डक (प्रथम खण्ड) - ब्रह्मका विश्वरूप व सर्वकारणत्व

द्वितीय मुण्डक

प्रथम खण्ड


वक्ष्यमाणग्रन्थस्य प्रयोजनम्
अपरविद्यायाः सर्वं कार्यम्<br>उक्तम् । स च<br>संसारो यत्सारो<br>यस्मान्मूलादक्षरात्<br>सम्भवति यस्मिंश्च प्रलीयते तद-<br>क्षरं पुरुषाख्यं सत्यम्। यस्मिन्<br>विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति<br>तत्परस्या ब्रह्मविद्याया विषयः<br>स वक्तव्य इत्युत्तरो ग्रन्थ<br>आरभ्यते—यहाँतक अपरा विद्याका सारा कार्य कहा । यही संसार है; उसका जो सार है, जिस अपने मूलभूत अक्षरसे वह उत्पन्न होता है और जिसमें उसका लय होता है वह पुरुषसंज्ञक अक्षरब्रह्म ही सत्य है, जिसका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है, वह परा विद्याका विषय है। उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

अग्निसे स्फुलिङ्गोंके समान ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥

वह यह (अक्षरब्रह्म) सत्य है। जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्निसे उसीके समान रूपवाले हजारों स्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, हे सोम्य ! उसी प्रकार उस अक्षरसे अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ १ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५


यदपरविद्याविषयं कर्मफललक्षणं सत्यं तदापेक्षिकम् । इदं तु परविद्याविषयं परमार्थसल्लक्षणत्वात् । तदेतत्सत्यं यथाभूतं विद्याविषयम्, अविद्याविषयत्वाच्चानृतमितरत् । अत्यन्तपरोक्षत्वात्कथं नाम प्रत्यक्षवत्सत्यम् अक्षरं प्रतिपद्येरन्निति दृष्टान्तमाह-जो अपरा विद्याका विषय कर्मफलरूप सत्य है वह आपेक्षिक है; परन्तु यह परा विद्याका विषय परमार्थसत्स्वरूप होनेके कारण [निरपेक्ष सत्य है]। वह यह विद्याविषयक सत्य ही यथार्थ सत्य है; इससे इतर तो अविद्याका विषय होनेके कारण मिथ्या है। उस सत्य अक्षरको अत्यन्त परोक्ष होनेके कारण किस प्रकार प्रत्यक्षवत् जानें? इसके लिये श्रुतिने यह दृष्टान्त दिया है—
यथा सुदीप्तात्सुष्ठु दीप्ताद् इद्धात्पावकादग्नेर्विस्फुलिङ्गा अग्न्यवयवाः सहस्रशोऽनेकंशः प्रभवन्ते निर्गच्छन्ति सरूपा अग्निसलक्षणा एव तथोक्तलक्षणात् अक्षराद्विविधा नानादेहोपाधिभेद्मनुविधीयमानत्वाद्विविधा हे सोम्य भावा जीवा आकाशादिव घटादिपरिच्छिन्नाः सुषिग्भेदा घटाद्युपाधिप्रभेदमनुभवन्ति, एवं नानानामरूपकृतदेहोपाधि-जिस प्रकार सुदीप्त—अच्छी तरह दीप्त अर्थात् प्रज्वलित हुए अग्निसे उसीके-से रूपवाले सहस्रों—अनेकों विस्फुलिङ्ग—अग्निके अवयव निकलते हैं उसी प्रकार हे सोम्य ! उक्त लक्षणवाले अक्षर ब्रह्मसे विविध—अनेक देहरूप उपाधिभेदके अनुसार विहित होनेके कारण अनेक प्रकारके भाव—जीव उस नाना नाम-रूपकृत देहोपाधिके जन्मके साथ उसी प्रकार उत्पन्न हो जाते हैं जैसे घटादि उपाधिभेदके अनुसार आकाशसे उन घटादिसे परिच्छिन्न बहुतसे छिद्र (घटाकाशादि)।
४६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक २
प्रभवमनुप्रजायन्ते तत्र चैव तस्मिन्नेवाक्षरेऽपियन्ति देहोपाधिविलयमनुली यन्ते घटादिविलयमन्विव सुषिरभेदाः ।तथा जिस प्रकार घटादिके नष्ट होनेपर वे [ घटाकाशादि ] छिद्र लीन हो जाते हैं उसी प्रकार देहरूप उपाधिके लीन होनेपर वे सब उस अक्षरमें ही लीन हो जाते हैं।
यथाकाशस्य सुषिरभेदोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वं घटाद्युपाधिकृतमेव तद्वदक्षरस्यापि नामरूपकृतदेहोपाधिनिमित्तमेव जीवोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वम् ॥१॥जिस प्रकार छिद्रभेदोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें आकाशका निमित्तत्व घटादि उपाधिके ही कारण है उसी प्रकार जीवोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें नामरूपकृत देहोपाधिके कारण ही अक्षरब्रह्मका निमित्तत्व है ॥ १ ॥
नामरूपबीजभूतादव्याकृताख्यात्स्वविकारापेक्षया परादक्षरात्परं यत्सर्वोपाधिभेदवर्जितम् अक्षरस्यैव स्वरूपमाकाशस्येव सर्वमूर्तिवर्जितं नेति नेतीत्यादिविशेषणं विवक्षन्नाह—अपने विकारोंकी अपेक्षा महान् तथा नामरूपके बीजभूत अव्याकृतसंज्ञक अक्षरसे भी उत्कृष्ट जो अक्षर परमात्माका आकाशके समान सब प्रकारके आकारोंसे रहित 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंसे विशेषित एवं सम्पूर्ण औपाधिक भेदोंसे रहित स्वरूप है उसे बतलानेकी इच्छासे, श्रुति कहती है—

