मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| ४६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| प्रभवमनुप्रजायन्ते तत्र चैव तस्मिन्नेवाक्षरेऽपियन्ति देहोपाधिविलयमनुली यन्ते घटादिविलयमन्विव सुषिरभेदाः । | तथा जिस प्रकार घटादिके नष्ट होनेपर वे [ घटाकाशादि ] छिद्र लीन हो जाते हैं उसी प्रकार देहरूप उपाधिके लीन होनेपर वे सब उस अक्षरमें ही लीन हो जाते हैं। |
| यथाकाशस्य सुषिरभेदोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वं घटाद्युपाधिकृतमेव तद्वदक्षरस्यापि नामरूपकृतदेहोपाधिनिमित्तमेव जीवोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वम् ॥१॥ | जिस प्रकार छिद्रभेदोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें आकाशका निमित्तत्व घटादि उपाधिके ही कारण है उसी प्रकार जीवोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें नामरूपकृत देहोपाधिके कारण ही अक्षरब्रह्मका निमित्तत्व है ॥ १ ॥ |
| नामरूपबीजभूतादव्याकृताख्यात्स्वविकारापेक्षया परादक्षरात्परं यत्सर्वोपाधिभेदवर्जितम् अक्षरस्यैव स्वरूपमाकाशस्येव सर्वमूर्तिवर्जितं नेति नेतीत्यादिविशेषणं विवक्षन्नाह— | अपने विकारोंकी अपेक्षा महान् तथा नामरूपके बीजभूत अव्याकृतसंज्ञक अक्षरसे भी उत्कृष्ट जो अक्षर परमात्माका आकाशके समान सब प्रकारके आकारोंसे रहित 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंसे विशेषित एवं सम्पूर्ण औपाधिक भेदोंसे रहित स्वरूप है उसे बतलानेकी इच्छासे, श्रुति कहती है— |
ब्रह्मका पारमार्थिकस्वरूप
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