मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
पृष्ठ 74, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 74
६४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| मूर्तामूर्तयोः स्थूलसूक्ष्मयोस्तद्- | कोई सत् या असत्—मूर्त्त या अमूर्त्त |
| व्यतिरेकेणाभावात् । वरेण्यं | अर्थात् स्थूल या सूक्ष्म है ही नहीं । |
| वरणीयं तदेव हि सर्वस्य नित्य- | और वही नित्य होनेके कारण सबका वरेण्य—वरणीय—प्रार्थनीय |
| त्वात्प्रार्थनीयम्। परं व्यतिरिक्तं | है। तथा प्रजाओंके विज्ञानसे परे |
| विज्ञानात्प्रजानामिति व्यवहितेन | यानी व्यतिरिक्त है—इस प्रकार इस [पर शब्द] का व्यवधानयुक्त |
| सम्बन्धः; यल्लौकिकविज्ञानागोच- | [प्रजानाम्] पदसे सम्बन्ध है। |
| रमिस्यर्थः । यद्वरिष्ठं वरतमं | तात्पर्य यह कि जो लौकिक विज्ञानका अविषय है, और वरिष्ठ |
| सर्वपदार्थेषु वरेषु तद्ध्येकं | यानी सम्पूर्ण श्रेष्ठ पदार्थोंमें श्रेष्ठतम |
| ब्रह्मातिशयेन वरं सर्वदोषरहित- | है, क्योंकि सम्पूर्ण दोषोंसे रहित होनेके कारण एक वह ब्रह्म ही |
| त्वात् ॥ १ ॥ | अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
ब्रह्ममें मनोनिवेश करनेका विधान
| किं च— | तथा— |
यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहितां लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः । तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥
जो दीप्तिमान् और अणुसे भी अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी स्थित हैं वही यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाक् और मन है । वही यह सत्य और अमृत है । हे सौम्य ! उसका [ मनोनिवेशद्वारा ] वेधन करना चाहिये; तू उसका वेधन कर ॥२॥
| यदर्चिमद्दीप्तिमत्, दीप्त्या ह्मादित्यादि दीप्यत इति दीप्ति- | जो अर्चिमान् यानी दीप्तिमान् है; ब्रह्मकी दीप्तिसे ही सूर्य आदि देदीप्यमान होते हैं, इसलिये ब्रह्म |