नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
घर से, अपितु ग्राम नगर की सीमा से भी बाहर निकाल देना चाहिए। अनर्थशीलां सततं तथैवाप्रियवादिनीम् । पूर्वाशिनीं च या भर्तुः क्षिप्रं निर्वासयेद् गृहात् ॥ 93 ॥ इसी प्रकार नित्य-प्रति कलह-क्लेश करने वाली, प्रतिदिन नये बखेड़े खड़े करके पड़ोसियों के सामने परिवारजनों को अपमानित करने वाली, पति तथा परिवारजनों को सदैव जली-कटी सुनाने वाली, अर्थात् कटुभाषिणी तथा पति के भोजन करने से पूर्व ही भोजन कर लेने वाली स्त्री को घर से निकाल देना चाहिए। वन्ध्यां स्त्रीजननीं निन्द्यां प्रतिकूलां च सर्वदा। कामतो नाभिनन्देत कुर्वन्नेवं स दोषभाक् ॥ 94 ॥ वन्ध्या, लड़कियों को ही जनने वाली, समाज में कलंकित तथा पति का अहित-चिन्तन करने वाली स्त्री की सहमति के बिना उससे सम्भोग करने वाला पुरुष दण्डनीय अपराधी होता है। अनुकूलामवाग्दुष्टां दक्षां साध्वीं प्रजावतीम् । त्यजन् भार्यामवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 95 ॥ राजा को निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न स्त्री का त्याग करने वाले पुरुष को यथोचित कठोर दण्ड देकर स्त्री को भार्या की मर्यादा पर पुनः स्थापित करना चाहिए, अर्थात् पुरुष को अपनी पत्नी का सम्मान देने के लिए बाध्य करना चाहिए। राज का यह कर्तव्य है कि वह पुरुष को साध्वी एवं निर्दोष स्त्री के साथ अन्याय करने की छूट कदापि न दे तथा मनमानी करने पर पति कहलाने वाले पुरुष को अनुशासन की शिक्षा दे-
- पति एवं परिवाजनों के सदैव अनुकूल रहने वाली, अर्थात् शालीनता से व्यवहार करने वाली।
- मधुर एवं शिष्ट भाषण करने वाली।
- गृहकार्यकुशल।
- साध्वी, अर्थात् पतिव्रता तथा
- पुत्रवती। अज्ञातदोषेणोढा या निर्दोषा नान्यमाश्रिता । बन्धुभिः साभियोक्तव्या निर्बन्धः स्वयमाश्रयेत् ॥ 96 ॥ विवाह से पूर्व पुरुष के किसी अज्ञात दोष का विवाह के उपरान्त पता चलने पर उस दोष को झेलने अथवा उससे समझौता करने को अप्रस्तुत स्त्री को दूसरे पुरुष का वरण करने के लिए उसके बन्धुओं के पास छोड़ देना चाहिए। बन्धुओं के अभाव में उस स्त्री को स्वयं अपने लिए किसी दूसरे पुरुष की खोज के लिए स्वतन्त्र कर देना चाहिए। 218 / नारदस्मृति
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ। पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥ 97 ॥ निम्नोक्त पांच स्थितियों में स्त्री को वर्तमान पति का परित्याग तथा दूसरे पुरुष के वरण का अधिकार है—
- पति का सन्तानोत्पादन में असमर्थ होना, अर्थात् उसके शुक्र में सन्तान उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का न होना।
- पति का असमय में परलोक सिधारना।
- पति द्वारा गृहत्याग कर विरक्त-संन्यासी बन जाना।
- पति का नपुंसक सिद्ध होना, अर्थात् उसका यौन भोग न कर पाना अथवा पत्नी को तृप्त-सन्तुष्ट न कर पाना तथा
- निन्दित कर्मों के कारण समाज द्वारा अपनी जाति से बहिष्कृत हो जाना। अष्टौ वर्षाण्युदीक्षेत ब्राह्मणी प्रोषितं पतिम्। अप्रसूता तु चत्वारि परतोऽन्यं समाश्रयेत्॥ 98 ॥ क्षत्रिया षट् समास्तिष्ठेदप्रसूता समात्रयम्। वैश्या प्रसूता चत्वारि द्वे वर्षेत्वितरा वसेत्॥ 99 ॥ पति के विदेश जाने पर उसकी कोई खोज-ख़बर न मिलने पर प्रसूता (सन्तानवती) ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या स्त्री को क्रमशः आठ, छह और चार वर्षों तक उसके लौटने की, सुध-ख़बर देने की तथा निस्सन्तान ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या को क्रमशः चार, तीन और दो वर्षों तक पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस अवधि तक कुछ भी पता न चलने पर स्त्री दूसरा विवाह करने को स्वतन्त्र है। न शूद्रायाः स्मृतः काल एष प्रोषितयोषिताम्। जीवति श्रूयमाणे तु स्यादेष द्विगुणो विधिः॥ 100 ॥ शूद्रा स्त्री के पति के विदेश जाने पर, उसके लौटने और प्रतीक्षा का कोई समय निर्धारित नहीं है। विदेश गये पति के जीवित होने का निश्चय होने पर वैश्या निर्धारित समय—निस्सन्तान वैश्या के लिए दो वर्ष तथा सन्तानवती वैश्या के लिए चार वर्ष—से दुगुने वर्ष, अर्थात् सन्तानवती शूद्रा को आठ वर्षों तक और सन्तानहीना को चार वर्षों तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अप्रवृत्तौ तु भूतानां सृष्टिरेषा प्रजापतेः। अतोऽन्यगमने स्त्रीणामेष दोषो न विद्यते॥ 101 सन्तान के न होने पर आधे समय तक विदेश गये पति की प्रतीक्षा करने के औचित्य का आधार—सन्तान के लिए ही विवाह का किया जाना—है। जब सन्तान ही नहीं है और विदेश गया पति अपने लौटने की खोज ख़बर ही नहीं देता, तो नारदस्मृति / 219
फिर सम्बन्ध कैसा ? इसी आधार पर स्त्रियों को निर्धारित वर्षों तक प्रतीक्षा के अनन्तर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ने में कोई दोष नहीं है। आनुलोम्येन वर्णानां यज्जन्म स विधिः स्मृतः । प्रातिलोम्येन यज्जन्म स ज्ञेयो वर्णसंकरः ॥ 102 ॥ अनुलोम से उत्पन्न सन्तान, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष द्वारा समान अथवा निम्न वर्ण की स्त्री से उत्पादित, उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य से ब्राह्मणी, परन्तु प्रतिलोम - निम्न वर्ण के पुरुष के वीर्य को धारण करने वाली उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न - सन्तान वर्णसंकर (पतित) कहलाती है। उदाहरणार्थ, क्षत्रिय पुरुष के वीर्य और ब्राह्मणी के उदर से उत्पन्न सन्तान अवैध कहलायेगी। अभिप्राय यह है कि भिन्न वर्ण जाति के स्त्री-पुरुषों की सन्तान के सम्बन्ध में महत्त्व वीर्य का है, क्षेत्र का नहीं। अनन्तरः स्मृतः पुत्रः एवं एकान्तरस्तथा । द्वयन्तरश्चानुलोम्येन तथैव प्रतिलोमतः ॥ 103 ॥ अनुलोम क्रम से ब्राह्मण के वीर्य से चारों वर्णों की स्त्रियों के उदर से उत्पन्न चारों पुत्र सवर्ण कहलाते हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय के तीन, वैश्य के दो और शूद्र का एक ही पुत्र सवर्ण होता है, इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से शूद्र के तीन पुत्र, वैश्य के दो पुत्र व क्षत्रिय का एक पुत्र असवर्ण होता है। अतः पारशवश्चैव निषादश्चानुलोमतः । अम्बष्ठो मागधश्चैव क्षत्ता च क्षत्रियात्मजः ॥ 104 ॥ अनुलोम क्रम से उच्च वर्ण (ब्राह्मण) द्वारा निम्न वर्ण की स्त्रियों - क्षत्रिया, वैश्या तथा शूद्रा-से उत्पन्न किये गये पुत्र क्रमशः उग्र, पाराशव तथा निषाद कहलाते हैं, अर्थात् ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न पुत्र 'उग्र' कहलाता है। ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय द्वारा वैश्या स्त्री से उत्पादित पुत्र 'पाराशव' कहलाता है तथा ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य द्वारा शूद्रा स्त्री से जना पुत्र 'निषाद' कहलाता है। इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से 'अम्बष्ठ,' 'मागध' और 'छत्ता' (क्षत्रियवर्ण) कहलाते हैं, अर्थात् शूद्र के वीर्य और वैश्या अथवा क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी स्त्री के उदर से उत्पन्न बालक 'अम्बष्ठ' कहलाता है, वैश्य के वीर्य और क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न बालक 'मागध' कहलाता है तथा क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पादित बालक 'छत्ता' कहलाता है। आनुलोम्येन तत्रैका द्वौ ज्ञेयौ प्रतिलोमतः । क्षत्राद्याः प्रतिलोमाः स्युरनुलोमास्त्विमे स्मृताः ॥ 105 ॥ प्राचीन दो व्यवस्थाओं - 1 उच्च वर्ण की स्त्री, उच्च अथवा समान वर्ग के अतिरिक्त किसी अन्य निम्न वर्ण की भोग्या बन ही नहीं सकती तथा 2. अपने से 220 / नारदस्मृति
एक वर्ण नीचे की स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना उचित होने—के आधार पर प्रत्येक वर्ण के पुरुष का अनुलोम से एक-एक पुत्र उत्पन्न होगा और प्रतिलोम से दो-दो पुत्र उत्पन्न होंगे। इस दृष्टि से छत्ता आदि को प्रतिलोम से उत्पन्न माना जायेगा। निम्न वर्ण के पुरुषों द्वारा उच्च वर्ण की स्त्रियों से उत्पादित सन्तान 'अनुलोमज' कहलाती है। ससंकरः श्वपाकाद्यास्तेषां त्रिःसप्त वै मताः । सवर्णो ब्राह्मणोपुत्रः क्षत्रियायामनन्तरः ॥ 106 ॥ संकर पुरुष के वीर्य और संकर स्त्री के उदर से जन्म लेने वाला बालक ‘श्वपाक' कहलाता है। इनकी तीन अथवा सात जातियां हैं। इसी प्रकार उग्र पुरुष द्वारा क्षत्ता से जनित बालक ‘श्वपाक' तथा वैदेहक द्वारा अम्बष्ठा स्त्री से जनित बालक 'सवर्ण' होता है, परन्तु ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से जनित बालक को सवर्ण बनाने के लिए उसका अभिषेक करना पड़ता है। अम्बष्ठोग्रौ तथा पुत्रावेवं क्षत्रियवैश्ययोः। एकान्तरस्तु चाम्बष्ठो वैश्यायां ब्राह्मणात् सुतः ॥ 107 ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय के वीर्य और वैश्या स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक ‘अम्बष्ठ' और वैश्य के वीर्य और शूद्रा स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक 'उग्र' कहलाता है। टिप्पणी—मनु आदि अन्य स्मृतिकारों का मत नारद से कुछ भिन्न है। उनके अनुसार—अनुलोम से, अर्थात् क्षत्रिय द्वारा वैश्या से उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ', वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न 'मागध' और शूद्र के वीर्य और क्षत्रिया के उदर से उत्पन्न 'क्षत्रा' अथवा 'क्षत्ता' कहलाते हैं। अम्बष्ठः आनुलोम्येन क्षत्रियस्य वैश्यायां जातः। मागधो वैश्यात् क्षत्रियायां जातः। क्षत्ता शूद्रात् क्षत्रियायां जातः । शूद्रायां क्षत्रियात्तद्वन्निषादो नाम जायते । शूद्रा पारशवं सूते ब्राह्मणाद्व्यन्तरं सुतम् ॥ 108 ॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्रा स्त्री से प्राप्त बालक 'निषाद' तथा ब्राह्मण द्वारा शूद्रा स्त्री से प्राप्त बालक 'पारशव' कहलाता है। शूद्रा के दोनों पुत्रों में भी यही अन्तर है, अर्थात् शूद्रा ने ब्राह्मण के वीर्य से गर्भधारण किया है, तो उत्पन्न पुत्र 'पारशव' कहलायेगा और यदि उसने क्षत्रिय के वीर्य से गर्भ धारण किया है, तो उत्पन्न होने वाला बालक 'निषाद' कहलायेगा। आनुलोम्येन वर्णानां पुत्रा होते प्रकीर्तिताः । सूतश्च मागधश्चैव सुतावायोगवस्तथा ॥ 109 ॥ इसी प्रकार अनुलोम सम्बन्ध, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष के वीर्य से और निम्न वर्ण की स्त्री के उदर से जन्म लेने वाले 'सूत,' 'मागध' तथा 'अयोगव' आदि कहलाते हैं। नारदस्मृति / 221
प्रतिलोम्येन वर्णानां क्षत्तृवैदेहकावपि। अनन्तरः स्मृतः सूतो ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सुतः ॥ 110 ॥ इसी सन्दर्भ में प्रतिलोम सम्बन्ध—निम्न वर्ण के पुरुष द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न—बालक 'क्षत्ता' और 'वैदेह' कहलाते हैं। क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के उदर से प्राप्त बालक 'अनन्तर' कहलाता है। मागधायोगवौ तद्वद् द्वौ पुत्रौ वैश्यशूद्रयोः । ब्राह्मण्यान्तरं वैश्यात् सूते वैदेहकं सुतम् ॥ 111 ॥ वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न बालक 'मागध' और शूद्र द्वारा वैश्या से उत्पन्न बालक 'आयोगव' कहलाता है। वैश्य द्वारा ब्राह्मणी से उत्पन्न बालक 'एकान्तर' होता है, उसका दूसरा नाम 'वैदेहक' भी है। क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् पुत्रमेकान्तरं तथा। द्वयन्तरः प्रातिलोम्येन पापिष्ठः संकरे सति ॥ 112 ॥ शूद्र के वीर्य को धारण करने वाली क्षत्रिया 'क्षत्ता' नामक एकान्तर पुत्र को जनती है। प्रतिलोम्य में संकर होने पर, अर्थात् उस क्षत्ता द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री को गर्भवती बनाने पर उत्पन्न बालक 'पापिष्ठ' कहलाता है। चाण्डालो जायते शूद्राद् ब्राह्मणी यत्र मुह्यति। तस्माद्राज्ञा विशेषेण स्त्रियो रक्ष्यास्तु संकरात् ॥ 113 ॥ अपनी मर्यादा की रक्षा न करने वाली, अर्थात् शूद्र से सम्भोग कराने वाली ब्राह्मणी 'चाण्डाल' को जन्म देती है। इस प्रकार उच्च वर्ण के पुरुषों और निम्न वर्ण की स्त्रियों अथवा निम्न वर्ण के पुरुषों और उच्च वर्ण की स्त्रियों के समागम से वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है, जो सामाजिक विकास के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है। अतः राजा को इस प्रकार के सम्बन्धों को निरुत्साहित करने का वातावरण तैयार करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का द्वादश प्रकरण समाप्त ॥ 222 / नारदस्मृति
