मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| हे सोम्य विद्ध्वक्षरे चेतः समाधत्स्व ॥ २ ॥ | इसलिये तू वेधन कर यानी अपने चित्तको उस अक्षरमें लगा दे ॥ २ ॥ |
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ब्रह्मवेधनकी विधि
| कथं वेद्धव्यमित्युच्यते— | उसका किस प्रकार वेधन करना चाहिये, सो बतलाया जाता है— |
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धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! उपनिषद्वेद्य महान् अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ा; और फिर उसे खींचकर ब्रह्म-भावानुगत चित्तसे उस अक्षररूप लक्ष्यका ही वेधन कर ॥ ३ ॥
| धनुरिष्वासनं गृहीत्वादायौपनिषदमुपनिषत्सु भवं प्रसिद्धं महास्त्रं महच्च तदस्त्रं च महास्त्रं धनुस्तस्मिञ्शरम्; किंविशिष्टम् इत्याह—उपासानिशितं सन्तताभिध्यानेन तनूकृतं संस्कृतमित्येतत्, सन्धयीत सन्धानं कुर्यात् । सन्धाय चायम्याकृष्य सेन्द्रियम् अन्तःकरणं स्वविषयाद्विनिवर्त्य | औपनिषद—उपनिषदोंमें वर्णित यानी उपनिषत्प्रसिद्ध महास्त्र—महान् अस्त्ररूप धनुष्—शरासन लेकर उसपर बाण चढ़ावे—किस प्रकारका बाण चढ़ावे ? इसपर कहते हैं—उपासनासे निशित यानी निरन्तर ध्यान करनेसे पैनाया हुआ—संस्कार किया हुआ बाण चढ़ावे । फिर बाण चढ़ानेके अनन्तर उसे खींचकर अर्थात् इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणको |
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