भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


किन्तु जो शान्त और विद्वान्लोग वनमें रहकर भिक्षावृत्तिका आचरण करते हुए तप और श्रद्धाका सेवन करते हैं वे पापरहित होकर सूर्य्यद्वार ( उत्तरायणमार्ग ) से वहाँ जाते हैं जहाँ वह अमृत और अव्यय-स्वरूप पुरुष रहता है ॥ ११ ॥

ये पुनस्तद्विपरीता ज्ञानयुक्ता वानप्रस्थाः संन्यासिनश्च तपःश्रद्धे हि तपः स्वाश्रमविहितं कर्म श्रद्धा हिरण्यगर्भादिविषया विद्या; ते तपःश्रद्धे उपवसन्ति सेवन्तेऽरण्ये वर्तमानाः सन्तः; शान्ता उपरतकरणग्रामाः, विद्वांसो गृहस्थाश्च ज्ञानप्रधाना इत्यर्थः । भैक्ष्यचर्यां चरन्तः परिग्रहाभावादुपवसन्त्यरण्य इति सम्बन्धः सूर्य्यद्वारेण सूर्य्योपलक्षितेनोत्तरायणेन पथा ते विरजा विरजसः क्षीणपुण्यपापकर्माणः सन्तः इत्यर्थः; प्रयान्ति प्रकर्षेण यान्ति यत्र यस्मिन्सत्यलोकादावमृतः स पुरुषः प्रथमजो हिरण्यगर्भो ह्यव्ययात्माव्ययस्वभावो यावत्संसारस्थायी । एतदन्तास्तु संसारगतयोऽपरविद्यागम्याः ।किन्तु इसके विपरीत जो ज्ञानसम्पन्न वानप्रस्थ और संन्यासी लोग तप और श्रद्धाका—अपने आश्रमविहित कर्मका नाम ‘तप’ है और हिरण्यगर्भादिविषयक विद्याको ‘श्रद्धा’ कहते हैं, उन तप और श्रद्धाका वनमें रहकर सेवन करते हैं; तथा जो शान्त—जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं ऐसे विद्वान्लोग तथा ज्ञानप्रधान गृहस्थलोग परिग्रह न करनेके कारण भिक्षाचर्याका आचरण करते हुए वनमें रहते हैं वे विरज अर्थात् जिनके पाप-पुण्य क्षीण हो गये हैं ऐसे होकर सूर्य्यद्वारसे—सूर्योपलक्षित उत्तरमार्गसे वहाँ प्रयाण करते—प्रकर्षतः गमन करते हैं जहाँ—जिस सत्यलोकादिमें वह अमृत और अव्ययात्मा—संसारकी स्थितिपर्यन्त रहनेवाला अव्ययस्वभाव पुरुष अर्थात् सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ रहता है । अपरा विद्यासे प्राप्त होनेवाली सांसारिक गतियाँ तो बस यहींतक हैं ।