भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 304 में से

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असंयत एवं उच्छृंखल ही कहा जायेगा। प्रेमान्ध व्यक्तियों की बात छोड़ दें, तो ऐसी स्त्रियों को युवक प्रायः अपने विलास की सामग्री समझते हैं, उन्हें अपनी अर्धांगिनी कदापि नहीं बनाते। माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृष्वसा। पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी स्नुषा ॥ 73 ॥ दुहिताऽऽचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता। राज्ञी प्रव्रजिता धात्री साध्वी वर्णोत्तमा च या ॥ 74 ॥ असा मान्यतमां गत्वा गुरुतल्पग उच्यते। शिश्नस्योत्कर्तनं तस्य नान्यो दण्डो विधीयते ॥ 75 ॥ निम्नोक्त बीस सम्बन्धियों से सम्भोग करने वाले युवक के लिंग को काट देना ही इस पाप का एकमात्र दण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड नहीं है— सम्बन्धी स्त्रियां हैं—

  1. अपने पिता की पत्नी (माता तथा माता से भिन्न अन्य स्त्री, विमाता आदि), 2. माता की भगिनी (मौसी), 3. सासू मां, 4. मामी, 5. पिता की बहिन, बुआ, 6. चाचा की पत्नी या रखैल, 7. शिष्य की स्त्री, 8. बहिन, चाचा, मामा आदि की लड़की, 10. पुत्रवधू, 11. अपनी पुत्री, 12. आचार्य की पत्नी, 13 अपने गोत्र—दूर के चाचा, भाई आदि की बहिन, पुत्री, बहू आदि, 14. शरण में आयी हुई असहाय स्त्री, 15. रानी, 16. संन्यासिनी, 17. दायी—पालन करने वाली अथवा स्तनपान कराने वाली स्त्री, 18. उत्तमर्ण की पतिव्रता स्त्री, 19. अपने वर्ण से भिन्न वर्ण जाति की स्त्री तथा 20. भाई की पत्नी। पशुयोनावतिक्रामन् विनेयः स दमं शतम्। मध्यमं साहसं गोषु तदेवान्त्यावसायिषु ॥ 76 ॥ स्त्री पशुओं की योनि में लिंग-प्रवेश का दण्ड एक सौ पण है। गाय तथा चाण्डाल स्त्री से सम्भोग का मध्यम साहस दण्ड है। अगम्यागामिनश्चाति दण्डो राज्ञा प्रचोदितः। प्रायश्चित्तविधानं तु पापानां स्याद् विशोधनम् ॥ 77 ॥ अगम्या—सम्भोग के लिए वर्जित—विमाता, गुरुपत्नी तथा शिष्या आदि— से मैथुन करने वाला, जहां राजा द्वारा दण्डित होता है, वहां उसे अपनी शुद्धि के लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट प्रायश्चित्त भी करना होता है। इसके बिना वह जाति से बहिष्कृत माना जाता है। स्वैरिण्यब्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च या। गम्याः स्युरानुलोम्येन स्त्रियो न प्रतिलोमतः ॥ 78 ॥ अपने से निम्न अथवा अपने समान वर्ण की निम्नोक्त स्त्रियों से मैथुन करने नारदस्मृति / 213