- दाय-भाग विभागोऽर्थस्य पित्र्यस्य पुत्रैर्यत्र प्रकल्प्यते। दायभाग इति प्रोक्तं तद्विवादपदं बुधैः॥ 1॥ पुत्रों द्वारा पैतृक-सम्पत्ति का विभाजन 'दाय-भाग' कहलाता है। विद्वानों ने इसे विवादास्पद व्यवहार माना है। टिप्पणी— याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षरा टीकाकार के अनुसार— धन के मूल स्वामी के साथ रक्त सम्बन्ध के कारण स्वामी के धन पर सम्बन्धी के अधिकार के हो जाने का नाम 'दाय' है। इसके दो रूप-भेद हैं—अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध। दादा का पोते को तथा पिता का पुत्र को मिलने वाला धन अप्रतिबन्ध दाय है। इसके विपरीत चाचा तथा भाई आदि के पुत्र के रूप में, भावी स्वामी के न होने पर, दूसरों को मिलने वाला धन सप्रतिबन्ध है। विभाग का अर्थ है— अनेक स्वामियों का एक साथ बैठकर निर्धारित नियमों के आधार पर पैतृक धन की व्यवस्था का निर्णय लेना— "तत्र दायशब्देन यद्धनं स्वामिसम्बन्धादेव निमित्तादन्यस्य स्वं भवति तदुच्यते। स च द्विविधः अप्रतिबन्धः सप्रतिबन्धश्च। तत्र पुत्राणां पौत्राणां च पुत्रत्वेन पौत्रत्वेन च पितृधनं पितामहधनं च स्वं भवतीत्यप्रतिबन्धो दायः। पितृव्यभ्रातादीनां च पुत्राभावे स्वाम्यभावे च स्वं भवतीति सप्रतिबन्धो दायः। विभागो नाम द्रव्यसमुदाय विषयाणामनेकस्वाम्यानां तदेकदेशेषु व्यवस्थापनम्।" यह विभाजन कब व कैसे करना चाहिए—यह विवाद का विषय है। सामान्यतः मूल स्वामी के मर जाने पर, संन्यास ग्रहण कर लेने पर अथवा स्वामित्व का परित्याग किये जाने पर विभाजन का प्रश्न उत्पन्न होता है। इसी आधार पर दाय शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—स्वामी के उपरत होने पर, उसके द्रव्य का दूसरे के अधिकार में चले जाने का नाम दाय है—"स्वाम्युपरमे यत्र द्रव्ये स्वत्वं तत्र निरूढो दाय शब्दः।" पितर्यूर्ध्वं गते पुत्रा विभजेरन्धनं क्रमात्। मातुर्दुहितरोऽभावे दुहितॄणां तदन्वयः ॥ 2 ॥ पिता के परलोक सिधारने पर पुत्रों को क्रमानुसार बांटकर लेना चाहिए। नारदस्मृति / 223
माता के दिवंगत होने पर, उसके स्त्रीधन पर उसकी लड़कियों का और लड़कियों के न होने पर धेवतों-लड़कियों की सन्तान-का अधिकार होता है। टिप्पणी- यहां 'क्रमात्,' अर्थात् क्रमानुसार शब्द एक विशेष प्रयोजन लिये हुए है। स्मृतिकारों ने औरस, क्षेत्रज आदि बारह प्रकार के पुत्र माने हैं, जिसका अर्थ, पैतृक सम्पत्ति पर सर्वप्रथम अधिकार औरस का, उसके पश्चात् क्षेत्रज का और उसके पश्चात् अन्यान्यों का है, अर्थात् यहां क्रमशः चलना है। हां, दिवंगत पुरुष के इन बारह प्रकार के पुत्रों में, किसी एक के भी न होने पर, उसकी सम्पत्ति पर अन्यान्य सपिण्डी, सगोत्री आदि को अधिकार मिलता है, अन्यथा कदापि नहीं। मातुर्निवृत्ते रजसि दत्तासु भगिनीषु च। निवृत्ते वापि रमणे पितुर्युपरतस्पृहे ॥३॥ निम्नोक्त परिस्थितियों में पिता के जीवनकाल में उसकी इच्छा से (किसी दबाव में आकर किया अथवा कराया गया विभाजन अवैध हो जाता है।) पुत्र विभाजन कर सकते हैं- 1 माता की रजोनिवृत्ति हो जाना, अर्थात् अन्य सन्तान के उत्पन्न होने की किसी सम्भावना का समाप्त हो जाना। 2. सभी बहिनों (भाइयों का भी) का विवाहित हो जाना। 3. पिता का अपनी पत्नी के साथ सम्भोग से उपरत हो जाना तथा 4. पिता द्वारा किसी अन्य स्त्री की स्पृहा न करना, अर्थात् पुनर्विवाह करने की अथवा रखैल बनाने की इच्छा का न होना। इन परिस्थितियों में पुत्रों के द्वारा किसी आवश्यकता को देखते हुए पिता के जीवनकाल में, उसकी प्रसन्नता से, उसकी सम्पत्ति का विभाजन किया जा सकता है। पितैव वा स्वयं पुत्रान्विभजेद्वयसि स्थितः। ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन यथा वास्य मतिर्भवेत् ॥४॥ पुत्रों की किसी मांग, अनुरोध आदि के न होने पर पिता अपने जीवनकाल में अपनी इच्छा से अपनी सम्पत्ति का विभाजन करने को स्वतन्त्र है। वह चाहे, तो बड़े बेटे को कुछ अधिक भाग दे सकता है। सत्य तो यह है कि वह अपने पुत्रों को अपनी इच्छानुसार न्यूनाधिक देने को पूर्ण स्वतन्त्र है। विभृयाद्वेच्छतः सर्वान् ज्येष्ठो भ्राता यथा पिता। भ्राता शक्तः कनिष्ठो वा शक्त्यपेक्षाः कुले श्रियः ॥५॥ पिता के परलोक सिधारने पर पैतृक सम्पत्ति का भाइयों में विभाजन अनिवार्य नहीं है। ज्येष्ठ भ्राता भी पिता के समान परिवार का मुखिया बनकर, परिवार के सभी सदस्यों के भरण पोषण का दायित्व संभाल सकता है। ज्येष्ठ भ्राता के स्थान 224 / नारदस्मृति
पर इस दायित्व को छोटा भाई भी ले सकता है; क्योंकि दायित्व का निर्वहण आयु की अपेक्षा सामर्थ्य पर निर्भर है। समर्थ व्यक्ति ही परिवार में सुख-समृद्धि ला सकता है। अतः कोई भी समर्थ भाई—ज्येष्ठ, मध्यम अथवा कनिष्ठ—परिवार को संयुक्त बनाये रख सकता है। सभी भाइयों के साथ रहने को सहमत होने पर तथा एक-दूसरे से सन्तुष्ट होने पर विभाजन की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती। शौर्यभार्याधने चोभे यच्च विद्याधनं भवेत्। त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादी यश्च पैतृकः ॥ 6 ॥ निम्नोक्त चार प्रकार के धन अविभाज्य हैं—एक भाई से दूसरे भाई इस प्रकार के धन के विभाजन की मांग नहीं कर सकते—
