मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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४२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
| ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यादित्येतद्<br><br>गुरुमेवेत्यवधारणफलम् ।<br><br>समित्पाणिः समिद्भारगृहीत-<br><br>हस्तः श्रोत्रियमध्ययनश्रुतार्थ-<br><br>सम्पन्नं ब्रह्मनिष्ठम् । हित्वा सर्व-<br><br>कर्माणि केवलेऽद्वये ब्रह्मणि निष्ठा<br><br>यस्य सोऽयं ब्रह्मनिष्ठो जपनिष्ठ-<br><br>स्तपोनिष्ठ इति यद्वत् । न हि<br><br>कर्मिणो ब्रह्मनिष्ठता सम्भवति<br><br>कर्मात्मज्ञानयोर्विरोधात् । स<br><br>तं गुरुं विधिवदुपसन्नः प्रसाद्य<br><br>पृच्छेदक्षरं पुरुषं सत्यम् ॥१२॥ | का अन्वेषण न करे—यही ‘गुरुमेव’ इस पदसमूहमें आये हुए निश्चयात्मक ‘एव’ पदका अभिप्राय है ।<br><br>समित्पाणिः अर्थात् हाथमें समिधाओंका भार लेकर श्रोत्रिय यानी अध्ययन और श्रवण किये अर्थसे सम्पन्न तथा ब्रह्मनिष्ठ [ गुरुके पास जाय ]—सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर जिसकी केवल अद्वितीय ब्रह्ममें ही निष्ठा है वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है; जपनिष्ठ तपोनिष्ठ आदिके समान ही यह ‘ब्रह्मनिष्ठ’ शब्द है । कर्मठ पुरुषको ब्रह्मनिष्ठा कभी नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म और आत्मज्ञानका परस्पर विरोध है । इस प्रकार उन गुरुदेवके पास विधिपूर्वक जाकर उन्हें प्रसन्नकर सत्य और अक्षर पुरुषके सम्बन्धमें पूछे ॥ १२ ॥ |
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गुरुके लिये उपदेशप्रदानकी विधि
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्य-
क्प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं
प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३॥