मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| अनियताक्षरपादावसानानि वाक्यरूपाण्येवं त्रिविधा मन्त्राः। दीक्षा मौञ्ज्यादिलक्षणा कर्तृनियमविशेषाः । यज्ञाश्च सर्वेऽग्निहोत्रादयः । क्रतवः सयूपाः । दक्षिणाश्चैकगवाद्यपरिमितसर्वस्वान्ताः । संवत्सरश्च कालः कर्माङ्गः । यजमानश्च कर्ता । लोकास्तस्य कर्मफलभूतास्ते विशेष्यन्ते; सोमो यत्र येषु लोकेषु पवते पुनाति लोकान्यत्र येषु सूर्यस्तपति च ते च दक्षिणायनोत्तरायणमार्गद्वयगम्या विद्वदविद्वत्कर्तृफलभूताः ॥ ६ ॥ | जिनके पादोंका अन्त नियमित अक्षरोंमें नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकारके मन्त्र [ उत्पन्न हुए हैं ! तथा उसीसे] दीक्षा—मौञ्जी-बन्धन आदि यज्ञकर्ताके नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौसे लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्मका अङ्गभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता, तथा उसके कर्मके फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं। उन लोकोंकी विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकोंमें चन्द्रमा लोकोंको पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ताके कर्मफलभूत दक्षिणायन-उत्तरायण इन दो मार्गसे प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥ |
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः
साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च
श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
उससे ही [कर्मके अङ्गभूत] बहुत-से देवता उत्पन्न हुए। तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥
| तस्माच्च पुरुषात्कर्माङ्गभूता देवा बहुधा वस्वादिगणभेदेन सम्प्रसूताः सम्यक्प्रसूताः। साध्या देवविशेषाः। मनुष्याः कर्माधिकृताः। पशवो ग्राम्यारण्याः। वयांसि पक्षिणः। जीवनं च मनुष्यादीनां प्राणापानौ व्रीहियवौ हविरर्थौ। तपश्च कर्माङ्गं पुरुषसंस्कारलक्षणं स्वतन्त्रं च फलसाधनम्। श्रद्धा यत्पूर्वकः सर्वपुरुषार्थसाधनप्रयोगश्चित्तप्रसाद आस्तिक्यबुद्धिस्तथा सत्यम् अनृतवर्जनं यथाभूतार्थवचनं चापीडाकरम्। ब्रह्मचर्यं मैथुनासमाचारः। विधिश्चेतिकर्तव्यता ॥ ७ ॥ | उस पुरुषसे ही वसु आदि गणके भेदसे कर्मके अंगभूत बहुत-से देवता उत्पन्न हुए हैं। तथा साध्यगण—देवताओंकी जाति-विशेष, कर्मके अधिकारी मनुष्य, गाँव और जङ्गलमें रहनेवाले पशु, वयस्—पक्षी, मनुष्यके जीवनरूप प्राण-अपान (श्वासोच्छ्वास) हविके लिये व्रीहि और यव, पुरुषका संस्कार करनेवाला तथा स्वतन्त्रतासे फल देनेवाला कर्मका अंगभूत तप, श्रद्धा—जिसके कारण सम्पूर्ण पुरुषार्थसाधनोंका प्रयोग, चित्त-प्रसाद और आस्तिक्यबुद्धि होती है, तथा सत्य—मिथ्याका त्याग एवं यथार्थ और किसीको पीडा न देनेवाला वचन, ब्रह्मचर्य—मैथुन न करना और ऐसा करना चाहिये—इस प्रकारकी विधि [ये सब भी उस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं] ॥७॥ |
इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं
| किं च— | तथा— |
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सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
५८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥
उस पुरुषसे ही सात प्राण (मस्तकस्थ सात इन्द्रियाँ) उत्पन्न हुए हैं। उसीसे उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिधा (विषय), सात होम (विषयज्ञान) और जिनमें वे सञ्चार करते हैं वे सात स्थान प्रकट हुए हैं। [इस प्रकार] प्रतिदेहमें स्थापित ये सात-सात पदार्थ [उस पुरुषसे ही हुए हैं] ॥ ८ ॥
| सप्त शीर्षण्याः प्राणास्तस्मादेव पुरुषात्प्रभवन्ति। तेषां च सप्तार्चिषो दीप्तयः स्वविषयावद्योतनानि। तथा सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः। सप्त होमास्तद्विषयविज्ञानानि "यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति" (महानारा० २५। १) इति श्रुत्यन्तरात्। | [दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण और एक रसना—ये] सात मस्तकस्थ प्राण उसी पुरुषसे उत्पन्न होते हैं। तथा अपने-अपने विषयोंको प्रकाशित करनेवाली उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिध—उनके सात विषय, क्योंकि प्राण (इन्द्रियवर्ग) अपने विषयोंसे ही समिद्ध (प्रदीप्त) हुआ करते हैं। सात होम अर्थात् अपने विषयोंके विज्ञान, जैसा कि "इसका जो विज्ञान है उसीको हवन करता है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है, [ये सब इस पुरुषसे ही प्रकट हुए हैं]। |
