भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४१
रूपात्सर्वकार्यकारणबीजत्वेनोप-होता है उस अक्षरसे—सम्पूर्ण
लक्ष्यमाणत्वात्परं तदुपाधिलक्षण-कार्य-कारणके बीजरूपसे उपलक्षित
मव्याकृताख्यमक्षरं सर्वविकारेभ्यःहोनेके कारण उन उपाधियोंवाला
तस्मात्परतोऽक्षरात्परो निरु-अव्याकृतसंज्ञक वह अक्षर अपने
पाधिकः पुरुष इत्यर्थः ।सम्पूर्ण विकारसे श्रेष्ठ है; उस सर्वोत्कृष्ट .<br>अक्षरसे भी वह निरुपाधिक पुरुष<br>उत्कृष्ट है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
यस्मिंस्तदाकाशाख्यमक्षरंकिन्तु जिसमें सम्पूर्ण व्यवहार-
संव्यवहारविषयमोतं प्रोतं चका विषयभूत वह आकाशसंज्ञक
कथं पुनरप्राणादिमत्त्वं तस्येत्यु-अक्षरतत्त्व ओतप्रोत है वह
च्यते । यदि हि प्राणादयः प्रागु-प्राणादिसे रहित कैसे हो सकता
त्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मनाहै ? ऐसी शङ्का होनेपर कहते<br>हैं—यदि प्राणादि अपनी उत्पत्तिसे
सन्ति तदा पुरुषस्य प्राणादिनापूर्व भी पुरुषके समान स्वरूपसे
विद्यमानेन प्राणादिमत्त्वं भवेन्नविद्यमान रहते तो उन विद्यमान
तु ते प्राणादयः प्रागुत्पत्तेःप्राणादिके कारण पुरुषका प्राणादि-<br>युक्त होना माना जा सकता था ।
पुरुष इव स्वेनात्मनां सन्तिकिन्तु उस समय वे अपनी उत्पत्तिसे<br>पूर्व पुरुषके समान स्वरूपतः हैं नहीं;
तदा, अतोऽप्राणादिमान्परःइसलिये, जिस प्रकार पुत्र उत्पन्न न
पुरुषः; यथानुत्पन्ने पुत्रेऽपुत्रोहोनेतक देवदत्त पुत्रहीन कहा जाता
देवदत्तः ॥ २ ॥है उसी प्रकार परम पुरुष भी<br>अप्राणादिमान् है ॥ २ ॥