मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
पृष्ठ 80, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 80
७० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २
| सेतुरेेतदात्मज्ञानममृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहोदधेः उत्तरणहेतुत्वात्तथा च श्रुत्यन्तरं "तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" ( श्वे० उ० ३ । ८, ६ । १५ ) इति ॥ ५ ॥ | यह आत्मज्ञान संसार-महासागरको पार करनेका साधन होनेके कारण अमृत—अमरत्व यानी मोक्षकी प्राप्तिके लिये [ नदीके पार जानेके साधनभूत ] सेतुके समान सेतु है। जैसा कि—"उसीको जानकर पुरुष मृत्युको पार कर जाता है, उसकी प्राप्तिका [ इसके सिवा ] और कोई मार्ग नहीं है" इत्यादि एक अन्य श्रुति भी कहती है॥ ५ ॥ |
ओंकाररूपसे ब्रह्मचिन्तनकी विधि
| किं च— | तथा— |
|---|
अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः
स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं
स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥
रथचक्रकी नाभिमें जिस प्रकार अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण नाडियाँ एकत्रित होती हैं उस ( हृदय ) के भीतर यह अनेक प्रकारसे उत्पन्न हुआ सञ्चार करता है। उस आत्माका 'ॐ' इस प्रकार ध्यान करो। अज्ञानके उस पार गमन करनेमें तुम्हारा कल्याण हो [ अर्थात् तुम्हें किसी प्रकारका विघ्न प्राप्त न हो ] ॥ ६ ॥
| अरा इव, यथा रथनाभौ समर्पिता अरा एवं संहताः सम्प्रविष्टा यत्र यस्मिन्हृदये सर्वतो देहव्यापिन्यो नाड्यस्तस्मिन्हृदये | अरोंके समान अर्थात् जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार शरीरमें सर्वत्र व्याप्त नाडियाँ जिस हृदयमें संहत अर्थात् प्रविष्ट हैं उसके भीतर यह बौद्ध प्रतीतियों- |