मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४१ |
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| रूपात्सर्वकार्यकारणबीजत्वेनोप- | होता है उस अक्षरसे—सम्पूर्ण |
| लक्ष्यमाणत्वात्परं तदुपाधिलक्षण- | कार्य-कारणके बीजरूपसे उपलक्षित |
| मव्याकृताख्यमक्षरं सर्वविकारेभ्यः | होनेके कारण उन उपाधियोंवाला |
| तस्मात्परतोऽक्षरात्परो निरु- | अव्याकृतसंज्ञक वह अक्षर अपने |
| पाधिकः पुरुष इत्यर्थः । | सम्पूर्ण विकारसे श्रेष्ठ है; उस सर्वोत्कृष्ट .<br>अक्षरसे भी वह निरुपाधिक पुरुष<br>उत्कृष्ट है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| यस्मिंस्तदाकाशाख्यमक्षरं | किन्तु जिसमें सम्पूर्ण व्यवहार- |
| संव्यवहारविषयमोतं प्रोतं च | का विषयभूत वह आकाशसंज्ञक |
| कथं पुनरप्राणादिमत्त्वं तस्येत्यु- | अक्षरतत्त्व ओतप्रोत है वह |
| च्यते । यदि हि प्राणादयः प्रागु- | प्राणादिसे रहित कैसे हो सकता |
| त्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मना | है ? ऐसी शङ्का होनेपर कहते<br>हैं—यदि प्राणादि अपनी उत्पत्तिसे |
| सन्ति तदा पुरुषस्य प्राणादिना | पूर्व भी पुरुषके समान स्वरूपसे |
| विद्यमानेन प्राणादिमत्त्वं भवेन्न | विद्यमान रहते तो उन विद्यमान |
| तु ते प्राणादयः प्रागुत्पत्तेः | प्राणादिके कारण पुरुषका प्राणादि-<br>युक्त होना माना जा सकता था । |
| पुरुष इव स्वेनात्मनां सन्ति | किन्तु उस समय वे अपनी उत्पत्तिसे<br>पूर्व पुरुषके समान स्वरूपतः हैं नहीं; |
| तदा, अतोऽप्राणादिमान्परः | इसलिये, जिस प्रकार पुत्र उत्पन्न न |
| पुरुषः; यथानुत्पन्ने पुत्रेऽपुत्रो | होनेतक देवदत्त पुत्रहीन कहा जाता |
| देवदत्तः ॥ २ ॥ | है उसी प्रकार परम पुरुष भी<br>अप्राणादिमान् है ॥ २ ॥ |
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५० : मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
ब्रह्मका सर्वकारणत्व
| कथं ते न सन्ति प्राणादय इत्युच्यते यस्मात्— | वे प्राणादि उस अक्षरमें क्यों नहीं हैं? सो बतलाते हैं—क्योंकि— |
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एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥
इस (अक्षर पुरुष) से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसारको धारण करनेवाली पृथिवी [उत्पन्न होती है] ॥ ३ ॥
| एतस्मादेव पुरुषान्नामरूपबीजोपाधिलक्षिताज्जायत उत्पद्यतेऽविद्याविषयविकारभूतो नामधेयोऽनृतात्मकः प्राणः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) “अनृतम्” इति श्रुत्यन्तरात् । न हि तेनाविद्याविषयेणानृतेन प्राणेन सप्राणत्वं परस्य स्यादपुत्रस्य स्वप्नदृष्टेनेव पुत्रेण सपुत्रत्वम् ।<br><br>एवं मनः सर्वाणि चेन्द्रियाणि विषयाश्चैतस्मादेव जायन्ते । | नाम-रूपकी बीजभूत [अविद्यारूप] उपाधिसे उपलक्षित* इस पुरुषसे ही अविद्याका विषय विकारभूत केवल नाममात्र तथा मिथ्या प्राण उत्पन्न होता है; जैसा कि “विकार वाणीका विलास और नाममात्र है” “वह मिथ्या है” ऐसी अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। उस अविद्याविषयक मिथ्या प्राणसे परब्रह्मका सप्राणत्व सिद्ध नहीं हो सकता, जैसे कि स्वप्नमें देखे हुए पुत्रसे पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् नहीं हो सकता।<br><br>इस प्रकार मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके विषय भी इसीसे उत्पन्न |
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* निरुपाधिक विशुद्ध ब्रह्मसे किसी भी विकारकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है। इसलिये जब उससे किसीकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया जायगा तो उसमें अविद्या या मायाके सम्बन्धका आरोप करके ही किया जायगा।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
