मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
| सिञ्चति योषितायां योषिति योषाग्नौ स्त्रियामिति । एवं क्रमेण बह्वीर्बह्वयः प्रजा ब्राह्मणाद्याः पुरुषात्परस्मात्सम्प्रसूताः समुत्पन्नाः ॥ ५ ॥ | वीर्यको पुरुषरूप अग्नि योषित्—योषिद्रूप अग्नि यानी स्त्रीमें सींचता है। इस क्रमसे यह ब्राह्मणादिरूप बहुत-सी प्रजा परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥ |
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कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं
| किं च कर्मसाधनानि फलानि च तस्मादेवेत्याह; कथम् ? | यही नहीं, कर्मके साधन और फल भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा श्रुति कहती है—सो किस प्रकार ? |
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तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
उस पुरुषसे ही ऋचाएँ, साम, यजुः, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, संवत्सर, यजमान, लोक और जहाँतक चन्द्रमा पवित्र करता है तथा सूर्य तपता है वे लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ६ ॥
| तस्मात्पुरुषादृचो नियताक्षरपादावसाना गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा मन्त्राः । साम पाञ्चभक्तिकं च सप्तभक्तिकं च स्तोभादिगीतविशिष्टम् । यजूंषि | उस पुरुषसे ही ऋचाएँ—जिनके पाद नियत अक्षरोंमें समाप्त होनेवाले हैं वे गायत्री आदि छन्दोंवाले मन्त्र, साम—पाञ्चभक्तिक अथवा सप्तभक्तिक स्तोभादि* गानविशिष्ट मन्त्र तथा यजुः— |
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* जिस मन्त्रमें हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन—ये पाँच अवयव रहते हैं उसे 'पाञ्चभक्तिक' और जिसमें उपद्रव तथा आदि—ये दो अवयव और होते हैं उसे 'सप्तभक्तिक' कहते हैं। 'हुं फट्' आदि अर्थशून्य वर्णोंका नाम 'स्तोभ' है ।