मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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७४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| स ह्यात्मा तत्रस्थो मनोवृत्ति-भिरेव विभाव्यत इति मनोमयो मनउपाधित्वात्प्राणशरीरनेता प्राणश्च शरीरं च प्राणशरीरं तस्यायं नेता स्थूलाच्छरीराच्छरीरान्तरं प्रति । प्रतिष्ठितोऽन्ने-स्थितोऽन्ने भुज्यमानान्नविपरिणामे प्रतिदिनमुपचीयमानेऽपचीयमाने च पिण्डरूपान्ने हृदयं बुद्धिं पुण्डरीकच्छिद्रे संनिधाय समवस्थाप्य । हृदयावस्थानमेव ह्यात्मनः स्थितिर्न ह्यात्मनः स्थितिरन्ने ।<br><br>तदात्मतत्त्वं विज्ञानेन विशिष्टेन शास्त्राचार्योपदेशजनितेन ज्ञानेन शमदमध्यानसर्वत्यागवैराग्योद्भूतेन परिपश्यन्ति सर्वतः पूर्णं पश्यन्त्युपलभन्ते धीरा विवेकिनः आनन्दरूपं सर्वानर्थदुःखायासप्रहीणममृतं यद्विभाति विशेषेण स्वात्मन्येव भाति सर्वदा ॥ ७ ॥ | वहाँ (हृदयाकाशमें) स्थित वही आत्मा मनोवृत्तिसे ही अनुभव किया जाता है; इसलिये मनरूप उपाधिवाला होनेसे वह मनोमय है । तथा प्राणशरीरनेता—प्राण और शरीरका नाम प्राणशरीर है, उसे यह एक स्थूल शरीरसे दूसरे शरीरमें ले जानेवाला है । यह हृदय अर्थात् बुद्धिको उसके पुण्डरीकाकाशमें आश्रित कर अन्न यानी खाये हुए अन्नके परिणामरूप और निरन्तर बढ़ने-घटनेवाले पिण्डरूप अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है, क्योंकि हृदयमें स्थित होना ही आत्माकी स्थिति है, अन्यथा अन्नमें आत्माकी स्थिति नहीं है ।<br><br>धीर—विवेकी पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त तथा शम, दम, ध्यान, सर्वत्याग एवं वैराग्यसे उत्पन्न हुए विशेष ज्ञानद्वारा उस आत्मतत्त्वको सर्वत्र परिपूर्ण देखते यानी अनुभव करते हैं, जो आनन्दस्वरूप—सम्पूर्ण अनर्थ, दुःख और आयाससे रहित, सुखस्वरूप एवं अमृतमय सर्वदा अपने अन्तःकरणमें ही विशेषरूपसे भास रहा है ॥ ७ ॥ |