ब्रह्मका पारमार्थिकस्वरूप

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७


[ वह अक्षर ब्रह्म ] निश्चय ही दिव्य, अमूर्त्त, पुरुष, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं कार्यवर्गकी अपेक्षा श्रेष्ठ अक्षर (अव्याकृत प्रकृति) से भी उत्कृष्ट है ॥ २ ॥

दिव्यो द्योतनवान्स्वयंज्यो-[ वह अक्षरब्रह्म ] स्वयंप्रकाश
तिष्त्वात् । दिवि वा स्वात्मनिहोनेके कारण दिव्य—प्रकाशित
भवोऽलौकिको वा । हि यस्माद्-होनेवाला है, अथवा दिवि—
मूर्तः सर्वमूर्तिवर्जितः पुरुषः पूर्णःअपने स्वरूपमें ही स्थित या
पुरिशयो वा, दिव्यो ह्यमूर्तःअलौकिक है; क्योंकि वह अमूर्त्त—
पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरः सहसब प्रकारके आकारसे रहित,
बाह्याभ्यन्तरेण वर्तत इति ।पुरुष—पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें
अजो न जायते कुतश्चित्स्वतोऽ-शयन करनेवाला, सबाह्याभ्यन्तर—
न्यस्य जन्मनिमित्तस्य चाभावात्;बाहर और भीतरके सहित सर्वत्र
यथा जलबुद्बुदादेर्वाय्वादि ,वर्तमान और अज—जो किसीसे
यथा नभःसुषिरभेदानां घटादि ।उत्पन्न न हो—ऐसा है; क्योंकि
सर्वभावविकाराणां जनिमूूलत्वात्अपनेसे भिन्न कोई उसके जन्मका
तत्प्रतिषेधेन सर्वे प्रतिषिद्धानिमित्त है ही नहीं; जिस प्रकार
भवन्ति । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजो-कि जलसे उत्पन्न होनेवाले बुद्बुदों-
ऽतोजरोऽमृतोऽक्षरो ध्रुवोऽभयका कारण वायु आदि है तथा
इत्यर्थः ।घटाकाशादि भेदोंका हेतु घट आदि
पदार्थ हैं [ उसी प्रकार उस
अजन्माके जन्मका कोई भी कारण
नहीं है ] । वस्तुके सारे विकारोंका
मूल जन्म ही है; अतः उस (जन्म)
का प्रतिषेध कर दिये जानेपर वे
सभी प्रतिषिद्ध हो जाते हैं। क्योंकि
वह परमात्मा सबाह्याभ्यन्तर अज
है इसलिये वह अजर, अमर, अक्षर,
ध्रुव और भयशून्य है—यह इसका
तात्पर्य है।
४८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक २

| यद्यपि देहाद्युपाधिभेददृष्टीनामविद्यावशाद्देहभेदेषु सप्राणः समनाः सेन्द्रियः सविषय इव प्रत्यवभासते तलमलादिमदिव आकाशं तथापि तु स्वतःपरमार्थदृष्टीनामप्राणोऽविद्यमानः क्रियाशक्तिभेदवांश्चलनात्मको वायुर्यस्मिन्ससावप्राणः। तथाऽमना अनेकज्ञानशक्तिभेदवत्सङ्कल्पाद्यात्मकं मनोऽप्यविद्यमानं यस्मिन्सोऽयम् अमनाः। अप्राणो ह्यमनाश्चेति प्राणादिवायुभेदाः कर्मेन्द्रियाणि तद्विषयाश्च तथा च बुद्धीमनसी बुद्धीन्द्रियाणि तद्विषयाश्च प्रतिषिद्धा वेदितव्याः। तथा श्रुत्यन्तरे—“ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४।३।७ः) इति। <br><br> यस्माच्चैवं प्रतिषिद्धोपाधिद्वयः तस्माच्छुभ्रः शुद्धः। अतोऽक्षरान्नामरूपबीजोपाधिलक्षितस्व- | जिस प्रकार [दृष्टिदोषसे] आकाश तल-मलादियुक्त भासता है उसी प्रकार देहादि उपाधिभेदमें दृष्टि रखनेवालोंको यद्यपि विभिन्न देहोंमें [वह अक्षर ब्रह्म] प्राण, मन, इन्द्रिय एवं विषयसे युक्त-सा भासता है तो भी परमार्थस्वरूपदर्शियोंको तो वह अप्राण—जिसमें क्रियाशक्तिभेदवाला चलनात्मक वायु न रहता हो तथा अमना—जिसमें ज्ञानशक्तिके अनेकों भेदवाला सङ्कल्पादिरूप मन भी न हो, [इस प्रकार प्राण और मनसे रहित ही भासता है।] ‘अप्राणः’ और ‘अमनाः’ इन दोनों विशेषणोंसे प्राणादि वायुभेद, कर्मेन्द्रियाँ और उनके विषय तथा बुद्धि, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और उनके विषय प्रतिषिद्ध हुए समझने चाहिये; जैसा कि एक दूसरी श्रुति उसे ‘मानो ध्यान करता हुआ-सा, मानों चेष्टा करता हुआ-सा’—ऐसा बतलाती है। <br><br> इस प्रकार क्योंकि वह [प्राण और मन इन] दोनों उपाधियोंसे रहित है इसलिये वह शुभ्र—शुद्ध है। अतः नाम-रूपकी बीजभूत उपाधिसे जिसका स्वरूप लक्षित |