भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २८१


घटानेसे इष्टकालिक ग्रह होता है१ ॥ ८८ १/२ ॥

(चन्द्रादि ग्रहोंके परम विक्षेप)—भचक्रकला (२१६००)-के ८० वाँ भाग (२७०) कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्त (सूर्यके मार्ग)-से परम दक्षिण और उत्तर चन्द्रमा विक्षिप्त होता (हटता) है। एवं गुरु ६० कला, मङ्गल ९० कला, बुध, शुक्र और शनि—ये तीनों १२० कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्तसे दक्षिण और उत्तर हटते रहते हैं२ ॥ ८९-९० १/२ ॥

राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्द्धमुच्यते ॥ ९१ ॥
तत्तद् विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम्।
आद्ये नैवं क्रमात् पिण्डान् भक्त्वा लब्धोनसंयुताः ॥ ९२ ॥
खण्डकाः स्युश्चतुर्विंशज्ज्यार्द्धपण्डाः क्रमादमी।
परमापक्रमज्या तु समरन्ध्रगुणेन्दवः ॥ ९३ ॥


तद्गुणा ज्या त्रिजीवाप्ता तच्चापं क्रान्तिरुच्यते।

(अभीष्ट जीवासाधनके लिये उपयोगी २४ जीवासाधन)—१ राशि-कला १८०० का आठवाँ भाग (२२५ कला) प्रथम जीवाध्र्र३ होता है। उस (प्रथम जीवाध्र्र) से प्रथम जीवाध्र्रमें भाग देकर लब्धिको प्रथम जीवाध्र्रमें ही घटाकर शेष (प्रथमखण्ड) को प्रथम जीवाध्र्रमें ही जोड़नेसे द्वितीय जीवाध्र्र होता है। इसी प्रकार प्रथम जीवासे ही द्वितीय जीवामें भाग देकर लब्धिको द्वितीय खण्डमें घटाकर शेषको द्वितीय जीवाध्र्रमें जोड़नेसे तृतीय जीवाध्र्र होता है। इसी तरह आगे भी क्रिया करनेसे क्रमशः २४ जीवाध्र्र सिद्ध४ होते हैं ॥ ९१-९२ १/२ ॥

इस प्रकार सूर्यकी परमक्रान्तिज्या १३९७


१. मान लीजिये, शुक्रवार मध्यरात्रिकालिक ग्रह जानकर अग्रिम प्रातः छः बजेका मध्यम सूर्य बनाना है तो— इष्टकाल ६ घंटा (१५ घड़ी) हुआ। इसलिये सूर्यकी कलादि गति ५९।८ को १५ से गुणा करके ६० का भाग देनेसे लब्धि १४ कला ४७ विकलाको मध्यरात्रिके सूर्य ७।६।४।७ में जोड़नेसे ७।६।१८।५४—यह शनिवारके प्रातः छः बजेका मध्यम सूर्य हुआ।

२. सूर्य और अन्य ग्रहोंके मार्गोंका योगस्थान (चौराहा) पात कहलाता है। जब ग्रह अपने मार्गपर चलता हुआ पात-स्थानमें आता है, उस समय वह क्रान्तिवृत्तमें होनेके कारण अपने स्थानमें ही होता है; क्योंकि सब ग्रहोंके स्थान क्रान्तिवृत्तमें ही होते हैं। पात-स्थानसे आगे-पीछे होनेपर क्रान्तिवृत्तसे जितनी दूर विक्षिप्त होते (हटते) हैं, उतना उस ग्रहका 'विक्षेप' (शर) कहलाता है। सूर्यके मार्गको 'क्रान्तिमण्डल' और अन्य ग्रहोंके मार्गको उन-उन ग्रहोंका 'विमण्डल' कहते हैं तथा चन्द्रमाके पातस्थानको ही 'राहु' और 'केतु' कहते हैं।

३. जीवा, ज्या, शिञ्जिनी, मौर्वी गुण, रज्जु—ये पर्यायवाची शब्द हैं। ज्योतिषमें चाप और जीवाके द्वारा ही ग्रहगणित होता है; क्योंकि ग्रहका मार्ग वृत्ताकार है। वृत्त परिधिका खण्ड चाप कहलाता है। जैसे अ, ग, प, ल, अ यह वर्तुल मार्ग वृत्तपरिधि है। इसमें अ-क, अ-ग आदि परिधिखण्ड चाप कहलाते हैं। जैसे अ, इ, क चाप है तो अ, क सरलरेखा अ, इ, क, चापकी पूर्णज्या कहलाती है तथा अ, त, सरलरेखा अ, इ, क चापकी उत्क्रमज्या तथा क, त रेखा अ, इ, क चापका जीवाध्र्र वा ज्यार्ध कहलाती है। इसीको अर्धज्या भी कहते हैं। गणितमें अर्धज्या (ज्यार्ध)-से ही काम लिया जाता है; इसलिये ज्योतिषग्रन्थमें ज्यार्धको ही ज्या=जीवा=मौर्वी आदि कहते हैं। वे जीवाध्र्र या जीवा वृत्तके चतुर्थांशमें ही बनते हैं। इस वृत्तके चतर्थांशको पद कहा गया है। अतः सम्पूर्ण वृत्तमें ४ पद होते हैं। १, ३ विषम और २, ४ सम पद कहलाते हैं।

वृत्तकी सम्पूर्ण परिधिमें १२ राशि या ३६० अंश होते हैं; इसलिये एक-एक पदमें तीन-तीन राशि या ९० अंश होते हैं। प्रथम और तृतीय पदमें गत चापको भुज और गम्य चापको कोटि कहते हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ पदमें गत चापको कोटि और गम्य चापको ही भुज कहते हैं। जैसे—प्रथम पदमें 'अ क'-भुज और 'क ग'-कोटि है तथा द्वितीय पदमें ग च=कोटि और च प=भुज है। प्रत्येक पदमें चापको ९० अंशमें घटानेसे शेष उस चापकी कोटि होती है; इसलिये क ग चाप=अ क चापकी कोटि, तथा क न सरल रेखा कोटिज्या है एवं सम (द्वितीय) पदमें च र भुजज्या और च व कोटिज्या कहलाती है। इसी क्रमसे तृतीय और चतुर्थ पदमें भुजज्या और कोटिज्या समझनी चाहिये। केवल 'ज्या' शब्दसे सर्वत्र भुजज्या ही समझी जाती है।

४. उदाहरण—जैसे—प्रथमज्या २२५में प्रथमज्या २२५ से भाग देकर लब्धि १ को प्रथमज्यामें घटाकर २२४ (प्रथम खण्ड) हुआ। इसको प्रथमज्यामें जोड़नेसे २२४+२२५=४४९ यह द्वितीय जीवा हुई। द्वितीय जीवा ४४९ में प्रथमज्या २२५ का