| तस्मात्सिद्धमस्य निरुपचरितम् अप्राणादिमत्त्वमित्यर्थः। यथा च प्रागुत्पत्तेः परमार्थतोऽसन्तस्तथा प्रलीनाश्चेति द्रष्टव्याः । यथा करणानि मनश्चेन्द्रियाणि तथा शरीरविषयकारणानि भूतानि खमाकाशं वायुरन्तर्बाह्य आवहादिभेदः, ज्योतिरग्निः, आप उदकम् , पृथिवी धरित्री विश्वस्य सर्वस्य धारिणी एतानि च शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोत्तरोत्तरगुणानि पूर्वपूर्वगुणसहितान्येतस्मादेव जायन्ते ॥ ३ ॥ | होते हैं। अतः उसका मुख्यरूपसे अप्राणादिमान् होना सिद्ध हुआ। वे जिस प्रकार अपनी उत्पत्तिसे पूर्व वस्तुतः असत् ही थे उसी प्रकार लीन होनेपर भी असत् ही रहते हैं—ऐसा समझना चाहिये। जिस प्रकार करण—मन और इन्द्रियाँ [इससे उत्पन्न होते हैं] उसी प्रकार शरीर और इन्द्रियोंके विषयोंके कारणस्वरूप भूतवर्ग आकाश, आवहादि भेदोंवाला बाह्य वायु, अग्नि, जल और विश्व यानी सबको धारण करनेवाली पृथिवी—ये पाँच भूत, जो पूर्व-पूर्व गुणके सहित उत्तरोत्तर क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन गुणोंसे युक्त हैं, उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ |
| संक्षेपतः परविद्याविषयमक्षरं निर्विशेषं पुरुषं सत्यं दिव्यो ह्यमूर्त इत्यादिना मन्त्रेणोक्त्वा पुनस्तदेव सविशेषं विस्तरेण वक्तव्यमिति प्रवृत्तते; संक्षेपविस्तरोक्तो हि पदार्थः सुखाधिगम्यो | परविद्याके विषयभूत निर्विशेष सत्य पुरुषका ‘दिव्यो ह्यमूर्तः’ इत्यादि मन्त्रसे संक्षेपतः वर्णन कर अब उसी तत्त्वका सविशेषरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीके लिये यह श्रुति प्रवृत्त होती है; क्योंकि सूत्र और उसके भाष्यके समान [पहले] संक्षेपमें और [फिर] विस्तारपूर्वक कहा हुआ |
| ५२ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| भवति सूत्रभाष्योक्तिवदिति । योऽपि प्रथमजात्प्राणाद्धिरण्यगर्भाज्जायतेऽण्डस्यान्तर्विराट् स तत्त्वान्तरितत्वेन लक्ष्यमाणोऽप्येतस्मादेव पुरुषाज्जायत एतन्मयश्चेत्येतदर्थमाह।तं च विशिनष्टि— | पदार्थ सुगमतासे समझमें आ जाता है । जो ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती विराट् प्रथम उत्पन्न हुए प्राण यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न होता है वह अन्य तत्त्वरूपसे लक्षित कराया जानेपर भी इस पुरुषसे ही उत्पन्न होता है और पुरुषरूप ही है—यही बात यह मन्त्र बतलाता है और उसके विशेषणोंका उल्लेख करता है— |
सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्मका विश्वरूप
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥
अग्नि (द्युलोक) जिसका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सारा विश्व जिसका हृदय है और जिसके चरणोंसे पृथिवी प्रकट हुई है वह देव सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥
| अग्निर्द्यूलोकः “असौ वाव लोको गौतमाग्निः” (छा० उ० ५ । ४ । १) इति श्रुतेः, मूर्धा यस्योत्तमाङ्गं शिरः । चक्षुषी चन्द्रश्च सूर्य्यश्चेति चन्द्रसूर्यौ | अग्नि अर्थात् “हे गौतम ! यह [स्वर्ग] लोक ही अग्नि है” इस श्रुतिके अनुसार द्युलोक ही जिसका मूर्धा—उत्तमाङ्ग यानी शिर है, चन्द्र-सूर्य यानी चन्द्रमा और सूर्य ही नेत्र हैं। इस मन्त्रमें |
.खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
| यस्येति सर्वत्रानुषङ्गः कर्तव्यः, अस्येत्यस्य पदस्य वक्ष्यमाणस्य यस्येति विपरिणामं कृत्वा । दिशः श्रोत्रे यस्य । वाग्विवृता उद्घाटिताः प्रसिद्धा वेदा यस्य । वायुः प्राणो यस्य । हृदयमन्तःकरणं विश्वं समस्तं जगदस्य यस्येत्येतत् । सर्वं ह्यन्तःकरणविकारमेव जगन्मनस्येव सुषुप्ते प्रलयदर्शनात् । जागरितेऽपि तत एवाग्निविस्फुलिङ्गवत्प्रतिष्ठानात् । यस्य च पद्भ्यां जाता पृथिवी । एष देवो विष्णुरनन्तः प्रथमशरीरी त्रैलोक्यदेहोपाधिः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा ॥ ४ ॥ | आगे कहे हुए 'अस्य' पदको 'यस्य' में परिणत कर उसकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । दिशाएँ जिसके कर्ण हैं, विवृत—उद्घाटित यानी प्रसिद्ध वेद जिसकी वाणी हैं, वायु जिसका प्राण है, विश्व—समस्त जगत् जिसका हृदय—अन्तःकरण है; सम्पूर्ण जगत् अन्तःकरणका ही विकार है, क्योंकि सुषुप्तिमें मनहीमें उसका प्रलय होता देखा जाता है और जाग्रत् अवस्थामें अग्निसे स्फुलिङ्गके समान उसे उसीसे निकलकर स्थित होता देखते हैं। तथा जिसके चरणोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है यह त्रैलोक्यदेहोपाधिक प्रथम शरीरी अनन्त देव विष्णु ही समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥ |
| स हि सर्वभूतेषु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता सर्वकारणात्मा<br><br>पञ्चाग्निद्वारेण च याः संसरन्ति | सबका कारणरूप वह परमात्मा ही समस्त प्राणियोंमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है तथा पञ्चाग्नि-के द्वारा* जो प्रजाएँ जन्म-मृत्युरूप संसारको प्राप्त होती हैं वे भी |