- शौर्य से अर्जित धन—मल्लयुद्ध, धनुर्विद्या अथवा अन्य किसी प्रकार के साहसपूर्ण कार्य से पुरस्कार, पारितोषिक, उपहार तथा वृत्ति आदि के रूप में प्राप्त धन। आजकल की भाषा में क्रिकेट, हॉकी तथा चैस (शतरंज) आदि खेलों में विशिष्टता दिखाने पर मिलने वाला विदेशी धन तथा अर्जुन पुरस्कार आदि के साथ जुड़ा धन।
- भार्याधन—स्त्री द्वारा अपने मायके से लायी गयी चल-अचल सम्पत्ति तथा उसके द्वारा निजी व्यापार अथवा नौकरी आदि से अर्जित धन। मनु, याज्ञवल्क्य आदि के स्मृति-ग्रन्थों में निम्नोक्त छह प्रकार के धन को स्त्रीधन कहा गया है— (i) विवाह में दहेज के रूप में माता पिता से प्राप्त धन। (ii) विवाह के उपरान्त विदाई के समय स्त्री के जाति-बन्धुओं द्वारा उसे दिया गया धन। (iii) विवाह के उपरान्त घर आने पर वर के परिवारजनों द्वारा अपनी नववधू को अपनी प्रसन्नता से दिया गया धन। (iv) माता-पिता, भाइयों और जाति बन्धुओं से प्राप्त होने वाला धन। (v) विवाह के उपरान्त समय समय पर प्रसन्न हुए पति से प्राप्त धन तथा (vi) विवाह के उपरान्त स्त्री के भाई, बहिन आदि के विवाह, गृहप्रवेश आदि विशिष्ट मांगलिक अवसरों पर माता-पिता द्वारा गुप्त अथवा प्रकट रूप में दिया गया धन।
- विद्या-धन.—विद्या-प्राप्ति के उपरान्त सेवा-कार्य, पुस्तक लेखन अथवा निजी व्यवसाय—प्राइवेट प्रैक्टिस, डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, ज्योतिषी तथा आर्किटेक्ट आदि से प्राप्त धन तथा
- पिता द्वारा अपनी प्रसन्नता से अपनी सम्पत्ति में से दिया गया भाग। नारदस्मृति / 225
मात्रा च स्वधनं दत्तं यस्मै स्यात् प्रीतिपूर्वकम्। तस्याप्येष विधिर्दृष्टो मातापि हि यथा पिता॥ 7 ॥ उपर्युक्त चार प्रकार के धन के समान स्त्रीधन के रूप में प्राप्त एवं सुरक्षित अपनी सम्पत्ति को माता अपनी प्रसन्नता से अपने किसी भी बेटे को सौंपने को स्वतन्त्र है। दूसरे भाई माता द्वारा प्रदत्त उस धन के विभाजन की मांग भी नहीं कर सकते; क्योंकि पिता के समान ही माता को भी अपनी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी को चुनने का पूर्ण अधिकार है। मध्यग्न्यध्यावहनिकं भर्तृदायस्तथैव च। भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम्॥ 8 ॥ देवर्षि नारद ने निम्नोक्त छह प्रकार का स्त्रीधन अविभाज्य बताया है—
- विवाह-वेदी पर संकल्पपूर्वक माता-पिता द्वारा प्रदत्त।
- ससुराल में आने पर नव-वधू को प्राप्त धन।
- अपने पति से प्राप्त धन तथा 4-6. भ्राता, माता और पिता द्वारा प्राप्त धन। स्त्रीधनं तदपत्यानां भर्तृगाम्यप्रजासु तु। ब्राह्मादिषु चतुष्ष्वाहुः पितृगामीतरेषु च॥ 9 ॥ स्त्रीधन पर सर्वप्रथम उसकी सन्तान का अधिकार है। सन्तान के अभाव में चार प्रकार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव—के विवाहों में से किसी एक के होने पर निस्सन्तान स्त्री के स्त्रीधन पर उसके पति का अधिकार है। सन्तान के न होने पर तथा विवाह के भी उपर्युक्त चार प्रकारों में से किसी एक के न होने पर स्त्रीधन पर उसके मायके वालों का अधिकार होता है। कुटुम्बं विभृयाद् भ्रातुर्यो विद्यामधिगच्छतः। भागं विद्याधनात्तस्मात् स लभेताश्रुतोऽपि सन्॥ 10 ॥ यदि किसी भाई ने पैतृक धन की सहायता के बिना अपनी प्रतिभा और योग्यता से धन अर्जित किया है और संयोग से उसका भाई अविद्वान् रह गया है, तो विद्वान् भाई अपने अविद्वान् भाई को अपने विद्या से अर्जित सम्पत्ति में से कुछ देने अथवा न देने को पूर्ण स्वतन्त्र है। वैद्योऽवैद्याय नाकामो दद्यादंशं स्वतो धनात्। पित्र्यं द्रव्यं समाश्रित्य न चेत्तेन तदाहृतम्॥ 11 ॥ इसके विपरीत यदि विद्या-प्राप्ति के लिए गये भाई के परिवार का भरण पोषण अथवा विद्या प्राप्ति-काल में अपने भाई के भरण पोषण का दायित्व निभाने वाले भाई के अविद्वान् रह जाने पर भी विद्वान् भाई द्वारा विद्या से अर्जित धन में भाग पाने का उसे अधिकार है। 226 / नारदस्मृति
द्वावंशौ प्रतिपद्येत विभजन्नात्मनः पिता। समांशभागिनी माता पुत्राणां स्यान्मृते पतौ॥ 12॥ अपने जीवनकाल में, अपनी सम्पत्ति का, अपने पुत्रों में विभाजन करने वाला अपने लिए दो भाग सुरक्षित रख सकता है। पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को पति की सम्पत्ति में से पुत्रों के बराबर एक भाग मिलता है। ज्येष्ठायांशोऽधिको देयः कनिष्ठायावरः स्मृतः। समांशभाजः शेषाः स्युरदत्ता भगिनी तथा॥ 13॥ विभाजन की एक व्यवस्था यह भी है कि ज्येष्ठ भाई को ज्येष्ठ भाग, मध्यम भाई को मध्यम भाग तथा शेष भाइयों को समान भाग दिया जाता है। इस प्रकार के विभाजन में अविवाहित भगिनी का विवाह सम्पन्न करने के लिए एक भाग अलग रख दिया जाता है। क्षेत्रजेष्वपि पुत्रेषु तद्वज्जातेषु धर्मतः। वर्णावरेष्वंशहानिरूढाजातेष्वनुक्रमात् ॥ 14॥ धर्मपूर्वक विभिन्न वर्णों की एकाधिक स्त्रियों से क्षेत्रज आदि पुत्रों के होने पर वर्णों की ऊंच-नीच के अनुसार अंश-हानि होती है। उदाहरणार्थ, एक ब्राह्मण चारों वर्णों की चार स्त्रियों से धर्मपूर्वक विवाह कर सकता है और चारों से एक- एक पुत्र है, तो इस स्थिति में पुरुष को अपनी सम्पत्ति के दस भाग करके चार भाग ब्राह्मणी के पुत्र को, तीन भाग क्षत्रिया के पुत्र को, दो भाग वैश्या के पुत्र को और एक भाग शूद्रा के पुत्र को देना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक ही वर्ण की एकाधिक स्त्रियों के होने पर और सभी स्त्रियों के पुत्रवती होने पर सम्पत्ति का विभाजन विवाह क्रम से करना चाहिए। उदाहरणार्थ, एक राजपुरुष ने तीन क्षत्रिया स्त्रियों से विवाह किया है और तीनों के दो-दो पुत्र हैं, तो उसे अपनी सम्पत्ति के नौ भाग करके सर्वप्रथम विवाहिता को चार भाग, दूसरे स्थान पर विवाहिता को तीन भाग और सबसे अन्त में विवाहिता को दो भाग देने चाहिए। अब उन स्त्रियों के पुत्रों को आपस में उस धन के बराबर भाग लेने का अधिकार है। इस प्रकार बहुविवाह की स्थिति में विभाजन का एक आधार वर्ण है और दूसरा आधार वरीयता है। पित्रैव तु विभक्ता ये हीनाधिकसमैर्धनैः। तेषां स एव धर्मः स्यात् सर्वस्य हि पिता प्रभुः॥ 15॥ पुत्रों को अपने पिता द्वारा प्रदत्त अधिक अथवा न्यून अथवा समान धन को अन्तिम रूप से मान्य करके ग्रहण करना चाहिए। उस पर आपत्ति अथवा आक्षेप नहीं करना चाहिए; क्योंकि पिता को यह सब करने का पूरा-पूरा अधिकार है। व्याधितः कुपितश्चैव विषयासक्तमानसः। अन्यथाशास्त्रकारी च न विभागे पिता प्रभुः॥ 16॥ नारदस्मृति / 227
