भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९


आत्मसाक्षात्कारके लिये पुनः विधि

अक्षरस्यैव दुर्लक्ष्यत्वात्पुनः पुनर्वचनं सुलक्षणार्थम्—कठिनतासे लक्षित होनेवाला होनेके कारण उस अक्षरका ही, भली प्रकार लक्ष्य करानेके लिये बार-बार वर्णन किया जाता है—

यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष- मोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥

जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणोंके सहित मन ओतप्रोत है उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो; यही अमृत (मोक्षप्राप्ति) का सेतु (साधन) है ॥ ५ ॥

यस्मिन्नक्षरे पुरुषे द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षं चोतं समर्पितं मनश्च सह प्राणैः करणैरन्यैः सर्वैस्तमेव सर्वाश्रयमेकमद्वितीयं जानथ जानीत हे शिष्याः । आत्मानं प्रत्यक्स्वरूपं युष्माकं सर्वप्राणिनां च ज्ञात्वा चान्या वाचोऽपरविद्यारूपा विमुञ्चथ विमुञ्चत परित्यजत तत्प्रकाश्यं च सर्वं कर्म ससाधनम् ; यतोऽमृतस्यैषहे शिष्यगण ! जिस अक्षर पुरुषमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और प्राणों यानी अन्य समस्त इन्द्रियोंके सहित मन ओत—समर्पित है उस एक—अद्वितीय आत्माको ही जानो; तथा इस प्रकार आत्माको अपने और समस्त प्राणियोंके प्रत्यक्स्वरूपको जानकर अपरविद्यारूप अन्य वाणीको तथा उससे प्रकाशित होनेवाले समस्त कर्मको उसके साधनसहित छोड़ दो—उसका सब प्रकार त्याग कर दो, क्योंकि यह अमृतका सेतु है—
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