संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५९
छन्दसि' इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ है। 'नृमणाः' इस पदमें 'छन्दस्युदवग्रहात्' सूत्रसे 'न' का 'ण' हुआ है। बाहुलक चार प्रकारके होते हैं—कहीं प्रवृत्ति होती है, कहीं अप्रवृत्ति होती है, कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद-समुदाय सिद्ध है। क्रियावाची 'भू' 'वा' आदि शब्दोंकी 'धातु' संज्ञा जाननी चाहिये। 'भू' आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ १८-१९॥ 'एध' आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं (इन्हें 'अनुदात्तेत्' माना गया है)। मुने! 'अत' आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं॥ २०॥ शी-कृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) बताये गये हैं। 'गुप्' आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २२॥ 'घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोंद्वारा 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। 'अण्' आदि सत्ताईस धातु 'उदात्तेत्' बताये गये हैं॥ २३॥ 'अय' आदि चौंतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) माने गये हैं। 'मव्य' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं॥ २४॥ 'धावु' धातु अकेला ही 'स्वरितेत्' कहा गया है। 'क्षुध्' आदि बावन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं॥ २५॥ 'घुषिर्' आदि अठासी धातु 'उदात्तेत्' माने गये हैं। 'द्युत' आदि बाईस धातु 'अनुदात्तेत्' स्वीकार किये गये हैं॥ २६॥ घटादिमें तेरह धातु 'षित्' और 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'ज्वर' आदि बावन धातु उदात्त बताये गये हैं॥ २७॥ 'राजू' धातु 'स्वरितेत्' है। उसके बाद 'भ्राजू' भ्राशू और भ्लाशू'—ये तीन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'स्यमु' धातुसे लेकरं आगे सभी आद्युदात्त एवं उदात्तेत् (परस्मैपदी) हैं॥ २८॥ फिर एकमात्र 'षह' धातु 'अनुदात्तेत्' तथा अकेला 'रम' धातु 'आत्मनेपदी' है। उसके बाद 'सद' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। फिर 'कुच' आदि चार धातु भी 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) ही हैं॥ २९॥ इसके बाद 'हिक्क' आदि पैंतीस धातु 'स्वरितेत्' हैं। 'श्रिय्' धातु स्वरितेत् है। 'भृञ्' आदि चार धातु भी स्वरितेत् ही हैं॥ ३०॥ 'धेट्' आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ३१॥ फिर 'पूङ्' आदि तीन धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। 'ह्व' धातु परस्मैपदी है। फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं॥ ३२॥ 'रम' आदि धातु अनुदात्तेत् हैं और 'जिक्ष्विदा' उदात्तेत् है। स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं॥ ३३॥ 'कित' धातु 'उदात्तेत्' है। 'दान' 'शान'—ये दो धातु उभयपदी हैं। 'पच' आदि नौ धातु स्वरितेत् (उभयपदी) हैं। वे परस्मैपदी (और आत्मनेपदी दोनों) माने गये हैं॥ ३४॥ फिर तीन स्वरितेत् धातु हैं। परिभाषणार्थक 'वद' और 'वच' धातु परस्मैपदी हैं। ये एक हजार छः धातु भ्वादि कहे गये हैं॥ ३५॥
'अद' और 'हन्' धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'द्विष' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हैं॥ ३६॥ यहाँ केवल 'चक्षिङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है। फिर 'ईर' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हैं॥ ३७॥ मुने! वैयाकरणोंने 'षूङ्' और 'शीङ्'—इन दो धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर 'षु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३८॥ मुनीश्वर! यहाँ एक 'ऊर्णुञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है। 'द्यु' आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३९॥ नारद! केवल 'ष्टुञ्' धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है॥ ४०॥ 'रा' आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं। नारद! फिर केवल 'इङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है॥ ४१॥ उसके बाद 'विद' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं। 'जिष्वप् शये' यह धातु परस्मैपदी कहा गया है॥ ४२॥ मुने! 'श्वस'