निम्नोक्त विकारों से ग्रस्त पिता द्वारा अपनी सम्पत्ति का किया गया विभाजन अन्तिम एवं मान्य नहीं होता - 1. रोग-ग्रस्त, 2. स्वभाव से क्रोधी और चिड़चिड़ा, 3. विषयी - मदिरासेवन, द्यूत-क्रीड़ा तथा वेश्यागमन आदि विषयों में आसक्त अथवा किसी अन्य स्त्री में अनुरक्त तथा 4. शास्त्र मर्यादा का पालन न करने वाला। कानीनश्च सहोढश्च गूढायां यश्च जायते। तेषां वोढा पिता श्रेयस्ते च भागहराः स्मृताः ॥ 17 ॥ निम्नोक्त तीन प्रकार के पुत्रों वाली स्त्री, जिस भी पुरुष से विवाह करती है, वे बालक उसकी सम्पत्ति में से अपना भाग पाने के अधिकारी होते हैं, 1. कानीन- अविवाहिता कन्या द्वारा जना गया, 2. सहोढ़ - पूर्व से गर्भवती स्त्री का विवाह हो जाने के उपरान्त उत्पन्न तथा 3. गूढ़ज - गुप्त रूप से जना। टिप्पणी - 'विवाह रत्नाकर' ग्रन्थ के लेखक तथा मनु, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि स्मृतिकारों के अनुसार-नाना के पुत्रहीन होने पर 'कानीन' और 'सहोढ़' पुत्रों पर उस (नाना) का ही अधिकार होता है। नाना के पुत्रवान् होने पर उन पुत्रों पर कन्या से विवाह करने वाले का अधिकार होता है। दोनों-नाना (कन्या के पिता) और कन्या से विवाह करने वाले के निपूता होने पर उन दोनों प्रकार के पुत्रों पर दोनों का समान अधिकार है- "अत्रापुत्रो यदि मातामहस्तदा तस्य पुत्रः कानीनः सहोढश्च । सपुत्र- श्चेत्तदा वोढुः उभयोर्पुत्रत्वे चोभयोरिति पारिजातः ।" किन्हीं स्मृतिकारों ने वाग्दत्ता, परन्तु अविवाहिता कन्या के गर्भवती हो जाने और विवाह के उपरान्त जन्म दिये जाने वाले पुत्र को कानीन माना है। दोनों में एक अन्य अन्तर यह माना है कि कानीन के पिता का नाम ज्ञात नहीं होता और सहोढ़ के पिता का नाम ज्ञात होता है। अभिप्राय यह है कि वह अपने पिता - गर्भवती स्त्री से विवाह करने वाले-का ही पुत्र होता है। दोनों अपने पर संयम न रख पाने के कारण विवाह से पूर्व रति-भोग में प्रवृत्त हो जाते हैं। कन्या गर्भवती हो जाती है और पुरुष इस गर्भ को अपना ही रक्त जानकर सगर्भा से विवाह कर लेता है। अज्ञातपितृको यश्च कानीनोऽनूढमातृकः । मातामहाय दद्यात् स पिण्डं रिक्थं हरेत च ॥ 18 ॥ यदि कानीन पुत्र को जनने वाली कन्या का विवाह नहीं होता और उसका पिता भी उसे ग्रहण करने को प्रस्तुत नहीं होता, अर्थात् वह अपने को प्रकाश में नहीं लाता, तो ऐसा पुत्र नाना का ही पुत्र होता है, वह नाना का ही पिण्डदान करता है और उसकी सम्पत्ति से ही अपना भाग प्राप्त करता है। जाता ये त्वनियुक्तायामेकेन बहुभिस्तथा । आरिक्थभाजः सर्वे स्युर्बीजिनामेव ते सुताः ॥ 19 ॥ 228 / नारदस्मृति
सन्तान के उत्पन्न करने में असमर्थ पति द्वारा अनियुक्त (अनुमति प्राप्त किये बिना) किसी एक अथवा अनेक पुरुषों के वीर्य को धारण करने वाली स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को माता के पति की सम्पत्ति पाने का कोई अधिकार नहीं। वस्तुतः वे अपने पिता के पुत्र न होकर, अपनी मां को गर्भवती बनाने वालों के ही पुत्र होते हैं। दद्युस्ते बीजिनो पिण्डं माता चेच्छुल्कतोहृता। अशुल्कोपगतायां तु पिण्डदा वोढुरेव ते॥ 20॥ शुल्क लेकर गर्भवती बनी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, स्त्री के पति के पुत्र कहलाते हैं। बिना शुल्क लिये गर्भवती बनायी गयी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, अपने जनक के पुत्र होते हैं, माता के पति की सम्पत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं होता। पितृद्विट् पतितः षण्ढो यश्च स्यादौपपातिकः। औरसा अपि नैतेंऽशं लभेरन् क्षेत्रजाः कुतः॥ 21॥ शुल्क लेकर पुत्रोत्पादन के लिए किसी पुरुष की अंकशायिनी बनने वाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को, अपने पिता (माता के पिता) को पिण्ड देने का और उसकी सम्पत्ति में से भाग पाने का अधिकार होता है। बिना शुल्क लिये पर- पुरुष से जने पुत्रों का अपने जनकों को ही पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति से अपना भाग पाने का अधिकार होता है। माता के पति से उनका किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता। दीर्घतीव्रामयग्रस्ता जडोन्मत्तान्धपङ्गवः। भर्तव्याः स्युः कुले चैते तत्पुत्रास्त्वंशभागिनः ॥ 22 ॥ परिवार के निम्नोक्त व असामान्य स्थिति के सदस्यों का पालन पोषण करना चाहिए और उनकी सामान्य स्थिति के पुत्रों को सम्पत्ति में से यथोचित भाग देना चाहिए-
- दीर्घकालव्यापी तथा तीव्र कष्ट देने वाले किसी रोग-राजयक्ष्मा, उदरशूल, कैंसर, हृदयरोग, पक्षाघात तथा गुर्दे का क्षरण आदि से आक्रान्त।
- जड़-अशिक्षित अथवा मन्दबुद्धि।
- उन्मत्त, मस्तिष्क विकार से ग्रस्त तथा
- विकलांग-नेत्रविहीन अथवा पंगु अथवा हाथों से काम न कर पाने वाले। द्विरामुष्यायणा दद्युर्द्वाभ्यां पिण्डोदके पृथक्। रिक्थादर्धं समादद्युर्बीजिक्षेत्रिकयोस्तथा ॥ 23 ॥ दोनों-वीर्यदान करने वाले और क्षेत्र के स्वामी-के द्वारा अपनाये गये पुत्र को दोनों-जनक और माता के पति के-पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति को नारदस्मृति / 229
