मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
[ वह अक्षर ब्रह्म ] निश्चय ही दिव्य, अमूर्त्त, पुरुष, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं कार्यवर्गकी अपेक्षा श्रेष्ठ अक्षर (अव्याकृत प्रकृति) से भी उत्कृष्ट है ॥ २ ॥
| दिव्यो द्योतनवान्स्वयंज्यो- | [ वह अक्षरब्रह्म ] स्वयंप्रकाश |
|---|---|
| तिष्त्वात् । दिवि वा स्वात्मनि | होनेके कारण दिव्य—प्रकाशित |
| भवोऽलौकिको वा । हि यस्माद्- | होनेवाला है, अथवा दिवि— |
| मूर्तः सर्वमूर्तिवर्जितः पुरुषः पूर्णः | अपने स्वरूपमें ही स्थित या |
| पुरिशयो वा, दिव्यो ह्यमूर्तः | अलौकिक है; क्योंकि वह अमूर्त्त— |
| पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरः सह | सब प्रकारके आकारसे रहित, |
| बाह्याभ्यन्तरेण वर्तत इति । | पुरुष—पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें |
| अजो न जायते कुतश्चित्स्वतोऽ- | शयन करनेवाला, सबाह्याभ्यन्तर— |
| न्यस्य जन्मनिमित्तस्य चाभावात्; | बाहर और भीतरके सहित सर्वत्र |
| यथा जलबुद्बुदादेर्वाय्वादि , | वर्तमान और अज—जो किसीसे |
| यथा नभःसुषिरभेदानां घटादि । | उत्पन्न न हो—ऐसा है; क्योंकि |
| सर्वभावविकाराणां जनिमूूलत्वात् | अपनेसे भिन्न कोई उसके जन्मका |
| तत्प्रतिषेधेन सर्वे प्रतिषिद्धा | निमित्त है ही नहीं; जिस प्रकार |
| भवन्ति । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजो- | कि जलसे उत्पन्न होनेवाले बुद्बुदों- |
| ऽतोजरोऽमृतोऽक्षरो ध्रुवोऽभय | का कारण वायु आदि है तथा |
| इत्यर्थः । | घटाकाशादि भेदोंका हेतु घट आदि |
| पदार्थ हैं [ उसी प्रकार उस | |
| अजन्माके जन्मका कोई भी कारण | |
| नहीं है ] । वस्तुके सारे विकारोंका | |
| मूल जन्म ही है; अतः उस (जन्म) | |
| का प्रतिषेध कर दिये जानेपर वे | |
| सभी प्रतिषिद्ध हो जाते हैं। क्योंकि | |
| वह परमात्मा सबाह्याभ्यन्तर अज | |
| है इसलिये वह अजर, अमर, अक्षर, | |
| ध्रुव और भयशून्य है—यह इसका | |
| तात्पर्य है। |