| किं च सप्तेमे लोका इन्द्रियस्थानानि येषु चरन्ति सञ्चरन्ति प्राणाः। प्राणा येषु चरन्तीति प्राणानां विशेषणमिदं प्राणापा- | तथा ये सात लोक—इन्द्रियस्थान, जिनमें कि ये प्राण सञ्चार करते हैं। 'जिनमें प्राण सञ्चार करते हैं' यह प्राणोंका विशेषण [उनके प्रसिद्ध अर्थ] प्राणापानादि- |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
| नादिनिवृत्त्यर्थम् । गुहायां शरीरे हृदये वा स्वापकाले शेरत इति गुहाशयाः, निहिताः स्थापिता धात्रा सप्त सप्त प्रतिप्राणिभेदम् । | की आशंका निवृत्त करनेके लिये है। जो सुषुप्ति-अवस्थामें गुहा—शरीर अथवा हृदयमें शयन करते हैं वे गुहाशय तथा विधाताद्वारा प्रत्येक प्राणीमें निहित—स्थापित ये सात-सात पदार्थ [ इस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं ] । |
| यानि चात्मयाजिनां विदुषां कर्माणि कर्मफलानि चाविदुषां च कर्माणि तत्साधनानि कर्मफलानि च सर्वं चैतत्परस्मादेव पुरुषात्सर्वज्ञात्प्रसूतमिति प्रकरणार्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जो भी आत्मयाजी विद्वानोंके कर्म और कर्मफल तथा अज्ञानियोंके कर्म, कर्मफल और उनके साधन हैं वे सब उस परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं—यह इस प्रकरणका अर्थ है ॥ ८ ॥ |
पर्वत, नदी और ओषधि आदिका ब्रह्मजन्यत्व
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे-
ऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च
येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
इसीसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं; इसीसे अनेक रूपोंवाली नदियाँ बहती हैं; इसीसे सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस प्रकट हुए हैं, जिस (रस) से भूतोंसे परिवेष्टित हुआ यह अन्तरात्मा स्थित होता है ॥ ९ ॥
| अतः पुरुषात्समुद्राः सर्वे क्षाराद्याः, गिरयश्च हिमवदादयोऽस्मादेव पुरुषात्सर्वे। स्यन्दन्ते स्रवन्ति | इस पुरुषसे ही क्षारादि सात समुद्र और इसीसे हिमालय आदि समस्त पर्वत उत्पन्न हुए हैं। गङ्गा |
| ६० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| गङ्गाद्याः सिन्धवो नद्यः सर्व-रूपा बहुरूपा अस्मादेव पुरुषात् ; सर्वा ओषधयो व्रीहियवाद्याः । रसश्च मधुरादिः षड्विधो येन रसेन भूतैः पञ्चभिः स्थूलैः परिवेष्टितस्तिष्ठते तिष्ठति ह्यन्तरात्मा लिङ्गं सूक्ष्मं शरीरम् । तद्ध्यन्तराले शरीरस्यात्मनश्चात्मवद्वर्तत इत्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥ | आदि अनेक रूपोंवाली नदियाँ भी इसीसे प्रवाहित होती हैं । इसी पुरुषसे व्रीहि, यव आदि सम्पूर्ण ओषधियाँ तथा मधुरादि छः प्रकारका रस उत्पन्न हुआ है, जिस रससे कि पाँच स्थूल भूतोंद्वारा परिवेष्टित हुआ अन्तरात्मा—लिङ्गदेह यानी सूक्ष्म शरीर स्थित रहता है । यह शरीर और आत्माके मध्यमें आत्माके समान स्थित है; इसलिये अन्तरात्मा कहलाता है ॥ ९ ॥ |
ब्रह्म और जगत्का अभेद तथा ब्रह्मज्ञानसे अविद्या-ग्रन्थिका नाश
| एवं पुरुषात्सर्वमिदं सम्प्रसूतम् । अतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं पुरुष इत्येव सत्यम् । अतः— | इस प्रकार यह सब पुरुषसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः विकार वाणीका आरम्भ और नाममात्रके लिये तथा मिथ्या ही है, केवल पुरुष ही सत्य है। इसलिये— |
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद
निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
यह सारा जगत्, कर्म और तप (ज्ञान) पुरुष ही है। वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है। उसे जो सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानता है, हे सोम्य ! वह इस लोकमें अविद्याकी ग्रन्थिका छेदन कर देता है ॥ १० ॥
| पुरुष एवेदं विश्वं सर्वम् । न विश्वं नाम पुरुषादन्यत्किञ्चिदस्ति । अतो यदुक्तं तदेवेदम् | पुरुष ही यह विश्व—सारा जगत् है; पुरुषसे भिन्न 'विश्व' कोई वस्तु नहीं है । अतः 'हे भगवन् ! |
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६१ |