पाने का अधिकार है। उनके यदि अन्य पुत्र भी हों, तो ऐसे पुत्र को अपना भाग ही पाने का अधिकार होता है। संसृष्टानां तु यो भागस्तेषामेव स इष्यते। अनपत्योऽशभाग्योऽपि निर्बीजेष्वितरानियात् ॥ २४ ॥ विभक्त होने के उपरान्त पुनः संयुक्त हुए भाइयों में से किसी एक भाई के पुत्रहीन होने पर, उसके भाग पर उसकी पत्नी का अधिकार होता है। पत्नी के भी मरने पर, लड़की-दामाद का उस सम्पत्ति पर अधिकार होता है, परन्तु मृत भाई के निस्सन्तान और पत्नी के भी मर जाने पर, उसके भाग की सम्पत्ति पर सभी भाइयों का समान अधिकार होता है। भ्रातृणामप्रजाः प्रेयात्कश्चिच्चेत् प्रव्रजेत् वा। विभजेरन्धनं तस्य शेषास्तु स्त्रीधनं विना ॥ २५ ॥ सन्तान अथवा पुत्रहीन भाई के मर जाने पर अथवा उसके संन्यासी हो जाने पर उसके स्त्रीधन को छोड़कर शेष भाग को सभी भाइयों को बराबर बांट लेना चाहिए। भरणं चास्य कुर्वीरन् स्त्रीणामाजीवितक्षयात् । रक्षन्ति शय्यां भर्तुश्चेदाच्छिन्द्युरितरासु च ॥ २६ ॥ मृत भाई की साध्वी एवं आचारपरायण पत्नी का जीवनपर्यन्त भरण-पोषण करना, उसका भाग पाने वाले भाइयों का नैतिक एवं वैधिक (कानूनी) दायित्व है। हां, स्त्री के कुलटा होने पर तो उसके पास के धन को भी छीन लेना चाहिए तथा उसे घर से बाहर निकाल देना चाहिए। या तस्य दुहिता तस्याः पित्र्यँऽशो भरणे मतः । वासंस्कारं भजेरंस्तां परतो विभृयात् पतिः ॥ २७ ॥ मृत भाई (अथवा विधवा भाभी) की लड़की आदि के भरण-पोषण तथा विवाह आदि संस्कार पर होने वाला व्यय, पैतृक-सम्पत्ति में उसके भाग से पृथक्- सुरक्षित रखना चाहिए। विवाह से पूर्व भतीजी की रक्षा और उसके भरण-पोषण का दायित्व उसके चाचाओं पर होता है। विवाह के उपरान्त इस दायित्व को उसका पति ही वहन करता है। मृते भर्तर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रभुः स्त्रियाः । विनियोगात्मरक्षासु भरणे च स ईश्वरः ॥ २८ ॥ पुत्रहीना स्त्री के विधवा हो जाने पर पति के परिवार वाले-श्वसुर, ज्येष्ठ और देवर आदि-ही उसके स्वामी होते हैं। उसके भरण पोषण एवं उसकी सुरक्षा का दायित्व निभाने वालों को यह भी अधिकार है कि वह उनकी अनुमति के बिना लेन-देन से सम्बन्धित कोई भी व्यापार आदि न करे; क्योंकि हानि होने पर भुगतान का भार भी उन पर ही पड़ता है। 230 / नारदस्मृति
परिक्षीणे पतिकुले निर्मनुष्ये निराश्रये। तत्सपिण्डेषु वाऽसत्सु पितृपक्षः प्रभुः स्त्रियाः ॥ २९॥ ससुराल पक्ष के आत्मीय बन्धु-बान्धवों और सपिण्डियों-पति के पिता, सहोदर भाई, चाचा, चाचा के पुत्र, पति के पिता के दादा अथवा परदादा के भाई अथवा उन भाइयों के पुत्र-पौत्र (सपिण्डी) -के न रहने से, विधवा स्त्री के सर्वथा आश्रयहीन हो जाने पर उसका मायका ही आश्रयस्थल होता है। अभिप्राय यह है कि पतिगृह में अभाव की स्थिति में ही पितृगृह की ओर देखना चाहिए। टिप्पणी-'स्मृतिचन्द्रिकाकार' के अनुसार पुत्रहीना विधवा स्त्री को ससुराल और मायके में आश्रय उपलब्ध न होने पर राजा (प्रशासन) को उसकी (ऐसी स्त्रियों की) रक्षा का दायित्व संभालना चाहिए। उसे दर-दर की ठोकरें खाने अथवा अवैध कार्यों में लिप्त होने की खुली छूट नहीं दे देनी चाहिए। राजा को पथभ्रष्ट होने वाली स्त्रियों पर नियन्त्रण भी रखना चाहिए- पक्षद्वयावसाने तु राजा भर्त्ता स्मृतः स्त्रियः। स तस्याः भरणं कुर्यान्निगृह्णीयात्पथश्च्युताम्॥ स्वातन्त्र्याद्धि प्रणश्यन्ति कुले जाता अपि स्त्रियः। अस्वातन्त्र्यमतस्तासां प्रजापतिरकल्पयत् ॥ ३० ॥ उच्च कुल में उत्पन्न और सुशिक्षित स्त्रियां भी स्वतन्त्र कर दिये जाने पर उच्छृंखल और पथभ्रष्ट हो जाती हैं। यही कारण है कि प्रजापति ब्रह्मा ने स्त्रियों को स्वतन्त्रता न देने का विधान किया है। पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रास्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३१ ॥ स्त्री को बचपन में पिता के, युवती होने पर पति के और वृद्धा होने पर पुत्र के नियन्त्रण में रहना चाहिए। उसे किसी भी आयु में और किसी भी स्थिति में स्वतन्त्र रहने का कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि स्वतन्त्रता स्त्री को पतन के गर्त की ओर ले जाती है। यच्छिष्टं पितृदायेभ्यो दत्त्वर्णं पैतृकं च यत्। भ्रातृभिस्तद्विभक्तव्यमनृणी न स्याद्यथा पिता ॥ ३२ ॥ भाइयों को पैतृक सम्पत्ति का आपस में विभाजन करने से पूर्व पिता द्वारा किसी से लिए ऋण का भुगतान करके पिता को उऋण बनाना चाहिए। येषां तु न कृतः पित्रा संस्कारविधयः क्रमात्। कर्तव्या भ्रातृभिस्तेषां पैतृकादेव ते धनात् ॥ ३३ ॥ पैतृक सम्पत्ति के विभाजन से पूर्व असंस्कृत भाइयों के-यज्ञोपवीत संस्कार के उपरान्त-विद्याध्ययन आदि पर होने वाले धन के व्यय आदि की व्यवस्था नारदस्मृति / 231
करनी चाहिए, अर्थात् इस सम्बन्ध में अपेक्षित धन को अलग रखकर ही बंटवारा करना चाहिए। अविद्यमाने पित्र्यर्थे स्वांशादुद्धृत्य वा पुनः। अवश्यकार्याः संस्कारा भ्रातृणां पूर्वसंस्कृतैः ॥ ३४ ॥ पैतृक सम्पत्ति न होने पर पिता के जीवनकाल में संस्कृत-विद्या प्राप्त- भाइयों को अपने ही साधनों से असंस्कृत भाइयों को संस्कृत करने-शिक्षा-दीक्षा दिलाने-की व्यवस्था करनी चाहिए। कुटुम्बार्थेषु यश्चोक्तस्तत्कार्यं कुरुते च यः। भ्रातृभिर्भरणीयोऽसौ ग्रासाच्छादनवाहनैः ॥ ३५ ॥ अपने परिवार के यश, अभ्युदय तथा कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले भाई के वृत्तिहीन होने पर, उसके दूसरे भाइयों को उसके तथा उसके परिवारजनों के भरण-पोषण की तथा वाहन आदि जुटाने की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। यह उनका कर्तव्य-कर्म बनता है। विभागधर्मसन्देहे दायादानां विनिर्णयः। ज्ञातिभिर्भागलेख्यैश्च पृथक्कार्यप्रवर्तनात् ॥ ३६ ॥ दाय-भाग में किसी प्रकार के सन्देह अथवा पक्षपात की आशंका के उत्पन्न हो जाने पर, आपसी विवाद को निपटाने-सुलझाने के लिए जाति-बन्धुओं को मध्यस्थ बनाना चाहिए अथवा लिखित दस्तावेजों के साक्ष्य को आधार बनाना चाहिए। भ्रातॄणामविभक्तानामेको धर्मः प्रवर्त्तते। विभागे सति धर्मो हि तेषां भवेत् पृथक् पृथक् ॥ ३७ ॥ अविभक्त, अर्थात् संयुक्त परिवार के रूप में रहने वाले भाइयों का एक ही धर्म है, अर्थात् परिवार की मर्यादा एवं प्रतिष्ठा की रक्षा करना सभी भाइयों का समान दायित्व है। एक के द्वारा किये गये किसी कर्म का परिणाम सभी सदस्यों को समान रूप से भुगताने पड़ता है। हां, विभाजन के उपरान्त सभी अपने-अपने किये के उत्तरदायी होते हैं। सबका धर्म पृथक्-पृथक् हो जाता है। दानग्रहणपश्वन्नगृहक्षेत्रपरिग्रहाः । विभक्तानां पृथग् ज्ञेयाः पाकधर्मागमव्ययाः ॥ ३८ ॥ भाइयों के विभक्त हो जाने के उपरान्त लेन देन, पशु, धन, अन्न, गृह, क्षेत्र, जमापूंजी, खान पान तथा आय-व्यय आदि सभी कुछ अलग-अलग और अपना- अपना होता है। एक का लाभ हानि उसी एक का होता है, दूसरे का नहीं। साक्षित्वं प्रातिभाव्यं च दानं ग्रहणमेव च। विभक्ता भ्रातरः कुर्युर्नाविभक्ताः परस्परम् ॥ ३९ ॥ 232 / नारदस्मृति
