नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिम्नोक्त विकारों से ग्रस्त पिता द्वारा अपनी सम्पत्ति का किया गया विभाजन अन्तिम एवं मान्य नहीं होता - 1. रोग-ग्रस्त, 2. स्वभाव से क्रोधी और चिड़चिड़ा, 3. विषयी - मदिरासेवन, द्यूत-क्रीड़ा तथा वेश्यागमन आदि विषयों में आसक्त अथवा किसी अन्य स्त्री में अनुरक्त तथा 4. शास्त्र मर्यादा का पालन न करने वाला। कानीनश्च सहोढश्च गूढायां यश्च जायते। तेषां वोढा पिता श्रेयस्ते च भागहराः स्मृताः ॥ 17 ॥ निम्नोक्त तीन प्रकार के पुत्रों वाली स्त्री, जिस भी पुरुष से विवाह करती है, वे बालक उसकी सम्पत्ति में से अपना भाग पाने के अधिकारी होते हैं, 1. कानीन- अविवाहिता कन्या द्वारा जना गया, 2. सहोढ़ - पूर्व से गर्भवती स्त्री का विवाह हो जाने के उपरान्त उत्पन्न तथा 3. गूढ़ज - गुप्त रूप से जना। टिप्पणी - 'विवाह रत्नाकर' ग्रन्थ के लेखक तथा मनु, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि स्मृतिकारों के अनुसार-नाना के पुत्रहीन होने पर 'कानीन' और 'सहोढ़' पुत्रों पर उस (नाना) का ही अधिकार होता है। नाना के पुत्रवान् होने पर उन पुत्रों पर कन्या से विवाह करने वाले का अधिकार होता है। दोनों-नाना (कन्या के पिता) और कन्या से विवाह करने वाले के निपूता होने पर उन दोनों प्रकार के पुत्रों पर दोनों का समान अधिकार है- "अत्रापुत्रो यदि मातामहस्तदा तस्य पुत्रः कानीनः सहोढश्च । सपुत्र- श्चेत्तदा वोढुः उभयोर्पुत्रत्वे चोभयोरिति पारिजातः ।" किन्हीं स्मृतिकारों ने वाग्दत्ता, परन्तु अविवाहिता कन्या के गर्भवती हो जाने और विवाह के उपरान्त जन्म दिये जाने वाले पुत्र को कानीन माना है। दोनों में एक अन्य अन्तर यह माना है कि कानीन के पिता का नाम ज्ञात नहीं होता और सहोढ़ के पिता का नाम ज्ञात होता है। अभिप्राय यह है कि वह अपने पिता - गर्भवती स्त्री से विवाह करने वाले-का ही पुत्र होता है। दोनों अपने पर संयम न रख पाने के कारण विवाह से पूर्व रति-भोग में प्रवृत्त हो जाते हैं। कन्या गर्भवती हो जाती है और पुरुष इस गर्भ को अपना ही रक्त जानकर सगर्भा से विवाह कर लेता है। अज्ञातपितृको यश्च कानीनोऽनूढमातृकः । मातामहाय दद्यात् स पिण्डं रिक्थं हरेत च ॥ 18 ॥ यदि कानीन पुत्र को जनने वाली कन्या का विवाह नहीं होता और उसका पिता भी उसे ग्रहण करने को प्रस्तुत नहीं होता, अर्थात् वह अपने को प्रकाश में नहीं लाता, तो ऐसा पुत्र नाना का ही पुत्र होता है, वह नाना का ही पिण्डदान करता है और उसकी सम्पत्ति से ही अपना भाग प्राप्त करता है। जाता ये त्वनियुक्तायामेकेन बहुभिस्तथा । आरिक्थभाजः सर्वे स्युर्बीजिनामेव ते सुताः ॥ 19 ॥ 228 / नारदस्मृति