संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें२९२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
'भुक्तासु' साधनकर दोनोंको जोड़े तथा उसमें उन दोनों (लग्न और सूर्य)-के^१ बीचमें जो राशियाँ हों, उनके उदयासुओंको जोड़े तो 'इष्टकालासु' होते हैं^२ ॥ १४९\frac{१}{२}॥ विराह्वर्कभुजांशाश्चेदिन्द्राल्पाः स्याद्ग्रहो विधोः ॥ १५० ॥ तैंऽशाः शिवघ्नाः शैलाप्ता व्यग्वर्कांशः शरोऽङ्गलैः। अर्कं विधुर्विधुं भूभा छादयत्यथ छन्नकम् ॥ १५१ ॥ छाद्यच्छादकमानार्धं शरोनं ग्राह्यवर्जितम्। तत् खच्छन्नं च मानैक्यार्धं शराढ्यं दशाहतम् ॥ १५२ ॥ छन्नघ्नमस्मान्मूलं तु स्वाङ्ग्रोनं ग्लौवपुर्हतम्। स्थित्यर्द्धं घटिकादि स्याद्व्यगुवाह्वंशसंमितैः ॥ १५३ ॥ इष्टैः पलैस्तदूनाढ्यं व्यगावूनेऽर्कषड्गृहात्। तदन्यथाधिके तस्मिन्नेवं स्पष्टे मुखान्त्यगे ॥ १५४॥
(ग्रहण-साधन—) पर्वान्त^३ कालमें स्पष्ट सूर्य, चन्द्र और राहुका साधन करे। सूर्यमें राहुको घटाकर जो शेष बचे, उसके भुजांश यदि १४ से अल्प हो तो चन्द्रग्रहण^४की सम्भावना समझे ॥१५०॥ उन भुजांशोंको ११ से गुणा कर ७ से भाग देनेपर
१. यहाँ आगे रहनेवाला अधिक और पीछे रहनेवाला ऊन समझा जाता है। एवं दोनोंके अन्तर ६ राशिसे अल्पवाला ग्रहण करना चाहिये। यदि सूर्य अधिक रहे तो रात्रि शेष इष्टकाल समझना चाहिये। २. उदाहरणार्थ प्रश्न—यदि सायनसूर्य १।२४।४५।० और सायन लग्न ३।५।२०।३० है तो इष्टकाल क्या होगा? उत्तर—यहाँ लग्न अधिक है, इसलिये लग्नके भुक्तांश ५।२०।३० को कर्कराशिके 'स्वदेशोदयासु' २०५५ से गुणा करनेपर गुणनफल १०९७७ हुए। उसमें ३० का भाग देनेपर ३६५।५४=३६६ लग्नके 'भुक्तासु' हुए। तथा सूर्यके भोग्यांश ५।१५।० को वृषराशिके 'स्वदेशोदयासु' १५०७ से गुणा कर गुणनफल ७९११ में ३० से भाग देनेपर लब्ध सूर्यके भोग्यासु २६४ हुए। लग्नके 'भुक्तासु' ३६६ और सूर्यके 'भोग्यासु' २६४ के योग ६३० में मध्यकी राशि मिथुनके 'स्वदेशोदयासु' १८१५ जोड़नेसे २४४५ 'इष्टकालासु' हुए। इनमें ६ का भाग देनेपर लब्धि पल ४०७।३० हुए। इनमें ६० का भाग देनेपर लब्ध घट्यादि ६।४७।३० सूर्योदयसे इष्टकाल हुआ। ३. चन्द्रग्रहणमें पूर्णिमा और सूर्यग्रहणमें अमावास्या पर्व कहलाता है। ४. सूर्य और चन्द्रग्रहणका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—ग्रह जिस मार्गमें घूमता हुआ पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता है, वह (मार्ग) उस ग्रहकी कक्षा कहलाता है। पृथ्वीसे सूर्यकी कक्षा दूर और चन्द्रकी कक्षा समीप है। इसलिये सूर्य और पृथ्वीके बीचमें ही चन्द्रमा घूमता रहता है। जिस दिशामें सूर्य रहता है, उससे विरुद्ध या सामनेकी दिशामें पृथ्वीकी छाया रहती है। जिस प्रकार सूर्य घूमता है, उसी प्रकार उक्त छाया भी घूमती है और उसकी लंबाई चन्द्रकक्षासे आगेतक बढ़ी हुई होती है। पृथ्वी गोल होनेके कारण चन्द्रकक्षामें पृथ्वीकी छाया भी गोलाकार ही होती है। वह सूर्यसे सर्वदा ६ राशिपर ही घूमती रहती है। चन्द्रमा अपनी कक्षामें घूमता हुआ जब सूर्यके साथ एक दक्षिणोत्तर रेखामें स्थित होता है, उस समय दर्शान्त (अमावास्याके अन्त और शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भकी संधि)-काल कहलाता है। तथा जब सूर्यसे चन्द्रमा ६ राशि आगे पहुँच जाता है, उस समयको पूर्णिमान्त काल कहते हैं।
सर्वग्रास चन्द्र-ग्रहणका दृश्य
चन्द्रमाका बिम्ब जलमय है, उसके जिस भागपर सूर्यकी किरणें पड़ती हैं, वह भाग तेजोयुक्त (उज्ज्वल) दीख पड़ता है। अतः उसके द्वारा रात्रिमें भी अन्धकारका निवारण होता है।
ऊपर कहा गया है कि सूर्यसे ६ राशिपर पृथ्वीकी छाया घूमती है और चन्द्रमाके सूर्यसे ६ राशिपर पहुँचनेपर पूर्णिमा होती है; इसलिये जिस पूर्णिमामें चन्द्रमा पृथ्वीकी छायासे अगल-बगल होकर चला जाता है, उसमें चन्द्रग्रहण नहीं होता है। तथा जिस पूर्णिमामें चन्द्रमा पृथ्वीकी छायामें पड़ जाता है, उस समय उसपर सूर्यकी किरणें नहीं पड़ती हैं; अतः चन्द्रमा पूर्ण अदृश्य हो जाता है और वह 'सर्वग्रास' या 'खग्रास' 'चन्द्रग्रहण' कहलाता है। जिस पूर्णिमामें चन्द्रमाका कुछ ही भाग पृथ्वीकी छायामें पड़ता है, उस समय उतने ही भागके अदृश्य होनेके कारण उसे 'खण्डग्रहण' कहते हैं। इसीलिये चन्द्रग्रहण पूर्णिमाको ही होता है।
(सूर्यग्रहण—) ऊपर बताया गया है कि चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्यके बीचमें घूमता है और सूर्यके समीप एक दक्षिणोत्तर रेखामें पड़ता है, उस दिन चन्द्रमाके