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| अभिहितं 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति' । एतस्मिन्हि परस्मिन्नात्मनि सर्वकारणे पुरुषे विज्ञाते पुरुष एवेदं विश्वं नान्यदस्तीति विज्ञातं भवतीति । <br><br> किं पुनरिदं विश्वमित्युच्यते । कर्माग्निहोत्रादिलक्षणम् । तपो ज्ञानं तत्कृतं फलमन्यदेतावद्धीदं सर्वम् । तच्चैतद्ब्रह्मणः कार्यम् । तस्मात्सर्वं ब्रह्म परामृतं परममृतम् अहमेवेति यो वेद निहितं स्थितं गुहायां हृदि सर्वप्राणिनां स एवं विज्ञानादविद्याग्रन्थि ग्रन्थमिव दृढीभूतामविद्यावासनां विकिरति विक्षिपति नाशयतीह जीवन्नेव न मृतः सन् हे सोम्य प्रियदर्शन १० | किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?' ऐसा जो प्रश्न किया गया था उसीका यहाँ उत्तर दिया गया है कि 'सबके कारणस्वरूप इस परमात्माको जान लेनेपर ही यह ज्ञान हो जाता है कि यह विश्व पुरुष ही है, उससे भिन्न नहीं है ।' <br><br> किन्तु यह विश्व है क्या ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—अग्निहोत्रादिरूप कर्म, तप यानी ज्ञान, उसका फल तथा इसी प्रकारका यह और सब भी [विश्व कहलाता है] । यह सब ब्रह्मका ही कार्य है । इसलिये यह सब पर अमृत ब्रह्म है और परामृत ब्रह्म मैं ही हूँ—ऐसा जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित उस ब्रह्मको जानता है हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! वह अपने ऐसे विज्ञानसे अविद्याग्रन्थिको यानी ग्रन्थि (गाँठ) के समान दृढ हुई अविद्याकी वासनाको इस लोकमें जीवित रहते ही काट डालता है—मरकर नहीं ॥१०॥ |
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इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
द्वितीय मुण्डक (द्वितीय खण्ड) - ओंकार-धनु से ब्रह्मवेधन
द्वितीय खण्ड
ब्रह्मका स्वरूपनिर्देश तथा उसे जाननेके लिये आदेश
| अरूपं सदक्षरं केन प्रकारेण विज्ञेयमित्युच्यते— | रूपहीन होनेपर भी उस अक्षरको किस प्रकार जानना चाहिये—यह अब बतलाया जाता है— |
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आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् ।
एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥
यह ब्रह्म प्रकाशस्वरूप, सबके हृदयमें स्थित, गुहाचर नामवाला और महत्पद है। इसीमें चलनेवाले, प्राणन करनेवाले और निमेषोन्मेष करनेवाले ये सब समर्पित हैं। तुम इसे सदसद्रूप, प्रार्थनीय, प्रजाओंके विज्ञानसे परे और सर्वोत्कृष्ट जानो ॥ १ ॥
| आविः प्रकाशं संनिहितं वागाद्युपाधिभिर्ज्वलति भ्राजतीति श्रुत्यन्तराच्छब्दादीनुपलभमानवदवभासते । दर्शनश्रवणमननविज्ञानाद्युपाधिधर्मैराविर्भूतं संलक्ष्यते हृदि सर्वप्राणिनाम् । | आविः—प्रकाशस्वरूप, संनिहित—समीपस्थित; वागादि उपाधियोंद्वारा प्रज्वलित होता है, प्रकाशित होता है—ऐसी एक अन्य श्रुतिके अनुसार वह शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करता-सा जान पड़ता है अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान आदि उपाधिके धर्मोंसे आविर्भूत हुआ दिखायी देता है [अतः संनिहित है] । |
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| यदेतदाविर्ब्रह्म संनिहितं सम्यक्स्थितं हृदि तद्गुहाचरं नाम । गुहायां चरतीति दर्शनश्रवणादिप्रकारैर्गुहाचरमिति प्रख्यातम्। महत्सर्वमहत्त्वात् । पदं पद्यते सर्वेणेति सर्वपदार्थास्पदत्वात् । <br><br> कथं तन्महत्पदमित्युच्यते । यतोऽत्रास्मिन्ब्रह्मण्येतत्सर्वं समर्पितं प्रवेशितं रथनाभाविवाराः । एजच्चलत्पक्ष्यादि, प्राणत्प्राणितीति प्राणापानादिमन्मनुष्यपश्वादि, निमिषच्च यन्निमेषादिक्रियावच्चानिमिषच्चशब्दात्समस्तमेतदत्रैव ब्रह्मणि समर्पितम् । <br><br> एतद्यदास्पदं सर्वं जानथ हे शिष्या अवगच्छथ तदात्मभूतं भवतां सदसत्स्वरूपम् । सदसतो- | इस प्रकार जो प्रकाशमान ब्रह्म हृदयमें संनिहित—सम्यक् स्थित है वह गुहाचर—दर्शन-श्रवणादि प्रकारोंसे गुहा ( बुद्धि ) में सञ्चार करता है इसलिये गुहाचर नामसे विख्यात है । [ वही महत्पद है ] सबसे बड़ा होनेके कारण वह 'महत्' है और सबसे प्राप्त किया जाता है अथवा सारे पदार्थोंका आश्रय है, इसलिये 'पद' है । <br><br> वह 'महत्पद' किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं—क्योंकि इस ब्रह्ममें ही, रथकी नाभिमें अरोंके समान यह सब कुछ समर्पित अर्थात् भली प्रकार प्रवेशित है । एजत्—चलने-फिरनेवाले पक्षी आदि, प्राणत्—जो प्राणन करते हैं वे प्राणापानादिमान् मनुष्य और पशु आदि, निमिषत् च—जो निमेषादि क्रियावाले और च शब्दके सामर्थ्यसे जो निमेष नहीं करनेवाले हैं वे भी इस प्रकार ये सब इस ब्रह्ममें ही समर्पित हैं । <br><br> हे शिष्यगण ! ये सब जिस [ ब्रह्मरूप ] आश्रयवाले हैं उसे तुम जानो—समझो; वह सदसत्स्वरूप तुम्हारा आत्मा है, क्योंकि उससे भिन्न |
