मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
पृष्ठ 73, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 73
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| यदेतदाविर्ब्रह्म संनिहितं सम्यक्स्थितं हृदि तद्गुहाचरं नाम । गुहायां चरतीति दर्शनश्रवणादिप्रकारैर्गुहाचरमिति प्रख्यातम्। महत्सर्वमहत्त्वात् । पदं पद्यते सर्वेणेति सर्वपदार्थास्पदत्वात् । <br><br> कथं तन्महत्पदमित्युच्यते । यतोऽत्रास्मिन्ब्रह्मण्येतत्सर्वं समर्पितं प्रवेशितं रथनाभाविवाराः । एजच्चलत्पक्ष्यादि, प्राणत्प्राणितीति प्राणापानादिमन्मनुष्यपश्वादि, निमिषच्च यन्निमेषादिक्रियावच्चानिमिषच्चशब्दात्समस्तमेतदत्रैव ब्रह्मणि समर्पितम् । <br><br> एतद्यदास्पदं सर्वं जानथ हे शिष्या अवगच्छथ तदात्मभूतं भवतां सदसत्स्वरूपम् । सदसतो- | इस प्रकार जो प्रकाशमान ब्रह्म हृदयमें संनिहित—सम्यक् स्थित है वह गुहाचर—दर्शन-श्रवणादि प्रकारोंसे गुहा ( बुद्धि ) में सञ्चार करता है इसलिये गुहाचर नामसे विख्यात है । [ वही महत्पद है ] सबसे बड़ा होनेके कारण वह 'महत्' है और सबसे प्राप्त किया जाता है अथवा सारे पदार्थोंका आश्रय है, इसलिये 'पद' है । <br><br> वह 'महत्पद' किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं—क्योंकि इस ब्रह्ममें ही, रथकी नाभिमें अरोंके समान यह सब कुछ समर्पित अर्थात् भली प्रकार प्रवेशित है । एजत्—चलने-फिरनेवाले पक्षी आदि, प्राणत्—जो प्राणन करते हैं वे प्राणापानादिमान् मनुष्य और पशु आदि, निमिषत् च—जो निमेषादि क्रियावाले और च शब्दके सामर्थ्यसे जो निमेष नहीं करनेवाले हैं वे भी इस प्रकार ये सब इस ब्रह्ममें ही समर्पित हैं । <br><br> हे शिष्यगण ! ये सब जिस [ ब्रह्मरूप ] आश्रयवाले हैं उसे तुम जानो—समझो; वह सदसत्स्वरूप तुम्हारा आत्मा है, क्योंकि उससे भिन्न |
|---|