* स्वर्ग, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँचोंका छान्दोग्योपनिषद्के पञ्चम प्रपाठकके तृतीय खण्डमें पञ्चाग्निरूपसे वर्णन किया है ।
५४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| प्रजास्ता अपि तस्मादेव पुरुषात्प्रजायन्त इत्युच्यते— | उस पुरुषसे ही उत्पन्न होती हैं— यह बात अगले मन्त्रसे बतलायी जाती है— |
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अक्षर पुरुषसे चराचरकी उत्पत्तिका क्रम
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः
सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां
बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
उस पुरुषसे ही, सूर्य जिसका समिधा है वह अग्नि उत्पन्न हुआ है । [ उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए ] सोमसे मेघ और [ मेघसे ] पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुष स्त्रीमें [ ओषधियोंसे उत्पन्न हुआ ] वीर्य सींचता है; इस प्रकार पुरुषसे ही यह बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥
| तस्मात्परस्मात्पुरुषात्प्रजावस्थानविशेषरूपोऽग्निः । स विशेष्यते; समिधो यस्य सूर्यः समिध इव समिधः । सूर्येण हि द्युलोकः समिध्यते । ततो हि द्युलोकान्निष्पन्नात् सोमात्पर्जन्यो द्वितीयोऽग्निः सम्भवति । तस्माच्च पर्जन्यात् ओषधयः पृथिव्यां सम्भवन्ति । ओषधिभ्यः पुरुषाग्नौ हुताभ्य उपादानभूताभ्यः। पुमानग्नी रेतः | उस परम पुरुषसे प्रजाका अवस्थाविशेषरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । उसकी विशेषता बतलाते हैं—सूर्य जिसका समिधा (ईंधन) है—[ अग्निहोत्रके ] समिधाके समान ही समिधा है, क्योंकि सूर्यसे ही द्युलोक समिद्ध ( प्रदीप्त ) होता है । उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए सोमसे [ पञ्चाग्नियोंमें ] दूसरा अग्नि मेघ उत्पन्न होता है । फिर उस मेघसे पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषरूप अग्निमें हवन की हुई वीर्यकी कारणरूप ओषधियोंसे [ वीर्य होता है ] । उस |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
| सिञ्चति योषितायां योषिति योषाग्नौ स्त्रियामिति । एवं क्रमेण बह्वीर्बह्वयः प्रजा ब्राह्मणाद्याः पुरुषात्परस्मात्सम्प्रसूताः समुत्पन्नाः ॥ ५ ॥ | वीर्यको पुरुषरूप अग्नि योषित्—योषिद्रूप अग्नि यानी स्त्रीमें सींचता है। इस क्रमसे यह ब्राह्मणादिरूप बहुत-सी प्रजा परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥ |
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कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं
| किं च कर्मसाधनानि फलानि च तस्मादेवेत्याह; कथम् ? | यही नहीं, कर्मके साधन और फल भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा श्रुति कहती है—सो किस प्रकार ? |
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तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
उस पुरुषसे ही ऋचाएँ, साम, यजुः, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, संवत्सर, यजमान, लोक और जहाँतक चन्द्रमा पवित्र करता है तथा सूर्य तपता है वे लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ६ ॥
| तस्मात्पुरुषादृचो नियताक्षरपादावसाना गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा मन्त्राः । साम पाञ्चभक्तिकं च सप्तभक्तिकं च स्तोभादिगीतविशिष्टम् । यजूंषि | उस पुरुषसे ही ऋचाएँ—जिनके पाद नियत अक्षरोंमें समाप्त होनेवाले हैं वे गायत्री आदि छन्दोंवाले मन्त्र, साम—पाञ्चभक्तिक अथवा सप्तभक्तिक स्तोभादि* गानविशिष्ट मन्त्र तथा यजुः— |
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* जिस मन्त्रमें हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन—ये पाँच अवयव रहते हैं उसे 'पाञ्चभक्तिक' और जिसमें उपद्रव तथा आदि—ये दो अवयव और होते हैं उसे 'सप्तभक्तिक' कहते हैं। 'हुं फट्' आदि अर्थशून्य वर्णोंका नाम 'स्तोभ' है ।
| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| अनियताक्षरपादावसानानि वाक्यरूपाण्येवं त्रिविधा मन्त्राः। दीक्षा मौञ्ज्यादिलक्षणा कर्तृनियमविशेषाः । यज्ञाश्च सर्वेऽग्निहोत्रादयः । क्रतवः सयूपाः । दक्षिणाश्चैकगवाद्यपरिमितसर्वस्वान्ताः । संवत्सरश्च कालः कर्माङ्गः । यजमानश्च कर्ता । लोकास्तस्य कर्मफलभूतास्ते विशेष्यन्ते; सोमो यत्र येषु लोकेषु पवते पुनाति लोकान्यत्र येषु सूर्यस्तपति च ते च दक्षिणायनोत्तरायणमार्गद्वयगम्या विद्वदविद्वत्कर्तृफलभूताः ॥ ६ ॥ | जिनके पादोंका अन्त नियमित अक्षरोंमें नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकारके मन्त्र [ उत्पन्न हुए हैं ! तथा उसीसे] दीक्षा—मौञ्जी-बन्धन आदि यज्ञकर्ताके नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौसे लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्मका अङ्गभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता, तथा उसके कर्मके फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं। उन लोकोंकी विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकोंमें चन्द्रमा लोकोंको पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ताके कर्मफलभूत दक्षिणायन-उत्तरायण इन दो मार्गसे प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥ |
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः
साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च
श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
उससे ही [कर्मके अङ्गभूत] बहुत-से देवता उत्पन्न हुए। तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥
| तस्माच्च पुरुषात्कर्माङ्गभूता देवा बहुधा वस्वादिगणभेदेन सम्प्रसूताः सम्यक्प्रसूताः। साध्या देवविशेषाः। मनुष्याः कर्माधिकृताः। पशवो ग्राम्यारण्याः। वयांसि पक्षिणः। जीवनं च मनुष्यादीनां प्राणापानौ व्रीहियवौ हविरर्थौ। तपश्च कर्माङ्गं पुरुषसंस्कारलक्षणं स्वतन्त्रं च फलसाधनम्। श्रद्धा यत्पूर्वकः सर्वपुरुषार्थसाधनप्रयोगश्चित्तप्रसाद आस्तिक्यबुद्धिस्तथा सत्यम् अनृतवर्जनं यथाभूतार्थवचनं चापीडाकरम्। ब्रह्मचर्यं मैथुनासमाचारः। विधिश्चेतिकर्तव्यता ॥ ७ ॥ | उस पुरुषसे ही वसु आदि गणके भेदसे कर्मके अंगभूत बहुत-से देवता उत्पन्न हुए हैं। तथा साध्यगण—देवताओंकी जाति-विशेष, कर्मके अधिकारी मनुष्य, गाँव और जङ्गलमें रहनेवाले पशु, वयस्—पक्षी, मनुष्यके जीवनरूप प्राण-अपान (श्वासोच्छ्वास) हविके लिये व्रीहि और यव, पुरुषका संस्कार करनेवाला तथा स्वतन्त्रतासे फल देनेवाला कर्मका अंगभूत तप, श्रद्धा—जिसके कारण सम्पूर्ण पुरुषार्थसाधनोंका प्रयोग, चित्त-प्रसाद और आस्तिक्यबुद्धि होती है, तथा सत्य—मिथ्याका त्याग एवं यथार्थ और किसीको पीडा न देनेवाला वचन, ब्रह्मचर्य—मैथुन न करना और ऐसा करना चाहिये—इस प्रकारकी विधि [ये सब भी उस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं] ॥७॥ |
इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं
| किं च— | तथा— |
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सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
५८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥
उस पुरुषसे ही सात प्राण (मस्तकस्थ सात इन्द्रियाँ) उत्पन्न हुए हैं। उसीसे उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिधा (विषय), सात होम (विषयज्ञान) और जिनमें वे सञ्चार करते हैं वे सात स्थान प्रकट हुए हैं। [इस प्रकार] प्रतिदेहमें स्थापित ये सात-सात पदार्थ [उस पुरुषसे ही हुए हैं] ॥ ८ ॥
| सप्त शीर्षण्याः प्राणास्तस्मादेव पुरुषात्प्रभवन्ति। तेषां च सप्तार्चिषो दीप्तयः स्वविषयावद्योतनानि। तथा सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः। सप्त होमास्तद्विषयविज्ञानानि "यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति" (महानारा० २५। १) इति श्रुत्यन्तरात्। | [दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण और एक रसना—ये] सात मस्तकस्थ प्राण उसी पुरुषसे उत्पन्न होते हैं। तथा अपने-अपने विषयोंको प्रकाशित करनेवाली उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिध—उनके सात विषय, क्योंकि प्राण (इन्द्रियवर्ग) अपने विषयोंसे ही समिद्ध (प्रदीप्त) हुआ करते हैं। सात होम अर्थात् अपने विषयोंके विज्ञान, जैसा कि "इसका जो विज्ञान है उसीको हवन करता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है, [ये सब इस पुरुषसे ही प्रकट हुए हैं]। |