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६४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| मूर्तामूर्तयोः स्थूलसूक्ष्मयोस्तद्- | कोई सत् या असत्—मूर्त्त या अमूर्त्त |
| व्यतिरेकेणाभावात् । वरेण्यं | अर्थात् स्थूल या सूक्ष्म है ही नहीं । |
| वरणीयं तदेव हि सर्वस्य नित्य- | और वही नित्य होनेके कारण सबका वरेण्य—वरणीय—प्रार्थनीय |
| त्वात्प्रार्थनीयम्। परं व्यतिरिक्तं | है। तथा प्रजाओंके विज्ञानसे परे |
| विज्ञानात्प्रजानामिति व्यवहितेन | यानी व्यतिरिक्त है—इस प्रकार इस [पर शब्द] का व्यवधानयुक्त |
| सम्बन्धः; यल्लौकिकविज्ञानागोच- | [प्रजानाम्] पदसे सम्बन्ध है। |
| रमिस्यर्थः । यद्वरिष्ठं वरतमं | तात्पर्य यह कि जो लौकिक विज्ञानका अविषय है, और वरिष्ठ |
| सर्वपदार्थेषु वरेषु तद्ध्येकं | यानी सम्पूर्ण श्रेष्ठ पदार्थोंमें श्रेष्ठतम |
| ब्रह्मातिशयेन वरं सर्वदोषरहित- | है, क्योंकि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित होनेके कारण एक वह ब्रह्म ही |
| त्वात् ॥ १ ॥ | अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
ब्रह्ममें मनोनिवेश करनेका विधान
| किं च— | तथा— |
यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहितां लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः । तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥
जो दीप्तिमान् और अणुसे भी अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी स्थित हैं वही यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाक् और मन है । वही यह सत्य और अमृत है । हे सौम्य ! उसका [ मनोनिवेशद्वारा ] वेधन करना चाहिये; तू उसका वेधन कर ॥२॥
| यदर्चिमद्दीप्तिमत्, दीप्त्या ह्मादित्यादि दीप्यत इति दीप्ति- | जो अर्चिमान् यानी दीप्तिमान् है; ब्रह्मकी दीप्तिसे ही सूर्य आदि देदीप्यमान होते हैं, इसलिये ब्रह्म |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
| मद्ब्रह्म। किं च यदणुभ्यः श्यामाकादिभ्योऽप्यणु च सूक्ष्मम्। चशब्दात्स्थूलेभ्योऽप्यतिशयेन स्थूलं पृथिव्यादिभ्यः। यस्मिंल्लोका भूरादयो निहिताः स्थिताः, ये च लोकिनो लोकनिवासिनो मनुष्यादयश्चैतन्याश्रया हि सर्वे प्रसिद्धाः। तदेतत्सर्वाश्रयमक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनो वाक्च मनश्च सर्वाणि च करणानि तदन्तश्चैतन्यं चैतन्याश्रयो हि प्राणेन्द्रियादिसर्वसंघातः “प्राणस्य प्राणम्” (बृ० उ० ४।४।१८) इति श्रुत्यन्तरात्। | दीप्तिमान् है। और जो श्यामाक आदि अणुओंसे भी अणु—सूक्ष्म है। ‘च’ शब्दसे यह समझना चाहिये कि जो पृथिवी आदि स्थूल पदार्थोंसे भी अत्यन्त स्थूल है। जिसमें भूर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक तथा उन लोकोंके निवासी मनुष्यादि स्थित हैं, क्योंकि सारे पदार्थ चैतन्यके ही आश्रित प्रसिद्ध हैं, वही सबका आश्रयभूत यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाणी और मन आदि समस्त इन्द्रियवर्ग है; उन सभीमें चैतन्य ओतप्रोत है, क्योंकि प्राण और इन्द्रिय आदिका सारा संघात चैतन्यके ही आश्रित है, जैसा कि “वह प्राणका प्राण है” इत्यादि एक अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। |
| यत्प्राणादीनामन्तश्चैतन्यमक्षरं तदेतत्सत्यमवितथमतोऽमृतम् अविनाशि तद्वेद्धव्यं मनसा ताडयितव्यम्। तस्मिन्मनःसमाधानं कर्तव्यमित्यर्थः। यस्मादेवं | [इस प्रकार] प्राणादिके भीतर रहनेवाला जो अक्षर चैतन्य है वही यह सत्य यानी अवितथ है; अतः वह अमृत—अविनाशी है। उसका वेधन यानी मनसे ताडन करना चाहिये। अर्थात् उसमें मनको समाहित करना चाहिये। हे सोम्य ! क्योंकि ऐसी बात है, |
