संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११७ क्षीरस्नानेन यत्पुण्यं दध्ना च मधुना तथा। प्राप्त होता है तथा दूध, दही, मधु, घी एवं पञ्चगव्यद्वारा घृतस्नानेन यत्पुण्यं पञ्चगव्येन यद्भवेत् ॥ ३ स्नान करानेसे क्या पुण्य होता है ? भगवान्की प्रतिमाको क्षालिते चोष्णतोयेन प्रतिमायां च भक्तितः। गर्म जलसे भक्तिपूर्वक स्नान करानेपर तथा कर्पूर और कर्पूरागुरुतोयेन मिश्रेण स्नापितेन च ॥ ४ अगुरु मिले हुए जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य अर्घ्यदानेन यत्पुण्यं पाद्याचमनदानके। प्राप्त होता है ? भगवान्को अर्घ्य देनेसे, पाद्य और मन्त्रेण स्नापिते यच्च वस्त्रदानेन यद्भवेत् ॥ ५ आचमन अर्पण करनेसे, मन्त्रोच्चारणपूर्वक नहलानेसे श्रीखण्डकुङ्कुमाभ्यां तु अर्चिते किं फलं भवेत्। और वस्त्र-दान करनेसे क्या पुण्य होता है ? ॥ १—५ ॥ पुष्पैर्अभ्यर्चिते यच्च यत्फलं धूपदीपयोः ॥ ६ चन्दन और केसरद्वारा पूजा करनेपर तथा फूलोंसे नैवेद्यैर्यत्फलं प्रोक्तं प्रदक्षिणकृते तु यत्। पूजा करनेपर क्या फल होता है ? तथा धूप और दीप नमस्कारकृते यच्च फलं यत्स्तोत्रगीतयोः ॥ ७ देनेका क्या फल है ? नैवेद्य निवेदन करनेका और तालवृन्तप्रदानेन चामरस्य च यद्भवेत्। प्रदक्षिणा करनेका क्या फल है ? इसी प्रकार नमस्कार ध्वजप्रदाने यद्विष्णोः शङ्खदानेन यद्भवेत् ॥ ८ करनेसे एवं स्तुति और यशोगान करनेसे कौन-सा फल एतच्चान्यच्च यत्किंचिदज्ञानान्न प्रचोदितम्। प्राप्त होता है ? भगवान् विष्णुके लिये पंखा दान करने, तत्सर्वं कथय ब्रह्मन् भक्तस्य मम केशवे ॥ ९ चँवर प्रदान करने, ध्वजाका दान करने और शङ्ख-दान सूत उवाच करनेसे क्या फल होता है ? ब्रह्मन् ! मैंने जो कुछ पूछा इति सम्प्रेरितो विप्रस्तेन राज्ञा भृगुस्तदा। है, वह तथा अज्ञानवश मैंने जो नहीं पूछा है, वह सब मार्कण्डेयं नियुज्याथ कथने स गतो मुनिः ॥ १० भी मुझसे कहिये; क्योंकि भगवान् केशवके प्रति मेरी सोऽपि तस्मिन् मुदायुक्तो हरिभक्त्या विशेषतः। हार्दिक भक्ति है ॥ ६—९ ॥ राज्ञे प्रवक्तुमारेभे भृगुणा चोदितो मुनिः ॥ ११ सूतजी बोले—राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे ब्रह्मर्षि मार्कण्डेय उवाच भृगु मुनि मार्कण्डेयजीको उत्तर देनेके लिये नियुक्त करके राजपुत्र शृणुष्वेदं हरिपूजाविधिं क्रमात्। स्वयं चले गये। भृगुजीकी प्रेरणासे मुनिवर मार्कण्डेयजीने विष्णुभक्तस्य वक्ष्यामि तवाहं पाण्डुवंशज ॥ १२ राजापर उनकी हरिभक्तिसे विशेष प्रसन्न होकर उनके प्रति नरसिंहस्य नित्यं च यः सम्मार्जनमारभेत्। इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ १०-११ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके स मोदते ॥ १३ मार्कण्डेयजी बोले—पाण्डुकुलनन्दन राजकुमार ! गोमयेन मृदा तोयैर्यः करोत्युपलेपनम्। भगवान् विष्णुकी इस पूजा-विधिको क्रमशः सुनो; तुम स चाक्षयफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते ॥ १४ विष्णुके भक्त हो, अतः मैं तुम्हें यह सब बताऊँगा। जो अत्रार्थे यत्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम्। भगवान् नरसिंहके मन्दिरमें नित्य झाडू लगाता है, वह सब यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तिर्भवति सत्तम ॥ १५ पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो पुरा युधिष्ठिरो राजा पञ्चभिर्भ्रातृभिर्युतः। गोबर, मिट्टी तथा जलसे वहाँकी भूमि लीपता है, वह द्रौपद्या सह राजेन्द्र काननं विचचार ह ॥ १६ अक्षय फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सत्तम ! इस विषयमें एक प्राचीन सत्य इतिहास है, जिसे सुनकर सब पापोंसे मुक्ति मिल जाती है ॥ १२-१५ ॥ राजेन्द्र ! पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा अपने पाँच भाइयोंके साथ वनमें विचरते थे। घूमते- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth