भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७


[ वह अक्षर ब्रह्म ] निश्चय ही दिव्य, अमूर्त्त, पुरुष, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं कार्यवर्गकी अपेक्षा श्रेष्ठ अक्षर (अव्याकृत प्रकृति) से भी उत्कृष्ट है ॥ २ ॥

दिव्यो द्योतनवान्स्वयंज्यो-[ वह अक्षरब्रह्म ] स्वयंप्रकाश
तिष्त्वात् । दिवि वा स्वात्मनिहोनेके कारण दिव्य—प्रकाशित
भवोऽलौकिको वा । हि यस्माद्-होनेवाला है, अथवा दिवि—
मूर्तः सर्वमूर्तिवर्जितः पुरुषः पूर्णःअपने स्वरूपमें ही स्थित या
पुरिशयो वा, दिव्यो ह्यमूर्तःअलौकिक है; क्योंकि वह अमूर्त्त—
पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरः सहसब प्रकारके आकारसे रहित,
बाह्याभ्यन्तरेण वर्तत इति ।पुरुष—पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें
अजो न जायते कुतश्चित्स्वतोऽ-शयन करनेवाला, सबाह्याभ्यन्तर—
न्यस्य जन्मनिमित्तस्य चाभावात्;बाहर और भीतरके सहित सर्वत्र
यथा जलबुद्बुदादेर्वाय्वादि ,वर्तमान और अज—जो किसीसे
यथा नभःसुषिरभेदानां घटादि ।उत्पन्न न हो—ऐसा है; क्योंकि
सर्वभावविकाराणां जनिमूूलत्वात्अपनेसे भिन्न कोई उसके जन्मका
तत्प्रतिषेधेन सर्वे प्रतिषिद्धानिमित्त है ही नहीं; जिस प्रकार
भवन्ति । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजो-कि जलसे उत्पन्न होनेवाले बुद्बुदों-
ऽतोजरोऽमृतोऽक्षरो ध्रुवोऽभयका कारण वायु आदि है तथा
इत्यर्थः ।घटाकाशादि भेदोंका हेतु घट आदि
पदार्थ हैं [ उसी प्रकार उस
अजन्माके जन्मका कोई भी कारण
नहीं है ] । वस्तुके सारे विकारोंका
मूल जन्म ही है; अतः उस (जन्म)
का प्रतिषेध कर दिये जानेपर वे
सभी प्रतिषिद्ध हो जाते हैं। क्योंकि
वह परमात्मा सबाह्याभ्यन्तर अज
है इसलिये वह अजर, अमर, अक्षर,
ध्रुव और भयशून्य है—यह इसका
तात्पर्य है।