मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| अनियताक्षरपादावसानानि वाक्यरूपाण्येवं त्रिविधा मन्त्राः। दीक्षा मौञ्ज्यादिलक्षणा कर्तृनियमविशेषाः । यज्ञाश्च सर्वेऽग्निहोत्रादयः । क्रतवः सयूपाः । दक्षिणाश्चैकगवाद्यपरिमितसर्वस्वान्ताः । संवत्सरश्च कालः कर्माङ्गः । यजमानश्च कर्ता । लोकास्तस्य कर्मफलभूतास्ते विशेष्यन्ते; सोमो यत्र येषु लोकेषु पवते पुनाति लोकान्यत्र येषु सूर्यस्तपति च ते च दक्षिणायनोत्तरायणमार्गद्वयगम्या विद्वदविद्वत्कर्तृफलभूताः ॥ ६ ॥ | जिनके पादोंका अन्त नियमित अक्षरोंमें नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकारके मन्त्र [ उत्पन्न हुए हैं ! तथा उसीसे] दीक्षा—मौञ्जी-बन्धन आदि यज्ञकर्ताके नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौसे लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्मका अङ्गभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता, तथा उसके कर्मके फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं। उन लोकोंकी विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकोंमें चन्द्रमा लोकोंको पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ताके कर्मफलभूत दक्षिणायन-उत्तरायण इन दो मार्गसे प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥ |