भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

६८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


यथा धनुषास्त इषुर्लक्ष्ये । अतः प्रणवो धनुरिव धनुः । शरो ह्यात्मोपाधिलक्षणः पर एव जले सूर्यादिवदिह प्रविष्टो देहे सर्वबौद्धप्रत्ययसाक्षितां । स शर इव स्वात्मन्येवार्पितोऽक्षरे ब्रह्मण्यतो ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । लक्ष्य इव मनःसमाधित्सुभिः आत्मभावेन लक्ष्यमाणत्वात् । <br><br> तत्रैवं सत्यप्रमत्तेन बाह्यविषयोपलब्धितृष्णाप्रमादवर्जितेन सर्वतो विरक्तेन जितेन्द्रियेणैकाग्रचित्तेन वेद्धव्यं ब्रह्म लक्ष्यम् । ततस्तद्वेधनादूर्ध्वं शरवत्तन्मयो भवेत् । यथा शरस्य लक्ष्यैकात्मत्वं फलं भवति तथा देहाद्यात्मप्रत्ययतिरस्करणेनाक्षरैकात्मत्वं फलमापादयेदित्यर्थः ॥ ४ ॥हुआ बाण अपने लक्ष्यमें । अतः धनुषके समान होनेसे प्रणव ही धनुष है। तथा आत्मा ही बाण है, जो कि जलमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान इस शरीरमें सम्पूर्ण बौद्ध प्रतीतियोंके साक्षिरूपसे प्रविष्ट हो रहा है। वह बाणके समान अपने ही आत्मा (स्वरूपभूत) अक्षर ब्रह्ममें अनुप्रविष्ट हो रहा है। इसलिये ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है, क्योंकि मनको समाहित करनेकी इच्छावाले पुरुषोंको वही आत्मभावसे लक्षित होता है। <br><br> अतः ऐसा होनेके अनन्तर अप्रमत्त—बाह्य विषयोंकी उपलब्धिकी तृष्णारूप प्रमादसे रहित होकर अर्थात् सब ओरसे विरक्त यानी जितेन्द्रिय होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूप अपने लक्ष्यका वेधन करना चाहिये। और फिर उसका वेधन करनेके अनन्तर बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार बाणका अपने लक्ष्यसे एकरूप हो जाना ही फल है उसी प्रकार देहादिमें आत्मत्वकी प्रतीतिका तिरस्कार कर उस अक्षरब्रह्मसे एकात्मत्वरूप फल प्राप्त करे ॥ ४ ॥