मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| ५२ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| भवति सूत्रभाष्योक्तिवदिति । योऽपि प्रथमजात्प्राणाद्धिरण्यगर्भाज्जायतेऽण्डस्यान्तर्विराट् स तत्त्वान्तरितत्वेन लक्ष्यमाणोऽप्येतस्मादेव पुरुषाज्जायत एतन्मयश्चेत्येतदर्थमाह।तं च विशिनष्टि— | पदार्थ सुगमतासे समझमें आ जाता है । जो ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती विराट् प्रथम उत्पन्न हुए प्राण यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न होता है वह अन्य तत्त्वरूपसे लक्षित कराया जानेपर भी इस पुरुषसे ही उत्पन्न होता है और पुरुषरूप ही है—यही बात यह मन्त्र बतलाता है और उसके विशेषणोंका उल्लेख करता है— |
सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्मका विश्वरूप
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥
अग्नि (द्युलोक) जिसका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सारा विश्व जिसका हृदय है और जिसके चरणोंसे पृथिवी प्रकट हुई है वह देव सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥
| अग्निर्द्यूलोकः “असौ वाव लोको गौतमाग्निः” (छा० उ० ५ । ४ । १) इति श्रुतेः, मूर्धा यस्योत्तमाङ्गं शिरः । चक्षुषी चन्द्रश्च सूर्य्यश्चेति चन्द्रसूर्यौ | अग्नि अर्थात् “हे गौतम ! यह [स्वर्ग] लोक ही अग्नि है” इस श्रुतिके अनुसार द्युलोक ही जिसका मूर्धा—उत्तमाङ्ग यानी शिर है, चन्द्र-सूर्य यानी चन्द्रमा और सूर्य ही नेत्र हैं। इस मन्त्रमें |