भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


उससे ही [कर्मके अङ्गभूत] बहुत-से देवता उत्पन्न हुए। तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥

तस्माच्च पुरुषात्कर्माङ्गभूता देवा बहुधा वस्वादिगणभेदेन सम्प्रसूताः सम्यक्प्रसूताः। साध्या देवविशेषाः। मनुष्याः कर्माधिकृताः। पशवो ग्राम्यारण्याः। वयांसि पक्षिणः। जीवनं च मनुष्यादीनां प्राणापानौ व्रीहियवौ हविरर्थौ। तपश्च कर्माङ्गं पुरुषसंस्कारलक्षणं स्वतन्त्रं च फलसाधनम्। श्रद्धा यत्पूर्वकः सर्वपुरुषार्थसाधनप्रयोगश्चित्तप्रसाद आस्तिक्यबुद्धिस्तथा सत्यम् अनृतवर्जनं यथाभूतार्थवचनं चापीडाकरम्। ब्रह्मचर्यं मैथुनासमाचारः। विधिश्चेतिकर्तव्यता ॥ ७ ॥उस पुरुषसे ही वसु आदि गणके भेदसे कर्मके अंगभूत बहुत-से देवता उत्पन्न हुए हैं। तथा साध्यगण—देवताओंकी जाति-विशेष, कर्मके अधिकारी मनुष्य, गाँव और जङ्गलमें रहनेवाले पशु, वयस्—पक्षी, मनुष्यके जीवनरूप प्राण-अपान (श्वासोच्छ्वास) हविके लिये व्रीहि और यव, पुरुषका संस्कार करनेवाला तथा स्वतन्त्रतासे फल देनेवाला कर्मका अंगभूत तप, श्रद्धा—जिसके कारण सम्पूर्ण पुरुषार्थसाधनोंका प्रयोग, चित्त-प्रसाद और आस्तिक्यबुद्धि होती है, तथा सत्य—मिथ्याका त्याग एवं यथार्थ और किसीको पीडा न देनेवाला वचन, ब्रह्मचर्य—मैथुन न करना और ऐसा करना चाहिये—इस प्रकारकी विधि [ये सब भी उस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं] ॥७॥

इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं

किं च—तथा—

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।