मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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द्वितीय खण्ड
ब्रह्मका स्वरूपनिर्देश तथा उसे जाननेके लिये आदेश
| अरूपं सदक्षरं केन प्रकारेण विज्ञेयमित्युच्यते— | रूपहीन होनेपर भी उस अक्षरको किस प्रकार जानना चाहिये—यह अब बतलाया जाता है— |
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आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् ।
एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥
यह ब्रह्म प्रकाशस्वरूप, सबके हृदयमें स्थित, गुहाचर नामवाला और महत्पद है। इसीमें चलनेवाले, प्राणन करनेवाले और निमेषोन्मेष करनेवाले ये सब समर्पित हैं। तुम इसे सदसद्रूप, प्रार्थनीय, प्रजाओंके विज्ञानसे परे और सर्वोत्कृष्ट जानो ॥ १ ॥
| आविः प्रकाशं संनिहितं वागाद्युपाधिभिर्ज्वलति भ्राजतीति श्रुत्यन्तराच्छब्दादीनुपलभमानवदवभासते । दर्शनश्रवणमननविज्ञानाद्युपाधिधर्मैराविर्भूतं संलक्ष्यते हृदि सर्वप्राणिनाम् । | आविः—प्रकाशस्वरूप, संनिहित—समीपस्थित; वागादि उपाधियोंद्वारा प्रज्वलित होता है, प्रकाशित होता है—ऐसी एक अन्य श्रुतिके अनुसार वह शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करता-सा जान पड़ता है अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान आदि उपाधिके धर्मोंसे आविर्भूत हुआ दिखायी देता है [अतः संनिहित है] । |
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