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| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| हे सोम्य विद्ध्वक्षरे चेतः समाधत्स्व ॥ २ ॥ | इसलिये तू वेधन कर यानी अपने चित्तको उस अक्षरमें लगा दे ॥ २ ॥ |
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ब्रह्मवेधनकी विधि
| कथं वेद्धव्यमित्युच्यते— | उसका किस प्रकार वेधन करना चाहिये, सो बतलाया जाता है— |
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धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! उपनिषद्वेद्य महान् अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ा; और फिर उसे खींचकर ब्रह्म-भावानुगत चित्तसे उस अक्षररूप लक्ष्यका ही वेधन कर ॥ ३ ॥
| धनुरिष्वासनं गृहीत्वादायौपनिषदमुपनिषत्सु भवं प्रसिद्धं महास्त्रं महच्च तदस्त्रं च महास्त्रं धनुस्तस्मिञ्शरम्; किंविशिष्टम् इत्याह—उपासानिशितं सन्तताभिध्यानेन तनूकृतं संस्कृतमित्येतत्, सन्धयीत सन्धानं कुर्यात् । सन्धाय चायम्याकृष्य सेन्द्रियम् अन्तःकरणं स्वविषयाद्विनिवर्त्य | औपनिषद—उपनिषदोंमें वर्णित यानी उपनिषत्प्रसिद्ध महास्त्र—महान् अस्त्ररूप धनुष्—शरासन लेकर उसपर बाण चढ़ावे—किस प्रकारका बाण चढ़ावे ? इसपर कहते हैं—उपासनासे निशित यानी निरन्तर ध्यान करनेसे पैनाया हुआ—संस्कार किया हुआ बाण चढ़ावे । फिर बाण चढ़ानेके अनन्तर उसे खींचकर अर्थात् इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणको |
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| लक्ष्य एवावर्जितं कृत्वेत्यर्थः । न हि हस्तेनेव धनुप आयमनमिह सम्भवति । तद्भावगतेन तस्मिन् ब्रह्मण्यक्षरे लक्ष्ये भावना भावः तद्गतेन चेतसा लक्ष्यं तदेव यथोक्तलक्षणमक्षरं सोम्य विद्धि ॥३॥ | उनके विषयोंसे हटा अपने लक्ष्यमें ही जोड़कर—क्योंकि इस धनुषको हाथसे धनुष चढ़ानेके समान नहीं खींचा जा सकता—तद्भावगत अर्थात् अपने लक्ष्य उस अक्षर ब्रह्ममें जो भावना है उस भावमें गये हुए चित्तसे हे सोम्य ! ऊपर कहे हुए लक्षणोंवाले अपने उसी लक्ष्य अक्षर ब्रह्मका वेधन कर ॥ ३ ॥ |
वेधनके लिये ग्रहण किये जानेवाले धनुषादिका स्पष्टीकरण
| यदुक्तं धनुरादि तदुच्यते— | ऊपर जो धनुष आदि बतलाये गये हैं उनका उल्लेख किया जाता है— |
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥
प्रणव धनुष है, [ सोपाधिक ] आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है । उसका सावधानतापूर्वक वेधन करना चाहिये और बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥
| प्रणव ,ओङ्कारो धनुः । यथेष्व्रासनं लक्ष्ये शरस्य प्रवेशकारणं तथात्मशरस्याक्षरे लक्ष्ये प्रवेशकारणमोङ्कारः । प्रणवेन ह्यभ्यस्यमानेन संस्क्रियमाणस्तदालम्ब्यनोऽप्रतिबन्धेनाक्षरेऽवतिष्ठते; | प्रणव यानी ओंकार धनुष है । जिस प्रकार शरासन ( धनुष ) लक्ष्यमें बाणके प्रवेश कर जानेका साधन है उसी प्रकार [ सोपाधिक ] आत्मारूप बाणके अपने लक्ष्य अक्षरमें प्रवेश करनेका कारण ओंकार है । अभ्यास किये हुए प्रणवके द्वारा ही संस्कृत होकर वह उसके आश्रयसे बिना किसी बाधाके अक्षर ब्रह्ममें इस प्रकार स्थित होता है, जैसे धनुषसे छोड़ा |
६८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| यथा धनुषास्त इषुर्लक्ष्ये । अतः प्रणवो धनुरिव धनुः । शरो ह्यात्मोपाधिलक्षणः पर एव जले सूर्यादिवदिह प्रविष्टो देहे सर्वबौद्धप्रत्ययसाक्षितां । स शर इव स्वात्मन्येवार्पितोऽक्षरे ब्रह्मण्यतो ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । लक्ष्य इव मनःसमाधित्सुभिः आत्मभावेन लक्ष्यमाणत्वात् । <br><br> तत्रैवं सत्यप्रमत्तेन बाह्यविषयोपलब्धितृष्णाप्रमादवर्जितेन सर्वतो विरक्तेन जितेन्द्रियेणैकाग्रचित्तेन वेद्धव्यं ब्रह्म लक्ष्यम् । ततस्तद्वेधनादूर्ध्वं शरवत्तन्मयो भवेत् । यथा शरस्य लक्ष्यैकात्मत्वं फलं भवति तथा देहाद्यात्मप्रत्ययतिरस्करणेनाक्षरैकात्मत्वं फलमापादयेदित्यर्थः ॥ ४ ॥ | हुआ बाण अपने लक्ष्यमें । अतः धनुषके समान होनेसे प्रणव ही धनुष है। तथा आत्मा ही बाण है, जो कि जलमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान इस शरीरमें सम्पूर्ण बौद्ध प्रतीतियोंके साक्षिरूपसे प्रविष्ट हो रहा है। वह बाणके समान अपने ही आत्मा (स्वरूपभूत) अक्षर ब्रह्ममें अनुप्रविष्ट हो रहा है। इसलिये ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है, क्योंकि मनको समाहित करनेकी इच्छावाले पुरुषोंको वही आत्मभावसे लक्षित होता है। <br><br> अतः ऐसा होनेके अनन्तर अप्रमत्त—बाह्य विषयोंकी उपलब्धिकी तृष्णारूप प्रमादसे रहित होकर अर्थात् सब ओरसे विरक्त यानी जितेन्द्रिय होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूप अपने लक्ष्यका वेधन करना चाहिये। और फिर उसका वेधन करनेके अनन्तर बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार बाणका अपने लक्ष्यसे एकरूप हो जाना ही फल है उसी प्रकार देहादिमें आत्मत्वकी प्रतीतिका तिरस्कार कर उस अक्षरब्रह्मसे एकात्मत्वरूप फल प्राप्त करे ॥ ४ ॥ |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९
आत्मसाक्षात्कारके लिये पुनः विधि
| अक्षरस्यैव दुर्लक्ष्यत्वात्पुनः पुनर्वचनं सुलक्षणार्थम्— | कठिनतासे लक्षित होनेवाला होनेके कारण उस अक्षरका ही, भली प्रकार लक्ष्य करानेके लिये बार-बार वर्णन किया जाता है— |
यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष- मोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥
जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणोंके सहित मन ओतप्रोत है उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो; यही अमृत (मोक्षप्राप्ति) का सेतु (साधन) है ॥ ५ ॥
| यस्मिन्नक्षरे पुरुषे द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षं चोतं समर्पितं मनश्च सह प्राणैः करणैरन्यैः सर्वैस्तमेव सर्वाश्रयमेकमद्वितीयं जानथ जानीत हे शिष्याः । आत्मानं प्रत्यक्स्वरूपं युष्माकं सर्वप्राणिनां च ज्ञात्वा चान्या वाचोऽपरविद्यारूपा विमुञ्चथ विमुञ्चत परित्यजत तत्प्रकाश्यं च सर्वं कर्म ससाधनम् ; यतोऽमृतस्यैष | हे शिष्यगण ! जिस अक्षर पुरुषमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और प्राणों यानी अन्य समस्त इन्द्रियोंके सहित मन ओत—समर्पित है उस एक—अद्वितीय आत्माको ही जानो; तथा इस प्रकार आत्माको अपने और समस्त प्राणियोंके प्रत्यक्स्वरूपको जानकर अपरविद्यारूप अन्य वाणीको तथा उससे प्रकाशित होनेवाले समस्त कर्मको उसके साधनसहित छोड़ दो—उसका सब प्रकार त्याग कर दो, क्योंकि यह अमृतका सेतु है— |
७० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २
| सेतुरेेतदात्मज्ञानममृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहोदधेः उत्तरणहेतुत्वात्तथा च श्रुत्यन्तरं "तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" ( श्वे० उ० ३ । ८, ६ । १५ ) इति ॥ ५ ॥ | यह आत्मज्ञान संसार-महासागरको पार करनेका साधन होनेके कारण अमृत—अमरत्व यानी मोक्षकी प्राप्तिके लिये [ नदीके पार जानेके साधनभूत ] सेतुके समान सेतु है। जैसा कि—"उसीको जानकर पुरुष मृत्युको पार कर जाता है, उसकी प्राप्तिका [ इसके सिवा ] और कोई मार्ग नहीं है" इत्यादि एक अन्य श्रुति भी कहती है॥ ५ ॥ |
ओंकाररूपसे ब्रह्मचिन्तनकी विधि
| किं च— | तथा— |
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अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः
स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं
स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥
रथचक्रकी नाभिमें जिस प्रकार अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण नाडियाँ एकत्रित होती हैं उस ( हृदय ) के भीतर यह अनेक प्रकारसे उत्पन्न हुआ सञ्चार करता है। उस आत्माका 'ॐ' इस प्रकार ध्यान करो। अज्ञानके उस पार गमन करनेमें तुम्हारा कल्याण हो [ अर्थात् तुम्हें किसी प्रकारका विघ्न प्राप्त न हो ] ॥ ६ ॥
| अरा इव, यथा रथनाभौ समर्पिता अरा एवं संहताः सम्प्रविष्टा यत्र यस्मिन्हृदये सर्वतो देहव्यापिन्यो नाड्यस्तस्मिन्हृदये | अरोंके समान अर्थात् जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार शरीरमें सर्वत्र व्याप्त नाडियाँ जिस हृदयमें संहत अर्थात् प्रविष्ट हैं उसके भीतर यह बौद्ध प्रतीतियों- |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
