नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रमाद्वद्धीते प्रपद्येरन्मृते पितरि वा धनम्। ज्यायसो ज्यायसोऽलाभे कनीयान्ऋक्थमर्हति ॥ 49 ॥ सामान्यतया पिता की मृत्यु के उपरान्त ही उसकी सम्पत्ति का भाइयों में विभाजन होता है। पिता के दिवंगत होने पर सभी भाइयों को ज्येष्ठ भाई को पिता का स्थान देना चाहिए, अर्थात् उसके संरक्षण में संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में पूर्ववत् रहना चाहिए। ज्येष्ठ भ्राता के न होने पर अथवा सहमति न होने पर कनिष्ठों द्वारा विभाजन की मांग की जा सकती है। पुत्राभावे तु दुहितातुल्यसन्तानकारणात्। पुत्रश्च दुहिता चोभौ पितुः सन्तानकारकौ ॥ 50 ॥ पुत्र के अभाव में पैतृक सम्पत्ति का स्वामित्व पुत्री को मिलता है; क्योंकि पुत्री भी तो पुत्र के समान ही अपने माता पिता की सन्तान है। टिप्पणी—प्राचीनकाल के स्मृतिकारों की मान्यता और तत्कालीन परम्परा के सन्दर्भ में देवर्षि नारद का पुत्री को पुत्र के समकक्ष स्थान देना और उसे सम्पत्ति की अधिकारिणी मानना एक क्रान्तिकारी दृष्टिकोण ही माना जायेगा। अभावे तु दुहितॄणां सकुल्या बान्धवास्ततः। ततः सजातिः सर्वेषामभावे राजगामि तत् ॥ 51 ॥ लड़कियों के अभाव में मृत व्यक्ति की सम्पत्ति पर उसके परिवार के रक्त- सम्बन्धियों—भाई, भतीजा आदि—उनके अभाव में सपिण्डियों—पिण्डदान और तर्पण करने वाले दूर के सम्बन्धी—दादा-परदादा के भाई-भतीजों के पुत्र-पौत्रादि और उनके भी अभाव में जाति-बन्धुओं—का अधिकार होता है। इन सबके अभाव में ऐसी सम्पत्ति पर राजा का अधिकार होता है। अन्यत्र ब्राह्मणेभ्यः स्याद्राजा धर्मपरायणः। तत् स्त्रीभ्यो जीवनं दद्यादेष दायविधिः स्मृतः ॥ 52 ॥ ब्राह्मणों की सम्पत्ति पर तो राजा को अधिकार नहीं करना चाहिए, उसे किसी धार्मिक संस्था को सौंप देना चाहिए। शेष वर्ण और जाति वालों के उत्तराधिकारियों के न होने पर मृत व्यक्तियों की सम्पत्ति को लेने वाले राजा को उस व्यक्ति से जुड़े लोगों—स्त्री, माता आदि—की रक्षा और भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। धर्मशास्त्र का यही निर्देश और यही मर्यादा है। ॥ चतुर्थ अध्याय का त्रयोदश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 235