मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३ |
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| यस्य शासनेऽलातचक्रवदजस्रं भ्रमतः । यस्य शासने सरितः सागराश्च स्वगोचरं नातिक्रामन्ति। तथा स्थावरं जङ्गमं च यस्य शासने नियतम् । तथा चर्तवोऽयने अब्दाश्च यस्य शासनं नातिक्रामन्ति । तथा कर्तारः कर्माणि फलं च यच्छासनात्स्वं स्वं कालं नातिवर्तन्ते स एष महिमा भुवि लोके यस्य स एष सर्वज्ञ एवं महिमा देवो दिव्ये द्योतनवति सर्वबौद्धप्रत्ययकृतद्योतने ब्रह्मपुरे, ब्रह्मणोऽत्र चैतन्यस्वरूपेण नित्याभिव्यक्तत्वाद्ब्रह्मणः पुरं हृदयपुण्डरीकं तस्मिन्यद्व्योम तस्मिन्व्योम्न्याकाशे हृत्पुण्डरीकमध्यस्थे, प्रतिष्ठित इवोपलभ्यते । न ह्याकाशवत्सर्वगतस्य गतिरागतिः प्रतिष्ठावान्यथा सम्भवति । | शासनमें, सूर्य और चन्द्रमा अलातचक्रके समान निरन्तर घूमते रहते हैं, जिसके शासनमें नदियाँ और समुद्र अपने स्थानका अतिक्रमण नहीं करते, इसी प्रकार स्थावरजङ्गम जगत् जिसके शासनमें नियमित रहता है; तथा ऋतु, अयन और वर्ष--ये भी जिसके शासनका उल्लंघन नहीं करते एवं कर्ता, कर्म और फल जिसके शासनसे अपने-अपने कालका अतिक्रमण नहीं करते—ऐसी यह महिमा संसारमें जिसकी है वह ऐसी महिमावाला सर्वज्ञ देव दिव्य—द्युतिमान् यानी समस्त बौद्ध प्रत्ययोंसे होनेवाले प्रकाशयुक्त ब्रह्मपुरमें—क्योंकि चैतन्यस्वरूपसे इस (हृदयकमलस्थित आकाश) में ब्रह्मकी सर्वदा अभिव्यक्ति होती है इसलिये हृदयकमल ब्रह्मपुर है, उसमें जो आकाश है उस हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशमें प्रतिष्ठित (स्थित) हुआ-सा उपलब्ध होता है। इसके सिवा आकाशवत् सर्वव्यापक ब्रह्मका जाना-आना अथवा स्थित होना और किसी प्रकार सम्भव नहीं है। |