बंटवारा हो जाने के उपरान्त, अलग अलग रहने वाले भाई एक-दूसरे के लेन-देन के साक्षी, प्रतिभू (ज़ामिन--लेने वाले द्वारा समय पर भुगतान न करने पर मैं उसे विवश करूंगा, अन्यथा उसके स्थान पर स्वयं भुगतान करूंगा-ऐसी प्रतिज्ञा ज़मानत कहलाती है और ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला ज़ामिन कहलाता है !) लेने वाले और देने वाले बन सकते हैं, परन्तु संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में रहने वाले भाई ऐसा नहीं कर सकते। वे न तो एक दूसरे से लेन देन कर सकते हैं और न ही लेन-देन के गवाह अथवा ज़ामिन बन सकते हैं; क्योंकि वे दो न होकर एक ही हैं। विभक्त होने पर वे एक से दो बन जाते हैं। येषामेताः क्रिया लोके प्रवर्तन्ते स्वरिक्थिनाम्। विभक्ता भ्रातरस्ते तु विज्ञेया इति निश्चयः ॥ 40 ॥ एक-दूसरे से ऋण का लेन देन करने वाले तथा एक-दूसरे के साक्षी और ज़ामिन बनने वाले भाइयों को निश्चित रूप से विभक्त हो गया समझना चाहिए। वसेयुर्ये दशाब्दानि पृथग् धर्माः पृथक् क्रियाः। विभक्ता भ्रातरस्ते तु विज्ञेया इति निश्चयः ॥ 41 ॥ दस वर्षों से अलग रह रहे, अलग से व्यापार-धन्धा कर रहे तथा अलग से अपने-अपने धर्म कर्म का निर्वहण कर रहे भाइयों को निश्चित रूप से विभक्त हो गया ही समझना चाहिए। यद्येकजाता बहवः पृथग्धर्माः पृथक् क्रियाः। पृथक्कर्मगुणोपेता न ते कृत्येषु सम्मताः ॥ 42 ॥ स्वान्भागान्यदि दद्युस्ते विक्रीणीरनथापि वा। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य तु ॥ 43 ॥ एक ही माता-पिता से उत्पन्न भाई अपने गुणों और रुचियों के कारण भिन्न- भिन्न व्यवसाय (कोई नौकरी, कोई कृषि, कोई व्यापार और कोई उद्योग आदि) अपनाते हैं, अर्थात् एक साथ मिलकर एक ही कार्य-व्यापार को अपनाने को सहमत नहीं होते, तो पैतृक सम्पत्ति में से उनका भाग उन्हें दे देना चाहिए, भले ही वे अपने भाग में प्राप्त सम्पत्ति को दान में दे दें, बेच दें, गिरवी रख दें अथवा भाड़ में झोंक दें--इस बात की चिन्ता किसी को करनी ही नहीं चाहिए। सबको इस तथ्य को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि भाग लेने वाला अपनी सम्पत्ति का स्वामी है और उसे अपनी सम्पत्ति को अपनी इच्छानुसार ख़र्च करने का पूर्ण अधिकार है। अतः किसी सोच विचार में पड़े बिना, सभी भाइयों को बैठकर अपना-अपना भाग संभाल लेना चाहिए। ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम्। संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥ 44 ॥ नारदस्मृति / 233
पिता के जीवनकाल में सम्पत्ति के विभाजन के उपरान्त उत्पन्न होने वाले बालक को विभक्त हो गये भाइयों से कुछ मांगने का कोई अधिकार नहीं। उसे तो केवल पिता के भाग पर अथवा पिता के साथ रह रहे भाइयों के साथ विभाजन का अधिकार है। औरसः क्षेत्रजश्चैव पुत्रिकापुत्र एव च। कानीनश्च सहोढश्च गूढोत्पन्नस्तथैव च ॥ 45 ॥ पौनर्भवोऽपविद्धश्च लब्धः क्रीतः कृतकस्तथा। स्वयं चोपगतः पुत्रा द्वादशैष उदाहृताः ॥ 46 ॥ निम्नोक्त बारह प्रकार के पुत्र होते हैं—1. औरस, 2. क्षेत्रज, 3. पुत्रिका-पुत्र, 4. कानीन, 5. सहोढ, 6. गूढोत्पन्न, 7. पौनर्भव, 8. अपविद्ध, 9. लब्ध, 10. क्रीत, 11. कृतक तथा 12. स्वयमागत। एषां षड् बन्धुदायादाः षड्दायादबान्धवाः। पूर्वः पूर्वः स्मृतः श्रेयाञ्जघन्यो यो य उत्तरः ॥ 47 ॥ उपर्युक्त बारह प्रकार के पुत्रों में प्रथम छह—औरस, क्षेत्रज, पुत्रिका-पुत्र, कानीन, सहोढ़ और गूढ़ोत्पन्न—पैतृक सम्पत्ति में दाय-भाग पाने के अधिकारी हैं। इसके विपरीत परवर्ती छह—पौनर्भव, अपविद्ध, लब्ध, क्रीत, कृतक तथा स्वयमागत—पैतृक दाय को पाने के अधिकारी नहीं हैं। इसके अतिरिक्त बारह में पूर्व-पूर्व, अर्थात् स्वयमागत से कृतक, उससे क्रीत, उसकी अपेक्षा लब्ध, उससे अपविद्ध, उससे पौनर्भव, उससे गूढ़ोत्पन्न, उससे सहोढ़, उससे कानीन, उससे पुत्रिका-पुत्र, उससे क्षेत्रज और उससे भी औरस श्रेष्ठ हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तरोत्तर—औरस से क्षेत्रज व उससे पुत्रिका-पुत्र आदि जघन्य हैं। छिन्नभागे गृहक्षेत्रे सन्देहो यत्र जायते। लेख्येन भोगविद्भिर्वा साक्षिभिर्वा समाहरेत् ॥ 48 ॥ भाइयों में से किसी के भाग के काटे जाने पर अथवा घर और क्षेत्रादि के अधिकार आदि के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न हो जाने पर जानकार जाति-बन्धुओं के साक्ष्य से तथा उपलब्ध लिखित प्रमाणों से तथ्य को सुनिश्चित करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि यदि पुत्रिका-पुत्र को कानीन मानकर उसे अधिकार से वञ्चित कर दिया जाता है, तो सम्बद्ध बालक को अपनी स्थिति—वह पुत्रिका-पुत्र है, कानीन नहीं, अर्थात् उसकी माता ने वाग्दत्ता होने से पूर्व उसे जन्म दिया था, पश्चात् नहीं—को स्पष्ट करने के लिए जाति बन्धुओं के साक्ष्य का अथवा जन्मपत्री अथवा पिता द्वारा दिये गये उपहार सम्बन्धी उपलब्ध लिखित प्रमाण का सहारा लेना चाहिए। 234 / नारदस्मृति