| किं च सप्तेमे लोका इन्द्रियस्थानानि येषु चरन्ति सञ्चरन्ति प्राणाः। प्राणा येषु चरन्तीति प्राणानां विशेषणमिदं प्राणापा- | तथा ये सात लोक—इन्द्रियस्थान, जिनमें कि ये प्राण सञ्चार करते हैं। 'जिनमें प्राण सञ्चार करते हैं' यह प्राणोंका विशेषण [उनके प्रसिद्ध अर्थ] प्राणापानादि- |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
| नादिनिवृत्त्यर्थम् । गुहायां शरीरे हृदये वा स्वापकाले शेरत इति गुहाशयाः, निहिताः स्थापिता धात्रा सप्त सप्त प्रतिप्राणिभेदम् । | की आशंका निवृत्त करनेके लिये है। जो सुषुप्ति-अवस्थामें गुहा—शरीर अथवा हृदयमें शयन करते हैं वे गुहाशय तथा विधाताद्वारा प्रत्येक प्राणीमें निहित—स्थापित ये सात-सात पदार्थ [ इस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं ] । |
| यानि चात्मयाजिनां विदुषां कर्माणि कर्मफलानि चाविदुषां च कर्माणि तत्साधनानि कर्मफलानि च सर्वं चैतत्परस्मादेव पुरुषात्सर्वज्ञात्प्रसूतमिति प्रकरणार्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जो भी आत्मयाजी विद्वानोंके कर्म और कर्मफल तथा अज्ञानियोंके कर्म, कर्मफल और उनके साधन हैं वे सब उस परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं—यह इस प्रकरणका अर्थ है ॥ ८ ॥ |
पर्वत, नदी और ओषधि आदिका ब्रह्मजन्यत्व
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे-
ऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च
येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
इसीसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं; इसीसे अनेक रूपोंवाली नदियाँ बहती हैं; इसीसे सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस प्रकट हुए हैं, जिस (रस) से भूतोंसे परिवेष्टित हुआ यह अन्तरात्मा स्थित होता है ॥ ९ ॥
| अतः पुरुषात्समुद्राः सर्वे क्षाराद्याः, गिरयश्च हिमवदादयोऽस्मादेव पुरुषात्सर्वे। स्यन्दन्ते स्रवन्ति | इस पुरुषसे ही क्षारादि सात समुद्र और इसीसे हिमालय आदि समस्त पर्वत उत्पन्न हुए हैं। गङ्गा |
| ६० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| गङ्गाद्याः सिन्धवो नद्यः सर्व-रूपा बहुरूपा अस्मादेव पुरुषात् ; सर्वा ओषधयो व्रीहियवाद्याः । रसश्च मधुरादिः षड्विधो येन रसेन भूतैः पञ्चभिः स्थूलैः परिवेष्टितस्तिष्ठते तिष्ठति ह्यन्तरात्मा लिङ्गं सूक्ष्मं शरीरम् । तद्ध्यन्तराले शरीरस्यात्मनश्चात्मवद्वर्तत इत्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥ | आदि अनेक रूपोंवाली नदियाँ भी इसीसे प्रवाहित होती हैं । इसी पुरुषसे व्रीहि, यव आदि सम्पूर्ण ओषधियाँ तथा मधुरादि छः प्रकारका रस उत्पन्न हुआ है, जिस रससे कि पाँच स्थूल भूतोंद्वारा परिवेष्टित हुआ अन्तरात्मा—लिङ्गदेह यानी सूक्ष्म शरीर स्थित रहता है । यह शरीर और आत्माके मध्यमें आत्माके समान स्थित है; इसलिये अन्तरात्मा कहलाता है ॥ ९ ॥ |
ब्रह्म और जगत्का अभेद तथा ब्रह्मज्ञानसे अविद्या-ग्रन्थिका नाश
| एवं पुरुषात्सर्वमिदं सम्प्रसूतम् । अतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं पुरुष इत्येव सत्यम् । अतः— | इस प्रकार यह सब पुरुषसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः विकार वाणीका आरम्भ और नाममात्रके लिये तथा मिथ्या ही है, केवल पुरुष ही सत्य है। इसलिये— |
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद
निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
यह सारा जगत्, कर्म और तप (ज्ञान) पुरुष ही है। वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है। उसे जो सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानता है, हे सोम्य ! वह इस लोकमें अविद्याकी ग्रन्थिका छेदन कर देता है ॥ १० ॥
| पुरुष एवेदं विश्वं सर्वम् । न विश्वं नाम पुरुषादन्यत्किञ्चिदस्ति । अतो यदुक्तं तदेवेदम् | पुरुष ही यह विश्व—सारा जगत् है; पुरुषसे भिन्न 'विश्व' कोई वस्तु नहीं है । अतः 'हे भगवन् ! |
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६१ |
