भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 293
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २९१

स्वोदयासुहता भुक्तभोग्या भक्ताः खवह्निभिः। अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यासून्प्रविशोधयेत् ॥१४६॥ तद्वदेवैष्यलग्नग्रासूनेवं यातांस्तथोत्क्रमात्। शेषं चेत् त्रिंशताभ्यस्तमशुद्धेन विभाजितम् ॥१४७॥ भागयुक्तं च हीनं च व्ययनांशं तनुः कुजे।

लग्न-साधन— इष्टकालिक सायनांश सूर्यके भुक्तांश और भोग्यांशद्वारा 'भुक्तासु' और 'भोग्यासु' का साधन करना चाहिये। (यथा—भुक्तांशको सायन सूर्यके स्वदेशोदयमानसे गुणा करके ३० का भाग देनेपर लब्धि 'भुक्तासु' और भोग्यांशको स्वदेशोदयमानसे गुणा करके उसमें ३० के द्वारा भाग देनेपर लब्धि 'भोग्यासु' होते हैं। इष्ट घटीके 'असु' बनाकर उसमें 'भोग्यासु' को घटावे, घटाकर जो शेष बचे, उसमें अग्रिम राशियोंमेंसे जितनेके स्वदेशोदयमान घटें, उतने घटावे। (अथवा) इसी प्रकार 'इष्टासु' में 'भुक्तासु' घटाकर शेषमें, गत राशियोंके उत्क्रमसे उनके जितने स्वदेशोदयमान घटें, घटावे। जिस राशितकका मान घट जाय, वहाँतक 'शुद्ध' और जिसका मान नहीं घटे, वह 'अशुद्ध' संज्ञक होती है। बचे हुए 'इष्टासु' को ३० से गुणा करके 'अशुद्ध' राशिके उदयमानसे भाग देकर लब्ध अंशादिको (भोग्य-क्रम-विधि हो तो) शुद्ध राशिसंख्यामें जोड़ने और (भुक्त-उत्क्रम-विधि हो तो) अशुद्ध राशिकी संख्यामें घटानेसे 'सायन लग्न' होता है। उसमें अयनांश घटानेसे फलकथनोपयुक्त उदयलग्न होता है१ ॥१४५–१४७ १/२॥

प्राक् पश्चात्नतनाडीभिस्तद्वल्लङ्कोदयासुभिः ॥१४८॥ भानौ क्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तदा भवेत्। भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च ॥१४९॥ सपिण्ड्यान्तरलग्नासूनेवं स्यात्कालसाधनम्।

(मध्य-दशम लग्न-साधन—) इसी प्रकार पूर्व 'नतकालासु' से लङ्कोदयद्वारा अंशादि साधन करके उसको सूर्यमें घटानेसे तथा पश्चिम 'नतकालासु' और लङ्कोदयद्वारा (त्रैराशिकसे) अंशादि साधन करके सूर्यमें जोड़नेसे मध्य (दशम=आकाशमध्य) लग्न होता है२ ॥१४८ १/२॥

(लग्न और स्पष्ट-सूर्यको जानकर इष्टकाल-साधन—) लग्न और सूर्य इन दोनोंमें जो ऊन (पीछे) हो, उसके 'भोग्यांश' द्वारा 'भोग्यासु' और जो अधिक (आगे) हो उसके भुक्तांशद्वारा


१. जैसे—यदि कल्पित अयनांश १८।१० और सूर्य १।५।५२।४० है तो उनका योग सायन सूर्य १।२४।२।४० हुआ। इष्ट काल घड़ी-पल १०।२० है। अतः सूर्यके वृषराशि-भोग्यांश ५।५७।२० और इष्ट कालासु ३७२० हुए। सूर्यके भोग्यांश ५।५७।२० को वृषराशिके स्वोदयासु संख्या १५०७ से गुणा करनेपर ३७२०।८५८९९।३०१४० को ६० से सवर्णन करनेपर ८९७५।१।२० हुआ। इसमें ३० का भाग देनेसे लब्धि २९९।१०।३ भोग्यासु हुई। इसको इष्टकालासु ३७२० में घटानेसे ३४२०।४९।५७ हुआ। इसमें वृषके परवर्ती मिथुनके स्वोदयासु १८१५ को घटानेसे शेष १६०५।४९।५७ हुआ। इसमें कर्कका स्वोदयासु-२०५५ नहीं घटता है; इसलिये कर्कराशि अशुद्ध और मिथुन शुद्ध संज्ञक हुआ। शेष असु १६०५।४९।५७ को ३० से गुणा करनेपर ४८१७४।५८।३० हुआ। इसमें अशुद्ध कर्कके स्वोदयमान २०५५ का भाग देनेसे लब्ध अंशादि २३।२६।३२ में शुद्धराशि (मिथुन) संख्या ३ जोड़नेसे ३।२३।२६।३२ हुआ। इसमें अयनांश १८।१० को घटानेसे २।५।१६।३२ यह लग्न हुआ।

लग्न बनानेमें विशेषता यह है कि यदि सूर्योदयसे इष्टकालद्वारा लग्न बनाना हो तो सायन सूर्यके भोग्यांशद्वारा तथा इष्टकालको ६० घड़ीमें घटाकर शेषकालद्वारा बनाना हो तो सूर्यके भुक्तांशद्वारा ही उपर्युक्त विधिसे लग्न बनाना चाहिये।

२. उदाहरण—यदि पूर्व 'नतकालासु' ३७५० और 'सायनसूर्य' ६।५।४।१० है तो भुक्त-प्रकारसे और 'लङ्कोदय' द्वारा दशम लग्नका साधन इस प्रकार होगा—सूर्यके 'भुक्तांश' ५।४।१० को तुलाराशिके 'लङ्कोदय' १६७० से गुणा करनेपर गुणनफल ८४६५ हुआ। इसमें ३० का भाग देनेसे भागफल २८२ सूर्यके भुक्तासु हुए। इनको 'नतकालासु' ३७५० में घटानेसे शेष ३४६८ रहा। उसमें सूर्यसे पीछेकी कन्याराशिके लङ्कोदयासु १७९५ को घटानेपर शेष १६७३ रहा। इसमें सिंहका लङ्कोदयासु १७९५ नहीं घटता है, अतः यह सिंह अशुद्ध संज्ञक हुआ। अब शेष असु १६७३ को ३० से गुणा करके गुणनफल ५०१९० में अशुद्ध उदयासु १७९५ का भाग देनेसे लब्ध अंशादि २७।५७।३९ हुए। इनको अशुद्ध राशि-संख्या ५ में घटानेपर शेष ४।२।२।२१ सायन दशम लग्न हुआ।