क्रमाद्वद्धीते प्रपद्येरन्मृते पितरि वा धनम्। ज्यायसो ज्यायसोऽलाभे कनीयान्ऋक्थमर्हति ॥ 49 ॥ सामान्यतया पिता की मृत्यु के उपरान्त ही उसकी सम्पत्ति का भाइयों में विभाजन होता है। पिता के दिवंगत होने पर सभी भाइयों को ज्येष्ठ भाई को पिता का स्थान देना चाहिए, अर्थात् उसके संरक्षण में संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में पूर्ववत् रहना चाहिए। ज्येष्ठ भ्राता के न होने पर अथवा सहमति न होने पर कनिष्ठों द्वारा विभाजन की मांग की जा सकती है। पुत्राभावे तु दुहितातुल्यसन्तानकारणात्। पुत्रश्च दुहिता चोभौ पितुः सन्तानकारकौ ॥ 50 ॥ पुत्र के अभाव में पैतृक सम्पत्ति का स्वामित्व पुत्री को मिलता है; क्योंकि पुत्री भी तो पुत्र के समान ही अपने माता पिता की सन्तान है। टिप्पणी—प्राचीनकाल के स्मृतिकारों की मान्यता और तत्कालीन परम्परा के सन्दर्भ में देवर्षि नारद का पुत्री को पुत्र के समकक्ष स्थान देना और उसे सम्पत्ति की अधिकारिणी मानना एक क्रान्तिकारी दृष्टिकोण ही माना जायेगा। अभावे तु दुहितॄणां सकुल्या बान्धवास्ततः। ततः सजातिः सर्वेषामभावे राजगामि तत् ॥ 51 ॥ लड़कियों के अभाव में मृत व्यक्ति की सम्पत्ति पर उसके परिवार के रक्त- सम्बन्धियों—भाई, भतीजा आदि—उनके अभाव में सपिण्डियों—पिण्डदान और तर्पण करने वाले दूर के सम्बन्धी—दादा-परदादा के भाई-भतीजों के पुत्र-पौत्रादि और उनके भी अभाव में जाति-बन्धुओं—का अधिकार होता है। इन सबके अभाव में ऐसी सम्पत्ति पर राजा का अधिकार होता है। अन्यत्र ब्राह्मणेभ्यः स्याद्राजा धर्मपरायणः। तत् स्त्रीभ्यो जीवनं दद्यादेष दायविधिः स्मृतः ॥ 52 ॥ ब्राह्मणों की सम्पत्ति पर तो राजा को अधिकार नहीं करना चाहिए, उसे किसी धार्मिक संस्था को सौंप देना चाहिए। शेष वर्ण और जाति वालों के उत्तराधिकारियों के न होने पर मृत व्यक्तियों की सम्पत्ति को लेने वाले राजा को उस व्यक्ति से जुड़े लोगों—स्त्री, माता आदि—की रक्षा और भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। धर्मशास्त्र का यही निर्देश और यही मर्यादा है। ॥ चतुर्थ अध्याय का त्रयोदश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 235
- साहस सहसा क्रियते कर्म यत्किञ्चिद्बलदर्पितैः। तत् साहसमिति प्रोक्तं सहो बलमिहोच्यते ॥ 1 ॥ अपने बल और अहंकार के आधार पर बलवान् एवं उद्धत व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले—दूसरों का सर्वस्व हरण, चोरी, डाका, लूट, मार, हत्या, अपमान तथा स्त्रियों के शील भंग आदि—निन्दनीय कार्य 'साहस' कहलाते हैं। साहस शब्द में सह का अर्थ बल है। इस प्रकार जिस कार्य में बल का अनुचित प्रयोग किया जाता है, वह साहस कहलाता है। मनुष्यमारणं स्तेयं परदाराभिमर्शनम्। पारुष्यं द्विविधं ज्ञेयं साहसं च चतुर्विधम्॥ 2 ॥ साहस पांच प्रकार का होता है—1. मनुष्यों की हत्या कर देना, 2. मनुष्यों की धन सम्पत्ति को चुराना अथवा उनसे छीन लेना, 3. दूसरे की स्त्री का शील भंग करना, 4. दूसरों की पिटाई करना तथा 5. दूसरों को गाली-गलौच देना और उन्हें अपमानित करना। टिप्पणी—आजकल साहस का एक अन्य रूप सामने आया है—धन के लिए किसी धनी व्यक्ति का अथवा उसके बेटे-बेटी का अपहरण करके उसे बन्धक बना लेना। तत् पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं प्रथमं मध्यमं तथा। उत्तमं चेति शास्त्रेषु तस्योक्तं लक्षणं पृथक् ॥ 3 ॥ अपनी उग्रता की दृष्टि से साहस तीन प्रकार का होता है—प्रथम, मध्यम और उत्तम। मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में इन तीनों के पृथक्-पृथक् लक्षण दिये हुए हैं। फलमूलोदकादीनां क्षेत्रोपकरणस्य च। भङ्गाक्षेपावमर्दाद्यैः प्रथमं साहसं स्मृतम्॥ 4 ॥ फलों वाले वृक्षों से भरे उपवनों, मूली गाजर, शलगम, आलू, शकरकन्दी आदि साग सब्जियों को उगाने वाले खेतों तथा जल-स्रोतों—नदी-नालों—का उजाड़ना, रौंदना, इन स्थानों पर कार्य करने वालों को आतंकित करके इन स्थानों को उपजहीन बनाना तथा उपज को चुराना, जबरदस्ती छीनना आदि प्रथम स्तर का साहस कहलाता है। 236 / नारदस्मृति
व्यापादो विषशस्त्राद्यैः परदाराभिमर्शनम्।
वासःपश्वन्नपानानां गृहोपकरणस्य च। एतेनैव प्रकारेण मध्यमं साहसं स्मृतम्॥ 5 ॥ वस्त्रों, गाय--भैंस आदि पशुओं, पक्व धान्य तथा दुग्धादि पेयपदार्थों, आवास- भवनों तथा आजीविका के साधन- भूत उपकरणों को हानि पहुंचाना, उन्हें नष्ट-भ्रष्ट करना मध्यम स्तर का साहस है। व्यापादो विषशस्त्राद्यैः परदाराभिमर्शनम्। प्राणोपरोधि यच्चान्यदुक्तमुत्तमसाहसम् ॥ 6 ॥ विष देकर अथवा शस्त्र प्रहार द्वारा मनुष्यों का वध करना, परस्त्रियों से बलात्कार तथा इस प्रकार के उग्र कर्म उत्तम साहस के अन्तर्गत परिगणित हैं। तस्य दण्डः क्रियापेक्षः प्रथमस्य शतावरः। मध्यमस्य तु शास्त्रज्ञैर्दृष्टैः पञ्चशतावरः॥ 7 ॥ यूं तो साहसिक कार्यों का दण्ड कार्य के परिमाण के आधार पर निश्चित किया जाना चाहिए, पुनरपि प्रथम साहस का दण्ड कम-से-कम सौ पण और मध्यम साहस का दण्ड पांच सौ पण वसूल करना चाहिए। उत्तमे साहसे दण्डः सहस्त्रावर इष्यते। वधः सर्वस्वहरणं पुरान्निर्वासनाङ्कने। तदङ्गच्छेद इत्युक्तो दण्ड उत्तमसाहसे॥ 8 ॥ उत्तम साहस का दण्ड कम-से-कम हज़ार पण है। इसके अतिरिक्त दुष्टता की गम्भीरता को देखते हुए साहसिक को मृत्यु-दण्ड, देश-निकाला, उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेना, उसे कोड़े लगवाना, उसका अंग-भंग करना तथा उसके शरीर को गोदवाना व पापी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना आदि दण्ड भी दिये जाने चाहिए। अविशेषेण सर्वेषामेष दण्डविधिः स्मृतः। वधादृते ब्राह्मणस्य न वधं ब्राह्मणोऽर्हति॥ 9 ॥ ब्राह्मण द्वारा भी इस प्रकार के निकृष्ट साहसिक कार्य किये जाने पर उसे मृत्यु-दण्ड के अतिरिक्त उसके कार्य के परिणाम के अनुरूप अन्य सभी प्रकार के दण्ड दिये जा सकते हैं। यह सही है कि ब्राह्मण अवध्य है, परन्तु इससे उसे जघन्य कार्यों के करने की छूट नहीं मिल जाती। शिरसौ मुण्डनं दण्डस्तस्य निर्वासनं पुरात्। ललाटे चाभिशस्ताङ्कः प्रयाणं गर्दभेन च॥ 10 ॥ ब्राह्मण द्वारा निन्दनीय साहसिक कार्य किये जाने पर उसे निम्नोक्त प्रकार से दण्डित किया जाना चाहिए—
- उसका सिर मुंडवा देना चाहिए। (प्राचीनकाल में किसी प्रियजन की नारदस्मृति / 237