भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 318 में से

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पृष्ठ 127

११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ प्रतिष्ठां नरसिंहस्य यः करोति यथाविधि । नरश्रेष्ठ! जो निष्कामभावसे नृसिंहदेवकी विधिवत् प्रतिष्ठा निष्कामो नरशार्दूल देहबाधात् प्रमुच्यते ॥ १४ करता है, वह दैहिक दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। जो नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य यः पूजामाचरेन्नरः । भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके सदा उनकी पूजा तस्य कामाः प्रसिध्यन्ति परमं पदमाप्नुयात् ॥ १५ करता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा वह परम ब्रह्मादयः सुराः सर्वे विष्णुमाराध्य ते पुरा। पदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मादि सभी देवता पूर्वकालमें स्वं स्वं पदमनुप्राप्ताः केशवस्य प्रसादतः ॥ १६ भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनके प्रसादसे अपने- ये ये नृपवरा राजन् मान्धातृप्रमुखा नृपाः । अपने लोकको प्राप्त हुए थे। राजन्! मांधाता आदि जो- ते ते विष्णुं समाराध्य स्वर्गलोकमितो गताः ॥ १७ जो प्रधान नरेश हो गये हैं, वे सभी भगवान् विष्णुकी यस्तु पूजयते नित्यं नरसिंहं सुरेश्वरम् । आराधना करके यहाँसे स्वर्गलोकको चले गये। जो स स्वर्गमोक्षभागी स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १८ सुरेश्वर नृसिंहका प्रतिदिन पूजन करता है, वह स्वर्ग तस्मादेकमना भूत्वा यावज्जीवं प्रतिज्ञया। और मोक्षका भागी होता है—इसमें अन्यथा विचार अर्चनान्नरसिंहस्य प्राप्स्यसे स्वाभिवाञ्छितम् ॥ १९ करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये तुम भी प्रतिज्ञापूर्वक विधिवत्स्थापयेद्यस्तु कारयित्वा जनार्दनम् । एकचित्त होकर जीवनपर्यन्त भगवान् नृसिंहकी पूजा न तु निर्गमनं तस्य विष्णुलोकाद् भवेन्नृप ॥ २० करते हुए अपना मनोरथ प्राप्त करोगे। नृप! जो भगवान् नरो नृसिंहं तमनन्तविक्रमं जनार्दनकी प्रतिमा बनवाकर विधिवत् उसकी स्थापना सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजम् । करता है, उसका विष्णुलोकसे कभी निष्क्रमण नहीं संस्थाप्य भक्त्या विधिवच्च पूजयेत् होता। यदि मनुष्य उन अनन्त विक्रमशाली भगवान् प्रयाति साक्षात् परमेश्वरं हरिम् ॥ २१ नरसिंहकी, जिनके चरण-कमलोंकी देवता तथा असुर, दोनों ही पूजा करते हैं, विधिवत् स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करे तो वह साक्षात् परमेश्वर भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२–२१ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥ तैंतीसवाँ अध्याय भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल—राजा जयध्वजकी कथा राजोवाच राजा बोले—भगवान्! मैं आपके प्रसादसे भगवान्‌के हरेरर्चाविधिं पुण्यां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । पूजनकी पावन विधिको विशेषरूपसे यथावत् सुनना त्वत्प्रसादाद्विशेषेण भगवन् प्रब्रवीहि मे ॥ १ चाहता हूँ; कृपया आप मुझे विस्तारसे बतायें। भगवान् सम्मार्जनकरो यश्च नरसिंहस्य मन्दिरे । नृसिंहके मन्दिरमें जो झाडू देता है वह तथा जो उसे यत्पुण्यं लभते तद्वदुपलेपनकृन्नरः ॥ २ लीपता-पोतता है, वह पुरुष किस पुण्यको प्राप्त करता शुद्धोदकेन यत्पुण्यं स्नापिते केशवे भवेत् । है? केशवको शुद्ध जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth