भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५


मद्ब्रह्म। किं च यदणुभ्यः श्यामाकादिभ्योऽप्यणु च सूक्ष्मम्। चशब्दात्स्थूलेभ्योऽप्यतिशयेन स्थूलं पृथिव्यादिभ्यः। यस्मिंल्लोका भूरादयो निहिताः स्थिताः, ये च लोकिनो लोकनिवासिनो मनुष्यादयश्चैतन्याश्रया हि सर्वे प्रसिद्धाः। तदेतत्सर्वाश्रयमक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनो वाक्च मनश्च सर्वाणि च करणानि तदन्तश्चैतन्यं चैतन्याश्रयो हि प्राणेन्द्रियादिसर्वसंघातः “प्राणस्य प्राणम्” (बृ० उ० ४।४।१८) इति श्रुत्यन्तरात्।दीप्तिमान् है। और जो श्यामाक आदि अणुओंसे भी अणु—सूक्ष्म है। ‘च’ शब्दसे यह समझना चाहिये कि जो पृथिवी आदि स्थूल पदार्थोंसे भी अत्यन्त स्थूल है। जिसमें भूर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक तथा उन लोकोंके निवासी मनुष्यादि स्थित हैं, क्योंकि सारे पदार्थ चैतन्यके ही आश्रित प्रसिद्ध हैं, वही सबका आश्रयभूत यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाणी और मन आदि समस्त इन्द्रियवर्ग है; उन सभीमें चैतन्य ओतप्रोत है, क्योंकि प्राण और इन्द्रिय आदिका सारा संघात चैतन्यके ही आश्रित है, जैसा कि “वह प्राणका प्राण है” इत्यादि एक अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है।
यत्प्राणादीनामन्तश्चैतन्यमक्षरं तदेतत्सत्यमवितथमतोऽमृतम् अविनाशि तद्वेद्धव्यं मनसा ताडयितव्यम्। तस्मिन्मनःसमाधानं कर्तव्यमित्यर्थः। यस्मादेवं[इस प्रकार] प्राणादिके भीतर रहनेवाला जो अक्षर चैतन्य है वही यह सत्य यानी अवितथ है; अतः वह अमृत—अविनाशी है। उसका वेधन यानी मनसे ताडन करना चाहिये। अर्थात् उसमें मनको समाहित करना चाहिये। हे सोम्य ! क्योंकि ऐसी बात है,