भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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.खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


यस्येति सर्वत्रानुषङ्गः कर्तव्यः, अस्येत्यस्य पदस्य वक्ष्यमाणस्य यस्येति विपरिणामं कृत्वा । दिशः श्रोत्रे यस्य । वाग्विवृता उद्घाटिताः प्रसिद्धा वेदा यस्य । वायुः प्राणो यस्य । हृदयमन्तःकरणं विश्वं समस्तं जगदस्य यस्येत्येतत् । सर्वं ह्यन्तःकरणविकारमेव जगन्मनस्येव सुषुप्ते प्रलयदर्शनात् । जागरितेऽपि तत एवाग्निविस्फुलिङ्गवत्प्रतिष्ठानात् । यस्य च पद्भ्यां जाता पृथिवी । एष देवो विष्णुरनन्तः प्रथमशरीरी त्रैलोक्यदेहोपाधिः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा ॥ ४ ॥आगे कहे हुए 'अस्य' पदको 'यस्य' में परिणत कर उसकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । दिशाएँ जिसके कर्ण हैं, विवृत—उद्घाटित यानी प्रसिद्ध वेद जिसकी वाणी हैं, वायु जिसका प्राण है, विश्व—समस्त जगत् जिसका हृदय—अन्तःकरण है; सम्पूर्ण जगत् अन्तःकरणका ही विकार है, क्योंकि सुषुप्तिमें मनहीमें उसका प्रलय होता देखा जाता है और जाग्रत् अवस्थामें अग्निसे स्फुलिङ्गके समान उसे उसीसे निकलकर स्थित होता देखते हैं। तथा जिसके चरणोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है यह त्रैलोक्यदेहोपाधिक प्रथम शरीरी अनन्त देव विष्णु ही समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥

स हि सर्वभूतेषु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता सर्वकारणात्मा<br><br>पञ्चाग्निद्वारेण च याः संसरन्तिसबका कारणरूप वह परमात्मा ही समस्त प्राणियोंमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है तथा पञ्चाग्नि-के द्वारा* जो प्रजाएँ जन्म-मृत्युरूप संसारको प्राप्त होती हैं वे भी

* स्वर्ग, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँचोंका छान्दोग्योपनिषद्के पञ्चम प्रपाठकके तृतीय खण्डमें पञ्चाग्निरूपसे वर्णन किया है ।