भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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इत्युच्यते—निर्वेदं निःपूर्वोलाते हैं—‘निर्वेद करे’। यहाँ ‘नि’
विदिरत्र वैराग्यार्थे वैराग्य-पूर्वक ‘विद्’ धातु वैराग्य अर्थमें है;
मायात्कुर्यादित्येतत् ।अतः तात्पर्य यह है कि ‘वैराग्य करे’।
स वैराग्यप्रकारः प्रदर्श्यते ।अब वह वैराग्यका प्रकार
इह संसारे नास्ति कश्चिदप्यकृतःदिखलाया जाता है । इस संसारमें
पदार्थः । सर्व एव हि लोकाःकोई भी अकृत (नित्य) पदार्थ
कर्मचिताः कर्मकृतत्वाच्चानित्याः,नहीं है । सभी लोक कर्मसे सम्पादन
न नित्यं किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः।किये जानेवाले हैं और कर्मकृत
सर्वं तु कर्मानित्यस्यैव साधनम्।होनेके कारण अनित्य हैं । तात्पर्य
यस्माच्चतुर्विधमेव हि सर्वं कर्मयह कि इस संसारमें नित्य कुछ भी
कार्यमुत्पाद्यमाप्यं संस्कार्यंनहीं है । सारा कर्म अनित्य फलका
विकार्यं वा, नातः परं कर्मणोकार्य, उत्पाद्य, आप्य और विकार्य
विशेषोऽस्ति । अहं च नित्येनअथवा संस्कार्य चार ही प्रकारके
अमृतेनाभयेन कूटस्थेनाचलेनहैं, इनसे भिन्न कर्मका और कोई
ध्रुवेणार्थेनार्थी न तद्विपरीतेन ।प्रकार नहीं है । किन्तु मैं तो एक
अतः किं कृतेन कर्मणायासबहु-नित्य, अमृत, अभय, कूटस्थ, अचल
लेनानर्थसाधनेनेत्येवं निर्विण्णो-और ध्रुव पदार्थकी इच्छा करनेवाला
ऽभयं शिवमकृतं नित्यं पदंहूँ; उससे विपरीत स्वभाववालेकी
यत्तद्विज्ञानार्थं विशेषेणाधिगमार्थंमुझे आवश्यकता नहीं है । अतः
स निर्विण्णो ब्राह्मणो गुरुमेवा-इस श्रमबहुल एवं अनर्थके साधन-
चार्यं शमदमदयादिसम्पन्नमभि-भूत कृत—कर्मसे मुझे क्या प्रयो-
गच्छेत्। शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येणजन है? इस प्रकार विरक्त होकर जो
अभय, शिव, अकृत और नित्य-
पद है उसके विज्ञानके लिये—
विशेषतया जाननेके लिये वह विरक्त
ब्राह्मण शम-दमादिसम्पन्न गुरु यानी
आचार्यके पास ही जाय । शास्त्रज्ञ
होनेपर भी स्वतन्त्रतापूर्वक ब्रह्मज्ञान-