भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 304 में से

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बंटवारा हो जाने के उपरान्त, अलग अलग रहने वाले भाई एक-दूसरे के लेन-देन के साक्षी, प्रतिभू (ज़ामिन--लेने वाले द्वारा समय पर भुगतान न करने पर मैं उसे विवश करूंगा, अन्यथा उसके स्थान पर स्वयं भुगतान करूंगा-ऐसी प्रतिज्ञा ज़मानत कहलाती है और ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला ज़ामिन कहलाता है !) लेने वाले और देने वाले बन सकते हैं, परन्तु संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में रहने वाले भाई ऐसा नहीं कर सकते। वे न तो एक दूसरे से लेन देन कर सकते हैं और न ही लेन-देन के गवाह अथवा ज़ामिन बन सकते हैं; क्योंकि वे दो न होकर एक ही हैं। विभक्त होने पर वे एक से दो बन जाते हैं। येषामेताः क्रिया लोके प्रवर्तन्ते स्वरिक्थिनाम्। विभक्ता भ्रातरस्ते तु विज्ञेया इति निश्चयः ॥ 40 ॥ एक-दूसरे से ऋण का लेन देन करने वाले तथा एक-दूसरे के साक्षी और ज़ामिन बनने वाले भाइयों को निश्चित रूप से विभक्त हो गया समझना चाहिए। वसेयुर्ये दशाब्दानि पृथग् धर्माः पृथक् क्रियाः। विभक्ता भ्रातरस्ते तु विज्ञेया इति निश्चयः ॥ 41 ॥ दस वर्षों से अलग रह रहे, अलग से व्यापार-धन्धा कर रहे तथा अलग से अपने-अपने धर्म कर्म का निर्वहण कर रहे भाइयों को निश्चित रूप से विभक्त हो गया ही समझना चाहिए। यद्येकजाता बहवः पृथग्धर्माः पृथक् क्रियाः। पृथक्कर्मगुणोपेता न ते कृत्येषु सम्मताः ॥ 42 ॥ स्वान्भागान्यदि दद्युस्ते विक्रीणीरनथापि वा। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य तु ॥ 43 ॥ एक ही माता-पिता से उत्पन्न भाई अपने गुणों और रुचियों के कारण भिन्न- भिन्न व्यवसाय (कोई नौकरी, कोई कृषि, कोई व्यापार और कोई उद्योग आदि) अपनाते हैं, अर्थात् एक साथ मिलकर एक ही कार्य-व्यापार को अपनाने को सहमत नहीं होते, तो पैतृक सम्पत्ति में से उनका भाग उन्हें दे देना चाहिए, भले ही वे अपने भाग में प्राप्त सम्पत्ति को दान में दे दें, बेच दें, गिरवी रख दें अथवा भाड़ में झोंक दें--इस बात की चिन्ता किसी को करनी ही नहीं चाहिए। सबको इस तथ्य को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि भाग लेने वाला अपनी सम्पत्ति का स्वामी है और उसे अपनी सम्पत्ति को अपनी इच्छानुसार ख़र्च करने का पूर्ण अधिकार है। अतः किसी सोच विचार में पड़े बिना, सभी भाइयों को बैठकर अपना-अपना भाग संभाल लेना चाहिए। ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम्। संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥ 44 ॥ नारदस्मृति / 233

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