मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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५८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥
उस पुरुषसे ही सात प्राण (मस्तकस्थ सात इन्द्रियाँ) उत्पन्न हुए हैं। उसीसे उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिधा (विषय), सात होम (विषयज्ञान) और जिनमें वे सञ्चार करते हैं वे सात स्थान प्रकट हुए हैं। [इस प्रकार] प्रतिदेहमें स्थापित ये सात-सात पदार्थ [उस पुरुषसे ही हुए हैं] ॥ ८ ॥
| सप्त शीर्षण्याः प्राणास्तस्मादेव पुरुषात्प्रभवन्ति। तेषां च सप्तार्चिषो दीप्तयः स्वविषयावद्योतनानि। तथा सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः। सप्त होमास्तद्विषयविज्ञानानि "यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति" (महानारा० २५। १) इति श्रुत्यन्तरात्। | [दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण और एक रसना—ये] सात मस्तकस्थ प्राण उसी पुरुषसे उत्पन्न होते हैं। तथा अपने-अपने विषयोंको प्रकाशित करनेवाली उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिध—उनके सात विषय, क्योंकि प्राण (इन्द्रियवर्ग) अपने विषयोंसे ही समिद्ध (प्रदीप्त) हुआ करते हैं। सात होम अर्थात् अपने विषयोंके विज्ञान, जैसा कि "इसका जो विज्ञान है उसीको हवन करता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है, [ये सब इस पुरुषसे ही प्रकट हुए हैं]। |
| किं च सप्तेमे लोका इन्द्रियस्थानानि येषु चरन्ति सञ्चरन्ति प्राणाः। प्राणा येषु चरन्तीति प्राणानां विशेषणमिदं प्राणापा- | तथा ये सात लोक—इन्द्रियस्थान, जिनमें कि ये प्राण सञ्चार करते हैं। 'जिनमें प्राण सञ्चार करते हैं' यह प्राणोंका विशेषण [उनके प्रसिद्ध अर्थ] प्राणापानादि- |