भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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३६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही सर्वोत्तम माननेवाले वे महामूढ़ किसी अन्य वस्तुको श्रेयस्कर नहीं समझते। वे स्वर्गलोकके उच्च स्थानमें अपने कर्मफलोंका अनुभव कर इस [मनुष्य] लोक अथवा इससे भी निकृष्ट लोकमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इष्टं यागादि श्रौतं कर्म, पूर्तं वापीकूपतडागादि स्मार्तं मन्यमाना एतदेवातिशयेन पुरुषार्थसाधनं वरिष्ठं प्रधानमिति चिन्तयन्तोऽन्यदात्मज्ञानाख्यं श्रेयःसाधनं न वेदयन्ते न जानन्ति, प्रमूढाः पुत्रपशुबान्धवादिषु प्रमत्ततया मूढाः । ते च नाकस्य स्वर्गस्य पृष्ठ उपरिस्थाने सुकृते भोगायतनेऽनुभूत्वानुभूय कर्मफलं पुनरिमं लोकं मानुषमस्माद्धीनतरं वा तिर्यङ्नरकादिलक्षणं यथाकर्मशेषं विशन्ति ॥१०॥इष्ट यानी यागादि श्रौतकर्म और पूर्त—वापी-कूप-तडागादि स्मार्त कर्म 'ये ही अधिकतासे पुरुषार्थके साधन हैं, अतः ये ही सर्वश्रेष्ठ यानी प्रधान हैं' इस प्रकार मानते अर्थात् चिन्तन करते हुए वे प्रमूढ—प्रमत्ततावश पुत्र, पशु और बान्धवादिमें मूढ हुए लोग आत्मज्ञानसंज्ञक किसी और श्रेयःसाधनको नहीं जानतेवे नाक यानी स्वर्गके पृष्ठ—उच्च स्थानमें अपने सुकृत—भोगायतन (पुण्यभोगके लिये प्राप्त हुए दिव्य देह) में कर्मफलका अनुभव कर अपने अवशिष्ट कर्मानुसार फिर इसी मनुष्यलोक अथवा इससे निकृष्टतर तिर्यङ्नरकादिरूप योनियोंमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये

शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः ।

सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति

यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