| बुद्धिप्रत्ययसाक्षीभूतः स एष प्रकृत आत्मान्तर्मध्ये चरते चरति वर्तते; पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्बहुधानेकधा क्रोधहर्षादिप्रत्ययैर्जायमान इव जायमानोऽन्तःकरणोपाध्यनुविधायित्वाद्वदन्ति लौकिका हृष्टो जातः क्रुद्धो जात इति । तमात्मानम् ओमित्येवमोङ्कारालम्बनाः सन्तो यथोक्तकल्पनया ध्यायथ चिन्तयत । | का साक्षीभूत और जिसका प्रकरण चल रहा है वह आत्मा देखता, सुनता, मनन करता और जानता हुआ अन्तःकरणरूप उपाधिका अनुकरण करनेवाला होनेसे उसके हर्ष-क्रोधादि प्रत्ययोंसे मानो [नवीन-नवीनरूपसे] उत्पन्न होता हुआ मध्यमें सञ्चार करता—वर्तमान रहता है। इसीसे लौकिक पुरुष 'वह हर्षित हुआ, वह क्रोधित हुआ' ऐसा कहा करते हैं। उस आत्माको 'ॐ' इस प्रकार अर्थात् उपर्युक्त कल्पनासे ओंकारको आलम्बन बनाकर ध्यान यानी चिन्तन करो। |
| उक्तं वक्तव्यं च शिष्येभ्य आचार्येण जानता । शिष्याश्च ब्रह्मविद्याविविदिषुत्वान्निवृत्तकर्माणो मोक्षपथे प्रवृत्ताः। तेषां निर्विघ्नतया ब्रह्मप्राप्तिमाशास्त्याचार्यः। स्वस्ति निर्विघ्नमस्तु वो युष्माकं पाराय परकूलाय। परस्तात्कस्मादविद्यातमसः । अविद्यारहितब्रह्मात्मस्वरूपगमनायेत्यर्थः ॥ ६ ॥ | विद्वान् आचार्यको शिष्योंसे जो कुछ कहना था वह कह दिया। इससे ब्रह्मविद्याके जिज्ञासु होनेके कारण शिष्यगण भी सब कर्मोंसे उपरत होकर मोक्षमार्गमें जुट गये। अतः आचार्य उन्हें निर्विघ्नतापूर्वक ब्रह्मप्राप्तिका आशीर्वाद देते हैं—'पार अर्थात् पर तीरपर जानेके लिये तुम्हें स्वस्ति—निर्विघ्नता प्राप्त हो। किसके पार जानेके लिये ? अविद्यारूप अन्धकारके पार जानेके लिये अर्थात् अविद्यारहित ब्रह्मात्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिये ॥ ६ ॥ |
७२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
अपर ब्रह्मका वर्णन तथा उसके चिन्तनका प्रकार
| योऽसौतमसः परस्तात्संसार-महोदधिं तीर्त्वा गन्तव्यः परविद्याविषय इति स कस्मिन्वर्तत इत्याह— | यह जो अज्ञानान्धकारके परे संसारमहासागरको पार करके जानेयोग्य परविद्याका प्रदेश है वह किसमें वर्तमान है ? इसपर कहते हैं— |
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥ मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥७॥
जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है और जिसकी यह महिमा भूलोकमें स्थित है वह यह आत्मा दिव्य ब्रह्मपुर आकाश (हृदयाकाश) में स्थित है । वह मनोमय तथा प्राण और [सूक्ष्म] शरीरको [एक देहसे दूसरे देहमें] ले जानेवाला पुरुष हृदयको आश्रितकर अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है । उसका विज्ञान (अनुभव) होनेपर ही विवेकी पुरुष, जो आनन्दरूप अमृत ब्रह्म प्रकाशित हो रहा है, उसका सम्यक् साक्षात्कार करते हैं ॥ ७ ॥
| यः सर्वज्ञः सर्वविद्व्याख्यातः | 'जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है' इसकी व्याख्या पहले (मुण्ड० १ । १ । ९ में) की जा चुकी है । |
| तं पुनर्विनिशिनष्टि; यस्यैष प्रसिद्धो महिमा विभूतिः। कोऽसौ महिमा ? | उसीके फिर और विशेषण बतलाते हैं—जिसकी यह प्रसिद्ध महिमा यानी विभूति है; वह महिमा क्या है ? |
| यस्येमे द्यावापृथिव्यौ शासने विधृते तिष्ठतः। सूर्याचन्द्रमसौ | ये द्युलोक और पृथिवी जिसके शासनमें धारण किये हुए (यानी स्थिरतापूर्वक) स्थित हैं, जिसके |
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३ |
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| यस्य शासनेऽलातचक्रवदजस्रं भ्रमतः । यस्य शासने सरितः सागराश्च स्वगोचरं नातिक्रामन्ति। तथा स्थावरं जङ्गमं च यस्य शासने नियतम् । तथा चर्तवोऽयने अब्दाश्च यस्य शासनं नातिक्रामन्ति । तथा कर्तारः कर्माणि फलं च यच्छासनात्स्वं स्वं कालं नातिवर्तन्ते स एष महिमा भुवि लोके यस्य स एष सर्वज्ञ एवं महिमा देवो दिव्ये द्योतनवति सर्वबौद्धप्रत्ययकृतद्योतने ब्रह्मपुरे, ब्रह्मणोऽत्र चैतन्यस्वरूपेण नित्याभिव्यक्तत्वाद्ब्रह्मणः पुरं हृदयपुण्डरीकं तस्मिन्यद्व्योम तस्मिन्व्योम्न्याकाशे हृत्पुण्डरीकमध्यस्थे, प्रतिष्ठित इवोपलभ्यते । न ह्याकाशवत्सर्वगतस्य गतिरागतिः प्रतिष्ठावान्यथा सम्भवति । | शासनमें, सूर्य और चन्द्रमा अलातचक्रके समान निरन्तर घूमते रहते हैं, जिसके शासनमें नदियाँ और समुद्र अपने स्थानका अतिक्रमण नहीं करते, इसी प्रकार स्थावरजङ्गम जगत् जिसके शासनमें नियमित रहता है; तथा ऋतु, अयन और वर्ष--ये भी जिसके शासनका उल्लंघन नहीं करते एवं कर्ता, कर्म और फल जिसके शासनसे अपने-अपने कालका अतिक्रमण नहीं करते—ऐसी यह महिमा संसारमें जिसकी है वह ऐसी महिमावाला सर्वज्ञ देव दिव्य—द्युतिमान् यानी समस्त बौद्ध प्रत्ययोंसे होनेवाले प्रकाशयुक्त ब्रह्मपुरमें—क्योंकि चैतन्यस्वरूपसे इस (हृदयकमलस्थित आकाश) में ब्रह्मकी सर्वदा अभिव्यक्ति होती है इसलिये हृदयकमल ब्रह्मपुर है, उसमें जो आकाश है उस हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशमें प्रतिष्ठित (स्थित) हुआ-सा उपलब्ध होता है। इसके सिवा आकाशवत् सर्वव्यापक ब्रह्मका जाना-आना अथवा स्थित होना और किसी प्रकार सम्भव नहीं है। |
