भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


बुद्धिप्रत्ययसाक्षीभूतः स एष प्रकृत आत्मान्तर्मध्ये चरते चरति वर्तते; पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्बहुधानेकधा क्रोधहर्षादिप्रत्ययैर्जायमान इव जायमानोऽन्तःकरणोपाध्यनुविधायित्वाद्वदन्ति लौकिका हृष्टो जातः क्रुद्धो जात इति । तमात्मानम् ओमित्येवमोङ्कारालम्बनाः सन्तो यथोक्तकल्पनया ध्यायथ चिन्तयत ।का साक्षीभूत और जिसका प्रकरण चल रहा है वह आत्मा देखता, सुनता, मनन करता और जानता हुआ अन्तःकरणरूप उपाधिका अनुकरण करनेवाला होनेसे उसके हर्ष-क्रोधादि प्रत्ययोंसे मानो [नवीन-नवीनरूपसे] उत्पन्न होता हुआ मध्यमें सञ्चार करता—वर्तमान रहता है। इसीसे लौकिक पुरुष 'वह हर्षित हुआ, वह क्रोधित हुआ' ऐसा कहा करते हैं। उस आत्माको 'ॐ' इस प्रकार अर्थात् उपर्युक्त कल्पनासे ओंकारको आलम्बन बनाकर ध्यान यानी चिन्तन करो।
उक्तं वक्तव्यं च शिष्येभ्य आचार्येण जानता । शिष्याश्च ब्रह्मविद्याविविदिषुत्वान्निवृत्तकर्माणो मोक्षपथे प्रवृत्ताः। तेषां निर्विघ्नतया ब्रह्मप्राप्तिमाशास्त्याचार्यः। स्वस्ति निर्विघ्नमस्तु वो युष्माकं पाराय परकूलाय। परस्तात्कस्मादविद्यातमसः । अविद्यारहितब्रह्मात्मस्वरूपगमनायेत्यर्थः ॥ ६ ॥विद्वान् आचार्यको शिष्योंसे जो कुछ कहना था वह कह दिया। इससे ब्रह्मविद्याके जिज्ञासु होनेके कारण शिष्यगण भी सब कर्मोंसे उपरत होकर मोक्षमार्गमें जुट गये। अतः आचार्य उन्हें निर्विघ्नतापूर्वक ब्रह्मप्राप्तिका आशीर्वाद देते हैं—'पार अर्थात् पर तीरपर जानेके लिये तुम्हें स्वस्ति—निर्विघ्नता प्राप्त हो। किसके पार जानेके लिये ? अविद्यारूप अन्धकारके पार जानेके लिये अर्थात् अविद्यारहित ब्रह्मात्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिये ॥ ६ ॥