भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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करनी चाहिए, अर्थात् इस सम्बन्ध में अपेक्षित धन को अलग रखकर ही बंटवारा करना चाहिए। अविद्यमाने पित्र्यर्थे स्वांशादुद्धृत्य वा पुनः। अवश्यकार्याः संस्कारा भ्रातृणां पूर्वसंस्कृतैः ॥ ३४ ॥ पैतृक सम्पत्ति न होने पर पिता के जीवनकाल में संस्कृत-विद्या प्राप्त- भाइयों को अपने ही साधनों से असंस्कृत भाइयों को संस्कृत करने-शिक्षा-दीक्षा दिलाने-की व्यवस्था करनी चाहिए। कुटुम्बार्थेषु यश्चोक्तस्तत्कार्यं कुरुते च यः। भ्रातृभिर्भरणीयोऽसौ ग्रासाच्छादनवाहनैः ॥ ३५ ॥ अपने परिवार के यश, अभ्युदय तथा कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले भाई के वृत्तिहीन होने पर, उसके दूसरे भाइयों को उसके तथा उसके परिवारजनों के भरण-पोषण की तथा वाहन आदि जुटाने की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। यह उनका कर्तव्य-कर्म बनता है। विभागधर्मसन्देहे दायादानां विनिर्णयः। ज्ञातिभिर्भागलेख्यैश्च पृथक्कार्यप्रवर्तनात् ॥ ३६ ॥ दाय-भाग में किसी प्रकार के सन्देह अथवा पक्षपात की आशंका के उत्पन्न हो जाने पर, आपसी विवाद को निपटाने-सुलझाने के लिए जाति-बन्धुओं को मध्यस्थ बनाना चाहिए अथवा लिखित दस्तावेजों के साक्ष्य को आधार बनाना चाहिए। भ्रातॄणामविभक्तानामेको धर्मः प्रवर्त्तते। विभागे सति धर्मो हि तेषां भवेत् पृथक् पृथक् ॥ ३७ ॥ अविभक्त, अर्थात् संयुक्त परिवार के रूप में रहने वाले भाइयों का एक ही धर्म है, अर्थात् परिवार की मर्यादा एवं प्रतिष्ठा की रक्षा करना सभी भाइयों का समान दायित्व है। एक के द्वारा किये गये किसी कर्म का परिणाम सभी सदस्यों को समान रूप से भुगताने पड़ता है। हां, विभाजन के उपरान्त सभी अपने-अपने किये के उत्तरदायी होते हैं। सबका धर्म पृथक्-पृथक् हो जाता है। दानग्रहणपश्वन्नगृहक्षेत्रपरिग्रहाः । विभक्तानां पृथग् ज्ञेयाः पाकधर्मागमव्ययाः ॥ ३८ ॥ भाइयों के विभक्त हो जाने के उपरान्त लेन देन, पशु, धन, अन्न, गृह, क्षेत्र, जमापूंजी, खान पान तथा आय-व्यय आदि सभी कुछ अलग-अलग और अपना- अपना होता है। एक का लाभ हानि उसी एक का होता है, दूसरे का नहीं। साक्षित्वं प्रातिभाव्यं च दानं ग्रहणमेव च। विभक्ता भ्रातरः कुर्युर्नाविभक्ताः परस्परम् ॥ ३९ ॥ 232 / नारदस्मृति