७४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| स ह्यात्मा तत्रस्थो मनोवृत्ति-भिरेव विभाव्यत इति मनोमयो मनउपाधित्वात्प्राणशरीरनेता प्राणश्च शरीरं च प्राणशरीरं तस्यायं नेता स्थूलाच्छरीराच्छरीरान्तरं प्रति । प्रतिष्ठितोऽन्ने-स्थितोऽन्ने भुज्यमानान्नविपरिणामे प्रतिदिनमुपचीयमानेऽपचीयमाने च पिण्डरूपान्ने हृदयं बुद्धिं पुण्डरीकच्छिद्रे संनिधाय समवस्थाप्य । हृदयावस्थानमेव ह्यात्मनः स्थितिर्न ह्यात्मनः स्थितिरन्ने ।<br><br>तदात्मतत्त्वं विज्ञानेन विशिष्टेन शास्त्राचार्योपदेशजनितेन ज्ञानेन शमदमध्यानसर्वत्यागवैराग्योद्भूतेन परिपश्यन्ति सर्वतः पूर्णं पश्यन्त्युपलभन्ते धीरा विवेकिनः आनन्दरूपं सर्वानर्थदुःखायासप्रहीणममृतं यद्विभाति विशेषेण स्वात्मन्येव भाति सर्वदा ॥ ७ ॥ | वहाँ (हृदयाकाशमें) स्थित वही आत्मा मनोवृत्तिसे ही अनुभव किया जाता है; इसलिये मनरूप उपाधिवाला होनेसे वह मनोमय है । तथा प्राणशरीरनेता—प्राण और शरीरका नाम प्राणशरीर है, उसे यह एक स्थूल शरीरसे दूसरे शरीरमें ले जानेवाला है । यह हृदय अर्थात् बुद्धिको उसके पुण्डरीकाकाशमें आश्रित कर अन्न यानी खाये हुए अन्नके परिणामरूप और निरन्तर बढ़ने-घटनेवाले पिण्डरूप अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है, क्योंकि हृदयमें स्थित होना ही आत्माकी स्थिति है, अन्यथा अन्नमें आत्माकी स्थिति नहीं है ।<br><br>धीर—विवेकी पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त तथा शम, दम, ध्यान, सर्वत्याग एवं वैराग्यसे उत्पन्न हुए विशेष ज्ञानद्वारा उस आत्मतत्त्वको सर्वत्र परिपूर्ण देखते यानी अनुभव करते हैं, जो आनन्दस्वरूप—सम्पूर्ण अनर्थ, दुःख और आयाससे रहित, सुखस्वरूप एवं अमृतमय सर्वदा अपने अन्तःकरणमें ही विशेषरूपसे भास रहा है ॥ ७ ॥ |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
ब्रह्मसाक्षात्कारका फल
| अस्य परमात्मज्ञानस्य फलमिदमभिधीयते— | इस परमात्मज्ञानका यह फल बतलाया जाता है— |
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भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥
उस परावर (कारणकार्यरूप) ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इस जीवकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ८ ॥
| भिद्यते हृदयग्रन्थिरविद्यावासनाप्रचयो बुद्ध्याश्रयः कामः “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः” (क० उ० २ । ३ । १४, वृ० उ० ४ । ४ । ७) इति श्रुत्यन्तरात्। हृदयाश्रयोऽसौ नात्माश्रयः भिद्यते भेदं विनाशमायाति । छिद्यन्ते सर्वज्ञेयविषयाः संशया लौकिकानामामरणान्तु गङ्गास्रोतोवत्प्रवृत्ता विच्छेदमायान्ति । अस्य विच्छिन्नसंशयस्य निवृत्ताविद्यस्य यानि विज्ञानोत्पत्तेः प्राक्तनानि जन्मान्तरे चाप्रवृत्त- | “इसके हृदयमें जो कामनाएँ आश्रित हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिके अनुसार ‘हृदयग्रन्थि’ बुद्धिमें स्थित अविद्यावासनामय कामको कहते हैं। यह हृदयके ही आश्रित रहनेवाली है आत्माके आश्रित नहीं । [उस आत्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेपर यह] भेद अर्थात् नाशको प्राप्त हो जाती है। तथा लौकिक पुरुषोंके ज्ञेय पदार्थविषयक सम्पूर्ण सन्देह, जो उनके मरणपर्यन्त गङ्गाप्रवाहवत् प्रवृत्त होते रहते हैं, विच्छिन्न हो जाते हैं। जिसके संशय नष्ट हो गये हैं और जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है ऐसे इस पुरुषके जो विज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व जन्मान्तरमें किये हुए कर्म फलोन्मुख नहीं हुए |
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