मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| इत्युच्यते—निर्वेदं निःपूर्वो | लाते हैं—‘निर्वेद करे’। यहाँ ‘नि’ |
| विदिरत्र वैराग्यार्थे वैराग्य- | पूर्वक ‘विद्’ धातु वैराग्य अर्थमें है; |
| मायात्कुर्यादित्येतत् । | अतः तात्पर्य यह है कि ‘वैराग्य करे’। |
| स वैराग्यप्रकारः प्रदर्श्यते । | अब वह वैराग्यका प्रकार |
| इह संसारे नास्ति कश्चिदप्यकृतः | दिखलाया जाता है । इस संसारमें |
| पदार्थः । सर्व एव हि लोकाः | कोई भी अकृत (नित्य) पदार्थ |
| कर्मचिताः कर्मकृतत्वाच्चानित्याः, | नहीं है । सभी लोक कर्मसे सम्पादन |
| न नित्यं किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः। | किये जानेवाले हैं और कर्मकृत |
| सर्वं तु कर्मानित्यस्यैव साधनम्। | होनेके कारण अनित्य हैं । तात्पर्य |
| यस्माच्चतुर्विधमेव हि सर्वं कर्म | यह कि इस संसारमें नित्य कुछ भी |
| कार्यमुत्पाद्यमाप्यं संस्कार्यं | नहीं है । सारा कर्म अनित्य फलका |
| विकार्यं वा, नातः परं कर्मणो | कार्य, उत्पाद्य, आप्य और विकार्य |
| विशेषोऽस्ति । अहं च नित्येन | अथवा संस्कार्य चार ही प्रकारके |
| अमृतेनाभयेन कूटस्थेनाचलेन | हैं, इनसे भिन्न कर्मका और कोई |
| ध्रुवेणार्थेनार्थी न तद्विपरीतेन । | प्रकार नहीं है । किन्तु मैं तो एक |
| अतः किं कृतेन कर्मणायासबहु- | नित्य, अमृत, अभय, कूटस्थ, अचल |
| लेनानर्थसाधनेनेत्येवं निर्विण्णो- | और ध्रुव पदार्थकी इच्छा करनेवाला |
| ऽभयं शिवमकृतं नित्यं पदं | हूँ; उससे विपरीत स्वभाववालेकी |
| यत्तद्विज्ञानार्थं विशेषेणाधिगमार्थं | मुझे आवश्यकता नहीं है । अतः |
| स निर्विण्णो ब्राह्मणो गुरुमेवा- | इस श्रमबहुल एवं अनर्थके साधन- |
| चार्यं शमदमदयादिसम्पन्नमभि- | भूत कृत—कर्मसे मुझे क्या प्रयो- |
| गच्छेत्। शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण | जन है? इस प्रकार विरक्त होकर जो |
| अभय, शिव, अकृत और नित्य- | |
| पद है उसके विज्ञानके लिये— | |
| विशेषतया जाननेके लिये वह विरक्त | |
| ब्राह्मण शम-दमादिसम्पन्न गुरु यानी | |
| आचार्यके पास ही जाय । शास्त्रज्ञ | |
| होनेपर भी स्वतन्त्रतापूर्वक ब्रह्मज्ञान- |