भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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५४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


प्रजास्ता अपि तस्मादेव पुरुषात्प्रजायन्त इत्युच्यते—उस पुरुषसे ही उत्पन्न होती हैं— यह बात अगले मन्त्रसे बतलायी जाती है—

अक्षर पुरुषसे चराचरकी उत्पत्तिका क्रम

तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः

सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।

पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां

बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥

उस पुरुषसे ही, सूर्य जिसका समिधा है वह अग्नि उत्पन्न हुआ है । [ उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए ] सोमसे मेघ और [ मेघसे ] पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुष स्त्रीमें [ ओषधियोंसे उत्पन्न हुआ ] वीर्य सींचता है; इस प्रकार पुरुषसे ही यह बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥

तस्मात्परस्मात्पुरुषात्प्रजावस्थानविशेषरूपोऽग्निः । स विशेष्यते; समिधो यस्य सूर्यः समिध इव समिधः । सूर्येण हि द्युलोकः समिध्यते । ततो हि द्युलोकान्निष्पन्नात् सोमात्पर्जन्यो द्वितीयोऽग्निः सम्भवति । तस्माच्च पर्जन्यात् ओषधयः पृथिव्यां सम्भवन्ति । ओषधिभ्यः पुरुषाग्नौ हुताभ्य उपादानभूताभ्यः। पुमानग्नी रेतःउस परम पुरुषसे प्रजाका अवस्थाविशेषरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । उसकी विशेषता बतलाते हैं—सूर्य जिसका समिधा (ईंधन) है—[ अग्निहोत्रके ] समिधाके समान ही समिधा है, क्योंकि सूर्यसे ही द्युलोक समिद्ध ( प्रदीप्त ) होता है । उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए सोमसे [ पञ्चाग्नियोंमें ] दूसरा अग्नि मेघ उत्पन्न होता है । फिर उस मेघसे पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषरूप अग्निमें हवन की हुई वीर्यकी कारणरूप ओषधियोंसे [ वीर्य होता है ] । उस