नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंघर से, अपितु ग्राम नगर की सीमा से भी बाहर निकाल देना चाहिए। अनर्थशीलां सततं तथैवाप्रियवादिनीम् । पूर्वाशिनीं च या भर्तुः क्षिप्रं निर्वासयेद् गृहात् ॥ 93 ॥ इसी प्रकार नित्य-प्रति कलह-क्लेश करने वाली, प्रतिदिन नये बखेड़े खड़े करके पड़ोसियों के सामने परिवारजनों को अपमानित करने वाली, पति तथा परिवारजनों को सदैव जली-कटी सुनाने वाली, अर्थात् कटुभाषिणी तथा पति के भोजन करने से पूर्व ही भोजन कर लेने वाली स्त्री को घर से निकाल देना चाहिए। वन्ध्यां स्त्रीजननीं निन्द्यां प्रतिकूलां च सर्वदा। कामतो नाभिनन्देत कुर्वन्नेवं स दोषभाक् ॥ 94 ॥ वन्ध्या, लड़कियों को ही जनने वाली, समाज में कलंकित तथा पति का अहित-चिन्तन करने वाली स्त्री की सहमति के बिना उससे सम्भोग करने वाला पुरुष दण्डनीय अपराधी होता है। अनुकूलामवाग्दुष्टां दक्षां साध्वीं प्रजावतीम् । त्यजन् भार्यामवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 95 ॥ राजा को निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न स्त्री का त्याग करने वाले पुरुष को यथोचित कठोर दण्ड देकर स्त्री को भार्या की मर्यादा पर पुनः स्थापित करना चाहिए, अर्थात् पुरुष को अपनी पत्नी का सम्मान देने के लिए बाध्य करना चाहिए। राज का यह कर्तव्य है कि वह पुरुष को साध्वी एवं निर्दोष स्त्री के साथ अन्याय करने की छूट कदापि न दे तथा मनमानी करने पर पति कहलाने वाले पुरुष को अनुशासन की शिक्षा दे-
- पति एवं परिवाजनों के सदैव अनुकूल रहने वाली, अर्थात् शालीनता से व्यवहार करने वाली।
- मधुर एवं शिष्ट भाषण करने वाली।
- गृहकार्यकुशल।
- साध्वी, अर्थात् पतिव्रता तथा
- पुत्रवती। अज्ञातदोषेणोढा या निर्दोषा नान्यमाश्रिता । बन्धुभिः साभियोक्तव्या निर्बन्धः स्वयमाश्रयेत् ॥ 96 ॥ विवाह से पूर्व पुरुष के किसी अज्ञात दोष का विवाह के उपरान्त पता चलने पर उस दोष को झेलने अथवा उससे समझौता करने को अप्रस्तुत स्त्री को दूसरे पुरुष का वरण करने के लिए उसके बन्धुओं के पास छोड़ देना चाहिए। बन्धुओं के अभाव में उस स्त्री को स्वयं अपने लिए किसी दूसरे पुरुष की खोज के लिए स्वतन्त्र कर देना चाहिए। 218 / नारदस्मृति