नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
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वाले को कोई दोष नहीं होता। ऐसी स्त्रियों के अपने से ऊपर के वर्ण से सम्बन्धित होने पर उनसे सम्बन्ध योजना वर्जित होने से दण्डनीय अपराध है—
- स्वैरिणी—ब्राह्मणी से इतर वर्ण—क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, जाति की स्त्री।
- वेश्या—देह व्यापार से आजीविका चलाने वाली स्त्री।
- दासी—धन के व्यय से ख़रीदी गयी स्त्री तथा
- निष्कासिता—दुराचरण अथवा दुर्व्यवहार अथवा सम्बन्धों की विषमता के कारण घर से निकाली गयी महिला। आस्वेव तु भुजिष्यासु दोषः स्यात् परदारवत्। गम्या अपि हि नोपेया यत्ताः परपरिग्रहाः ॥ 79 ॥ अपने वर्ण से ऊपर के वर्ण की स्त्रियों—स्वैरिणी, वेश्या, दासी तथा निष्कासिता—के भोग्या होने पर भी निम्न वर्ण वालों को इनसे सम्भोग नहीं करना चाहिए; क्योंकि मूलतः वे अपने पति की सम्पत्ति हैं। अतः उनका उपभोग परदारमगन जैसा दण्डनीय अपराध है। अनुत्पन्नप्रजायास्तु पतिः प्रेयाद् यदि स्त्रियाः । नियुक्ता गुरुभिर्गच्छेद्देवरं पुत्र काम्यया ॥ 80 ॥ सन्तान को उत्पन्न किये बिना मृत पति की विधवा केवल सन्तान-प्राप्ति के लिए, परिवार के वृद्धजनों की अनुमति से, अपने देवर से सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। स च तां प्रतिपद्येत तथैव पुत्रजन्मतः। पुत्र जाते निवर्तेत संकरः स्यादतोऽन्यथा ॥ 81 ॥ देवर को भाभी से गर्भधारणपर्यन्त ही देह-सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए, अन्यथा उन दोनों के सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाली सन्तान वर्णसंकर कहलायेगी। टिप्पणी—वर्णसंकर का अर्थ भिन्न-भिन्न वर्ण के पुरुष और स्त्री के समागम से उत्पन्न होने वाली सन्तान है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य तथा क्षत्रिया के गर्भ से अथवा क्षत्रिय के वीर्य तथा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान वर्णसंकर कहलायेगी। अतः यदि भाभी के गर्भवती हो जाने के उपरान्त भी देवर उसके साथ सम्भोग में प्रवृत्त रहता है, तो वह अधम आचरण करता है और उत्पन्न सन्तान न पिता की और न ही देवर की कहला सकती है। अतः सन्तान के भविष्य के लिए स्त्री (भाभी) को आत्मसंयम अपनाने की बात कही गयी है। घृतेनाभ्यज्य गात्राणि तैलेनाविकृतेन वा। मुखान्मुखं परिहरन् गात्रैर्गात्राण्यसंस्पृशन् ॥ 82 ॥ भाभी से सम्भोग करने वाले देवर को सम्भोग से पूर्व अपने शरीर को घी तेल आदि से भली प्रकार चुपड़ लेना चाहिए। लिंग-प्रवेश-मैथुन आदि के समय 214 / नारदस्मृति