भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 289
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २८७

[वाम स्तम्भ]

तिथयः शुक्लप्रतिपदो याता द्विघ्ना नगोद्धृताः ।
शेषं बवो बालवश्च कौलवस्तैतिलो गरः ॥ १२३॥
वणिजश्च भवेद्विष्टिः कृष्णभूतापरार्द्धतः ।
शकुनिर्नागश्च चतुष्पदः किंस्तुघ्नमेव च ॥ १२४ ॥

(तिथिमें करण जाननेकी रीति—) शुक्लपक्षकी प्रतिपदादि गत-तिथि-संख्याको दूना करके ७ के द्वारा भाग देनेसे १ आदि शेषमें क्रमसे १ बव, २ बालव, ३ कौलव, ४ तैतिल, ५ गर, ६ वणिज, ७ विष्टि (भद्रा)—ये करण वर्तमान तिथिके पूर्वार्धमें होते हैं¹। (ये ७ करण शुक्ल प्रतिपदाके उत्तरार्धसे कृष्ण १४ के पूर्वार्धतक (२८) तिथियोंमें ८ आवृत्ति कर आते हैं। इसलिये ये ७ चर करण कहलाते हैं। कृष्णपक्ष १४ के उत्तरार्धसे शुक्ल प्रतिपदाके पूर्वार्धतक, क्रमसे १ शकुनि, २ नाग, ३ चतुष्पद और ४ किंस्तुघ्न—ये चार स्थिर करण होते हैं² ॥ १२३-१२४॥

शिलातलेऽम्बुसंशुद्धे वज्रलेपेऽपि वा समे।
तत्र शङ्कवङ्गुलैरिष्टैः समं मण्डलमालिखेत् ॥ १२५ ॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छाङ्कं कल्पनाद्द्वादशाङ्गुलम् ।
तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्ते पूर्वापराह्नयोः ॥ १२६ ॥
तत्र बिन्दुं विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ।
तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा ॥ १२७ ॥
याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा।
दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि ॥ १२८ ॥


[दक्षिण स्तम्भ]

चतुरस्रं बहिः कुर्यात् सूत्रैर्मध्याद्विनिःसृतैः ।
भुजसूत्राङ्गुलैस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा स्मृता ॥ १२९ ॥
प्राक्पश्चिमाथ्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डले ।
उन्मण्डले च विषुवन्मण्डले परिकीर्त्यते ॥ १३० ॥
रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्भाग्रगा तथा।
इष्टच्छायाविषुवतोर्मध्यमग्राभिधीयते ॥ १३१ ॥

(दिक्साधन—) जलसे संशोधित (परीक्षित) शिलातल या वज्रलेप (सीमेंट) से सम बनाये हुए भूतलमें जिस अङ्गुलमानसे शंकु बनाया गया हो, उसी अङ्गुलमानसे अभीष्ट त्रिज्‍याङ्गुलसे वृत्त बनाकर उसके मध्य (केन्द्र)-में समान द्वादश विभाग (कल्पित अङ्गुल)-से बने हुए शंकुकी स्थापना करे। उस शंकुकी छायाका अग्र भाग दिनके पूर्वार्धमें जहाँ वृत्त-परिधिमें स्पर्श करे, वहाँ पश्चिम बिन्दु जाने और दिनके उत्तरार्धमें फिर उसी शंकुकी छायाका अग्रभाग जहाँ वृत्तपरिधिको स्पर्श करे, वहाँ पूर्व बिन्दु समझे। इस प्रकार पूर्व और पश्चिम बिन्दु्का ज्ञान करे। अर्थात् उन दोनों बिन्दुओंमें एक सरल रेखा खींचनेसे पूर्वापर-रेखा होगी। उस पूर्वापर रेखाके दोनों अग्रोंको केन्द्र मानकर दो वृत्तार्ध बनानेसे मत्स्याकार होगा। उसके मुख एवं पुच्छमें रेखा करनेसे दक्षिणोत्तर-रेखा होगी। यह दक्षिणोत्तरेरेखा केन्द्रबिन्दुमें होकर जाती है। यह रेखा जहाँ वृत्तमें स्पर्श करे, वहाँ


५७। ३६ है तो चन्द्रमा ६। २४। १५। ३ में सूर्य १। ५। ४२। ३७ को घटानेसे शेष ५। १८। ३२। २६ की कला १०११२। २६ में ७२० से भाग देनेपर लब्धि १४ गत तिथि हुई; शेष ०। ३२। २६ पूर्णिमाकी गत कलादि है। इसको ७२० कलामें घटानेसे शेष ६८७। ३४ पूर्णिमाकी भोग्य कलादि हुई। गत कला ३२। २६ को ६० से गुणा कर गुणनफल १९४६ में चन्द्रमा और सूर्यकी गत्यन्तरकला ७६१। २४ से भाग देनेपर लब्ध घड़ी-पल २। ३३ पूर्णिमा तिथिका भुक्त हुआ। तथा भोग्य कला ६८७। ३४ को ६० से गुणाकर गुणनफल ४१२५४ में गत्यन्तरकला ७६१। २४ से भाग देनेपर लब्ध घट्यादि ५४। १२ पूर्णिमा तिथिका भोग्य (सूर्योदयसे आगेका मान) हुआ।

१. जैसे शुक्लपक्षकी द्वादशीमें करणका ज्ञान प्राप्त करना है तो गत तिथि-संख्या ११ को दूना करनेसे २२ हुआ। इसमें ७ से भाग देनेपर शेष १ रहा। अतः द्वादशीके पूर्वार्धमें बव और उत्तरार्धमें बालव नामक करण हुआ। कृष्ण पक्षकी तिथि-संख्यामें १५ जोड़कर तिथि-संख्या ग्रहण करनी चाहिये। जैसे कृष्ण पक्षकी द्वादशीमें करण जानना हो तो गत तिथि-संख्या २६ को २ से गुणा करके गुणनफल ५२ में ७ से भाग देनेपर शेष ३ रहा। अतः द्वादशीके पूर्वार्धमें तीसरा कौलव और उत्तरार्धमें चौथा तैतिल नामक करण हुआ।
२. तिथिमानका आधा करण कहलाता है। इसलिये एक-एक तिथिमें २, २ करण होते हैं। बवादि ७ चर करण और शकुनि आदि ४ स्थिर करण हैं।