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| अभिहितं 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति' । एतस्मिन्हि परस्मिन्नात्मनि सर्वकारणे पुरुषे विज्ञाते पुरुष एवेदं विश्वं नान्यदस्तीति विज्ञातं भवतीति । <br><br> किं पुनरिदं विश्वमित्युच्यते । कर्माग्निहोत्रादिलक्षणम् । तपो ज्ञानं तत्कृतं फलमन्यदेतावद्धीदं सर्वम् । तच्चैतद्ब्रह्मणः कार्यम् । तस्मात्सर्वं ब्रह्म परामृतं परममृतम् अहमेवेति यो वेद निहितं स्थितं गुहायां हृदि सर्वप्राणिनां स एवं विज्ञानादविद्याग्रन्थि ग्रन्थमिव दृढीभूतामविद्यावासनां विकिरति विक्षिपति नाशयतीह जीवन्नेव न मृतः सन् हे सोम्य प्रियदर्शन १० | किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?' ऐसा जो प्रश्न किया गया था उसीका यहाँ उत्तर दिया गया है कि 'सबके कारणस्वरूप इस परमात्माको जान लेनेपर ही यह ज्ञान हो जाता है कि यह विश्व पुरुष ही है, उससे भिन्न नहीं है ।' <br><br> किन्तु यह विश्व है क्या ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—अग्निहोत्रादिरूप कर्म, तप यानी ज्ञान, उसका फल तथा इसी प्रकारका यह और सब भी [विश्व कहलाता है] । यह सब ब्रह्मका ही कार्य है । इसलिये यह सब पर अमृत ब्रह्म है और परामृत ब्रह्म मैं ही हूँ—ऐसा जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित उस ब्रह्मको जानता है हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! वह अपने ऐसे विज्ञानसे अविद्याग्रन्थिको यानी ग्रन्थि (गाँठ) के समान दृढ हुई अविद्याकी वासनाको इस लोकमें जीवित रहते ही काट डालता है—मरकर नहीं ॥१०॥ |
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इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
द्वितीय मुण्डक (द्वितीय खण्ड) - ओंकार-धनु से ब्रह्मवेधन
द्वितीय खण्ड
ब्रह्मका स्वरूपनिर्देश तथा उसे जाननेके लिये आदेश
| अरूपं सदक्षरं केन प्रकारेण विज्ञेयमित्युच्यते— | रूपहीन होनेपर भी उस अक्षरको किस प्रकार जानना चाहिये—यह अब बतलाया जाता है— |
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आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् ।
एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥
यह ब्रह्म प्रकाशस्वरूप, सबके हृदयमें स्थित, गुहाचर नामवाला और महत्पद है। इसीमें चलनेवाले, प्राणन करनेवाले और निमेषोन्मेष करनेवाले ये सब समर्पित हैं। तुम इसे सदसद्रूप, प्रार्थनीय, प्रजाओंके विज्ञानसे परे और सर्वोत्कृष्ट जानो ॥ १ ॥
| आविः प्रकाशं संनिहितं वागाद्युपाधिभिर्ज्वलति भ्राजतीति श्रुत्यन्तराच्छब्दादीनुपलभमानवदवभासते । दर्शनश्रवणमननविज्ञानाद्युपाधिधर्मैराविर्भूतं संलक्ष्यते हृदि सर्वप्राणिनाम् । | आविः—प्रकाशस्वरूप, संनिहित—समीपस्थित; वागादि उपाधियोंद्वारा प्रज्वलित होता है, प्रकाशित होता है—ऐसी एक अन्य श्रुतिके अनुसार वह शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करता-सा जान पड़ता है अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान आदि उपाधिके धर्मोंसे आविर्भूत हुआ दिखायी देता है [अतः संनिहित है] । |
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| यदेतदाविर्ब्रह्म संनिहितं सम्यक्स्थितं हृदि तद्गुहाचरं नाम । गुहायां चरतीति दर्शनश्रवणादिप्रकारैर्गुहाचरमिति प्रख्यातम्। महत्सर्वमहत्त्वात् । पदं पद्यते सर्वेणेति सर्वपदार्थास्पदत्वात् । <br><br> कथं तन्महत्पदमित्युच्यते । यतोऽत्रास्मिन्ब्रह्मण्येतत्सर्वं समर्पितं प्रवेशितं रथनाभाविवाराः । एजच्चलत्पक्ष्यादि, प्राणत्प्राणितीति प्राणापानादिमन्मनुष्यपश्वादि, निमिषच्च यन्निमेषादिक्रियावच्चानिमिषच्चशब्दात्समस्तमेतदत्रैव ब्रह्मणि समर्पितम् । <br><br> एतद्यदास्पदं सर्वं जानथ हे शिष्या अवगच्छथ तदात्मभूतं भवतां सदसत्स्वरूपम् । सदसतो- | इस प्रकार जो प्रकाशमान ब्रह्म हृदयमें संनिहित—सम्यक् स्थित है वह गुहाचर—दर्शन-श्रवणादि प्रकारोंसे गुहा ( बुद्धि ) में सञ्चार करता है इसलिये गुहाचर नामसे विख्यात है । [ वही महत्पद है ] सबसे बड़ा होनेके कारण वह 'महत्' है और सबसे प्राप्त किया जाता है अथवा सारे पदार्थोंका आश्रय है, इसलिये 'पद' है । <br><br> वह 'महत्पद' किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं—क्योंकि इस ब्रह्ममें ही, रथकी नाभिमें अरोंके समान यह सब कुछ समर्पित अर्थात् भली प्रकार प्रवेशित है । एजत्—चलने-फिरनेवाले पक्षी आदि, प्राणत्—जो प्राणन करते हैं वे प्राणापानादिमान् मनुष्य और पशु आदि, निमिषत् च—जो निमेषादि क्रियावाले और च शब्दके सामर्थ्यसे जो निमेष नहीं करनेवाले हैं वे भी इस प्रकार ये सब इस ब्रह्ममें ही समर्पित हैं । <br><br> हे शिष्यगण ! ये सब जिस [ ब्रह्मरूप ] आश्रयवाले हैं उसे तुम जानो—समझो; वह सदसत्स्वरूप तुम्हारा आत्मा है, क्योंकि उससे भिन्न |
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६४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| मूर्तामूर्तयोः स्थूलसूक्ष्मयोस्तद्- | कोई सत् या असत्—मूर्त्त या अमूर्त्त |
| व्यतिरेकेणाभावात् । वरेण्यं | अर्थात् स्थूल या सूक्ष्म है ही नहीं । |
| वरणीयं तदेव हि सर्वस्य नित्य- | और वही नित्य होनेके कारण सबका वरेण्य—वरणीय—प्रार्थनीय |
| त्वात्प्रार्थनीयम्। परं व्यतिरिक्तं | है। तथा प्रजाओंके विज्ञानसे परे |
| विज्ञानात्प्रजानामिति व्यवहितेन | यानी व्यतिरिक्त है—इस प्रकार इस [पर शब्द] का व्यवधानयुक्त |
| सम्बन्धः; यल्लौकिकविज्ञानागोच- | [प्रजानाम्] पदसे सम्बन्ध है। |
| रमिस्यर्थः । यद्वरिष्ठं वरतमं | तात्पर्य यह कि जो लौकिक विज्ञानका अविषय है, और वरिष्ठ |
| सर्वपदार्थेषु वरेषु तद्ध्येकं | यानी सम्पूर्ण श्रेष्ठ पदार्थोंमें श्रेष्ठतम |
| ब्रह्मातिशयेन वरं सर्वदोषरहित- | है, क्योंकि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित होनेके कारण एक वह ब्रह्म ही |
| त्वात् ॥ १ ॥ | अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
ब्रह्ममें मनोनिवेश करनेका विधान
| किं च— | तथा— |
यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहितां लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः । तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥
जो दीप्तिमान् और अणुसे भी अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी स्थित हैं वही यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाक् और मन है । वही यह सत्य और अमृत है । हे सौम्य ! उसका [ मनोनिवेशद्वारा ] वेधन करना चाहिये; तू उसका वेधन कर ॥२॥
| यदर्चिमद्दीप्तिमत्, दीप्त्या ह्मादित्यादि दीप्यत इति दीप्ति- | जो अर्चिमान् यानी दीप्तिमान् है; ब्रह्मकी दीप्तिसे ही सूर्य आदि देदीप्यमान होते हैं, इसलिये ब्रह्म |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
| मद्ब्रह्म। किं च यदणुभ्यः श्यामाकादिभ्योऽप्यणु च सूक्ष्मम्। चशब्दात्स्थूलेभ्योऽप्यतिशयेन स्थूलं पृथिव्यादिभ्यः। यस्मिंल्लोका भूरादयो निहिताः स्थिताः, ये च लोकिनो लोकनिवासिनो मनुष्यादयश्चैतन्याश्रया हि सर्वे प्रसिद्धाः। तदेतत्सर्वाश्रयमक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनो वाक्च मनश्च सर्वाणि च करणानि तदन्तश्चैतन्यं चैतन्याश्रयो हि प्राणेन्द्रियादिसर्वसंघातः “प्राणस्य प्राणम्” (बृ० उ० ४।४।१८) इति श्रुत्यन्तरात्। | दीप्तिमान् है। और जो श्यामाक आदि अणुओंसे भी अणु—सूक्ष्म है। ‘च’ शब्दसे यह समझना चाहिये कि जो पृथिवी आदि स्थूल पदार्थोंसे भी अत्यन्त स्थूल है। जिसमें भूर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक तथा उन लोकोंके निवासी मनुष्यादि स्थित हैं, क्योंकि सारे पदार्थ चैतन्यके ही आश्रित प्रसिद्ध हैं, वही सबका आश्रयभूत यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाणी और मन आदि समस्त इन्द्रियवर्ग है; उन सभीमें चैतन्य ओतप्रोत है, क्योंकि प्राण और इन्द्रिय आदिका सारा संघात चैतन्यके ही आश्रित है, जैसा कि “वह प्राणका प्राण है” इत्यादि एक अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। |
| यत्प्राणादीनामन्तश्चैतन्यमक्षरं तदेतत्सत्यमवितथमतोऽमृतम् अविनाशि तद्वेद्धव्यं मनसा ताडयितव्यम्। तस्मिन्मनःसमाधानं कर्तव्यमित्यर्थः। यस्मादेवं | [इस प्रकार] प्राणादिके भीतर रहनेवाला जो अक्षर चैतन्य है वही यह सत्य यानी अवितथ है; अतः वह अमृत—अविनाशी है। उसका वेधन यानी मनसे ताडन करना चाहिये। अर्थात् उसमें मनको समाहित करना चाहिये। हे सोम्य ! क्योंकि ऐसी बात है, |
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| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| हे सोम्य विद्ध्वक्षरे चेतः समाधत्स्व ॥ २ ॥ | इसलिये तू वेधन कर यानी अपने चित्तको उस अक्षरमें लगा दे ॥ २ ॥ |
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ब्रह्मवेधनकी विधि
| कथं वेद्धव्यमित्युच्यते— | उसका किस प्रकार वेधन करना चाहिये, सो बतलाया जाता है— |
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धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! उपनिषद्वेद्य महान् अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ा; और फिर उसे खींचकर ब्रह्म-भावानुगत चित्तसे उस अक्षररूप लक्ष्यका ही वेधन कर ॥ ३ ॥
