भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

द्वावंशौ प्रतिपद्येत विभजन्नात्मनः पिता। समांशभागिनी माता पुत्राणां स्यान्मृते पतौ॥ 12॥ अपने जीवनकाल में, अपनी सम्पत्ति का, अपने पुत्रों में विभाजन करने वाला अपने लिए दो भाग सुरक्षित रख सकता है। पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को पति की सम्पत्ति में से पुत्रों के बराबर एक भाग मिलता है। ज्येष्ठायांशोऽधिको देयः कनिष्ठायावरः स्मृतः। समांशभाजः शेषाः स्युरदत्ता भगिनी तथा॥ 13॥ विभाजन की एक व्यवस्था यह भी है कि ज्येष्ठ भाई को ज्येष्ठ भाग, मध्यम भाई को मध्यम भाग तथा शेष भाइयों को समान भाग दिया जाता है। इस प्रकार के विभाजन में अविवाहित भगिनी का विवाह सम्पन्न करने के लिए एक भाग अलग रख दिया जाता है। क्षेत्रजेष्वपि पुत्रेषु तद्वज्जातेषु धर्मतः। वर्णावरेष्वंशहानिरूढाजातेष्वनुक्रमात् ॥ 14॥ धर्मपूर्वक विभिन्न वर्णों की एकाधिक स्त्रियों से क्षेत्रज आदि पुत्रों के होने पर वर्णों की ऊंच-नीच के अनुसार अंश-हानि होती है। उदाहरणार्थ, एक ब्राह्मण चारों वर्णों की चार स्त्रियों से धर्मपूर्वक विवाह कर सकता है और चारों से एक- एक पुत्र है, तो इस स्थिति में पुरुष को अपनी सम्पत्ति के दस भाग करके चार भाग ब्राह्मणी के पुत्र को, तीन भाग क्षत्रिया के पुत्र को, दो भाग वैश्या के पुत्र को और एक भाग शूद्रा के पुत्र को देना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक ही वर्ण की एकाधिक स्त्रियों के होने पर और सभी स्त्रियों के पुत्रवती होने पर सम्पत्ति का विभाजन विवाह क्रम से करना चाहिए। उदाहरणार्थ, एक राजपुरुष ने तीन क्षत्रिया स्त्रियों से विवाह किया है और तीनों के दो-दो पुत्र हैं, तो उसे अपनी सम्पत्ति के नौ भाग करके सर्वप्रथम विवाहिता को चार भाग, दूसरे स्थान पर विवाहिता को तीन भाग और सबसे अन्त में विवाहिता को दो भाग देने चाहिए। अब उन स्त्रियों के पुत्रों को आपस में उस धन के बराबर भाग लेने का अधिकार है। इस प्रकार बहुविवाह की स्थिति में विभाजन का एक आधार वर्ण है और दूसरा आधार वरीयता है। पित्रैव तु विभक्ता ये हीनाधिकसमैर्धनैः। तेषां स एव धर्मः स्यात् सर्वस्य हि पिता प्रभुः॥ 15॥ पुत्रों को अपने पिता द्वारा प्रदत्त अधिक अथवा न्यून अथवा समान धन को अन्तिम रूप से मान्य करके ग्रहण करना चाहिए। उस पर आपत्ति अथवा आक्षेप नहीं करना चाहिए; क्योंकि पिता को यह सब करने का पूरा-पूरा अधिकार है। व्याधितः कुपितश्चैव विषयासक्तमानसः। अन्यथाशास्त्रकारी च न विभागे पिता प्रभुः॥ 16॥ नारदस्मृति / 227