नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिता के जीवनकाल में सम्पत्ति के विभाजन के उपरान्त उत्पन्न होने वाले बालक को विभक्त हो गये भाइयों से कुछ मांगने का कोई अधिकार नहीं। उसे तो केवल पिता के भाग पर अथवा पिता के साथ रह रहे भाइयों के साथ विभाजन का अधिकार है। औरसः क्षेत्रजश्चैव पुत्रिकापुत्र एव च। कानीनश्च सहोढश्च गूढोत्पन्नस्तथैव च ॥ 45 ॥ पौनर्भवोऽपविद्धश्च लब्धः क्रीतः कृतकस्तथा। स्वयं चोपगतः पुत्रा द्वादशैष उदाहृताः ॥ 46 ॥ निम्नोक्त बारह प्रकार के पुत्र होते हैं—1. औरस, 2. क्षेत्रज, 3. पुत्रिका-पुत्र, 4. कानीन, 5. सहोढ, 6. गूढोत्पन्न, 7. पौनर्भव, 8. अपविद्ध, 9. लब्ध, 10. क्रीत, 11. कृतक तथा 12. स्वयमागत। एषां षड् बन्धुदायादाः षड्दायादबान्धवाः। पूर्वः पूर्वः स्मृतः श्रेयाञ्जघन्यो यो य उत्तरः ॥ 47 ॥ उपर्युक्त बारह प्रकार के पुत्रों में प्रथम छह—औरस, क्षेत्रज, पुत्रिका-पुत्र, कानीन, सहोढ़ और गूढ़ोत्पन्न—पैतृक सम्पत्ति में दाय-भाग पाने के अधिकारी हैं। इसके विपरीत परवर्ती छह—पौनर्भव, अपविद्ध, लब्ध, क्रीत, कृतक तथा स्वयमागत—पैतृक दाय को पाने के अधिकारी नहीं हैं। इसके अतिरिक्त बारह में पूर्व-पूर्व, अर्थात् स्वयमागत से कृतक, उससे क्रीत, उसकी अपेक्षा लब्ध, उससे अपविद्ध, उससे पौनर्भव, उससे गूढ़ोत्पन्न, उससे सहोढ़, उससे कानीन, उससे पुत्रिका-पुत्र, उससे क्षेत्रज और उससे भी औरस श्रेष्ठ हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तरोत्तर—औरस से क्षेत्रज व उससे पुत्रिका-पुत्र आदि जघन्य हैं। छिन्नभागे गृहक्षेत्रे सन्देहो यत्र जायते। लेख्येन भोगविद्भिर्वा साक्षिभिर्वा समाहरेत् ॥ 48 ॥ भाइयों में से किसी के भाग के काटे जाने पर अथवा घर और क्षेत्रादि के अधिकार आदि के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न हो जाने पर जानकार जाति-बन्धुओं के साक्ष्य से तथा उपलब्ध लिखित प्रमाणों से तथ्य को सुनिश्चित करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि यदि पुत्रिका-पुत्र को कानीन मानकर उसे अधिकार से वञ्चित कर दिया जाता है, तो सम्बद्ध बालक को अपनी स्थिति—वह पुत्रिका-पुत्र है, कानीन नहीं, अर्थात् उसकी माता ने वाग्दत्ता होने से पूर्व उसे जन्म दिया था, पश्चात् नहीं—को स्पष्ट करने के लिए जाति बन्धुओं के साक्ष्य का अथवा जन्मपत्री अथवा पिता द्वारा दिये गये उपहार सम्बन्धी उपलब्ध लिखित प्रमाण का सहारा लेना चाहिए। 234 / नारदस्मृति