| धनुरिष्वासनं गृहीत्वादायौपनिषदमुपनिषत्सु भवं प्रसिद्धं महास्त्रं महच्च तदस्त्रं च महास्त्रं धनुस्तस्मिञ्शरम्; किंविशिष्टम् इत्याह—उपासानिशितं सन्तताभिध्यानेन तनूकृतं संस्कृतमित्येतत्, सन्धयीत सन्धानं कुर्यात् । सन्धाय चायम्याकृष्य सेन्द्रियम् अन्तःकरणं स्वविषयाद्विनिवर्त्य | औपनिषद—उपनिषदोंमें वर्णित यानी उपनिषत्प्रसिद्ध महास्त्र—महान् अस्त्ररूप धनुष्—शरासन लेकर उसपर बाण चढ़ावे—किस प्रकारका बाण चढ़ावे ? इसपर कहते हैं—उपासनासे निशित यानी निरन्तर ध्यान करनेसे पैनाया हुआ—संस्कार किया हुआ बाण चढ़ावे । फिर बाण चढ़ानेके अनन्तर उसे खींचकर अर्थात् इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणको |
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| लक्ष्य एवावर्जितं कृत्वेत्यर्थः । न हि हस्तेनेव धनुप आयमनमिह सम्भवति । तद्भावगतेन तस्मिन् ब्रह्मण्यक्षरे लक्ष्ये भावना भावः तद्गतेन चेतसा लक्ष्यं तदेव यथोक्तलक्षणमक्षरं सोम्य विद्धि ॥३॥ | उनके विषयोंसे हटा अपने लक्ष्यमें ही जोड़कर—क्योंकि इस धनुषको हाथसे धनुष चढ़ानेके समान नहीं खींचा जा सकता—तद्भावगत अर्थात् अपने लक्ष्य उस अक्षर ब्रह्ममें जो भावना है उस भावमें गये हुए चित्तसे हे सोम्य ! ऊपर कहे हुए लक्षणोंवाले अपने उसी लक्ष्य अक्षर ब्रह्मका वेधन कर ॥ ३ ॥ |
वेधनके लिये ग्रहण किये जानेवाले धनुषादिका स्पष्टीकरण
| यदुक्तं धनुरादि तदुच्यते— | ऊपर जो धनुष आदि बतलाये गये हैं उनका उल्लेख किया जाता है— |
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥
प्रणव धनुष है, [ सोपाधिक ] आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है । उसका सावधानतापूर्वक वेधन करना चाहिये और बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥
| प्रणव ,ओङ्कारो धनुः । यथेष्व्रासनं लक्ष्ये शरस्य प्रवेशकारणं तथात्मशरस्याक्षरे लक्ष्ये प्रवेशकारणमोङ्कारः । प्रणवेन ह्यभ्यस्यमानेन संस्क्रियमाणस्तदालम्ब्यनोऽप्रतिबन्धेनाक्षरेऽवतिष्ठते; | प्रणव यानी ओंकार धनुष है । जिस प्रकार शरासन ( धनुष ) लक्ष्यमें बाणके प्रवेश कर जानेका साधन है उसी प्रकार [ सोपाधिक ] आत्मारूप बाणके अपने लक्ष्य अक्षरमें प्रवेश करनेका कारण ओंकार है । अभ्यास किये हुए प्रणवके द्वारा ही संस्कृत होकर वह उसके आश्रयसे बिना किसी बाधाके अक्षर ब्रह्ममें इस प्रकार स्थित होता है, जैसे धनुषसे छोड़ा |
६८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| यथा धनुषास्त इषुर्लक्ष्ये । अतः प्रणवो धनुरिव धनुः । शरो ह्यात्मोपाधिलक्षणः पर एव जले सूर्यादिवदिह प्रविष्टो देहे सर्वबौद्धप्रत्ययसाक्षितां । स शर इव स्वात्मन्येवार्पितोऽक्षरे ब्रह्मण्यतो ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । लक्ष्य इव मनःसमाधित्सुभिः आत्मभावेन लक्ष्यमाणत्वात् । <br><br> तत्रैवं सत्यप्रमत्तेन बाह्यविषयोपलब्धितृष्णाप्रमादवर्जितेन सर्वतो विरक्तेन जितेन्द्रियेणैकाग्रचित्तेन वेद्धव्यं ब्रह्म लक्ष्यम् । ततस्तद्वेधनादूर्ध्वं शरवत्तन्मयो भवेत् । यथा शरस्य लक्ष्यैकात्मत्वं फलं भवति तथा देहाद्यात्मप्रत्ययतिरस्करणेनाक्षरैकात्मत्वं फलमापादयेदित्यर्थः ॥ ४ ॥ | हुआ बाण अपने लक्ष्यमें । अतः धनुषके समान होनेसे प्रणव ही धनुष है। तथा आत्मा ही बाण है, जो कि जलमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान इस शरीरमें सम्पूर्ण बौद्ध प्रतीतियोंके साक्षिरूपसे प्रविष्ट हो रहा है। वह बाणके समान अपने ही आत्मा (स्वरूपभूत) अक्षर ब्रह्ममें अनुप्रविष्ट हो रहा है। इसलिये ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है, क्योंकि मनको समाहित करनेकी इच्छावाले पुरुषोंको वही आत्मभावसे लक्षित होता है। <br><br> अतः ऐसा होनेके अनन्तर अप्रमत्त—बाह्य विषयोंकी उपलब्धिकी तृष्णारूप प्रमादसे रहित होकर अर्थात् सब ओरसे विरक्त यानी जितेन्द्रिय होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूप अपने लक्ष्यका वेधन करना चाहिये। और फिर उसका वेधन करनेके अनन्तर बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार बाणका अपने लक्ष्यसे एकरूप हो जाना ही फल है उसी प्रकार देहादिमें आत्मत्वकी प्रतीतिका तिरस्कार कर उस अक्षरब्रह्मसे एकात्मत्वरूप फल प्राप्त करे ॥ ४ ॥ |