संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३२ ] सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य ११५ बत्तीसवाँ अध्याय सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य भरद्वाज उवाच सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च शार्ङ्गिणः। साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वद महामते॥ १ सूत उवाच हन्त ते कथयिष्यामि चरितं तस्य धीमतः। सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च मे शृणु॥ २ सहस्रानीकोऽभिषिक्तो निजराज्ये द्विजोत्तमैः। पालयामास धर्मेण राज्यं स तु नृपात्मजः॥ ३ तस्य पालयतो राज्यं राजपुत्रस्य धीमतः। भक्तिर्बभूव देवेशे नरसिंहे सुरोत्तमे॥ ४ तं द्रष्टुमागतः साक्षाद्विष्णुभक्तं भृगुः पुरा। अर्घ्यपाद्यासनै राजा तमभ्यर्च्यब्रवीदिदम्॥ ५ पावितोऽहं मुनिश्रेष्ठ साम्प्रतं तव दर्शनात्। त्वद्दर्शनमपुण्यानां कलावस्मिन् सुदुर्लभम्॥ ६ नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य देवदेवं सनातनम्। आराधयितुमिच्छामि विधानं तत्र मे वद॥ ७ अवतारांनशेषांश्च देवदेवस्य चक्रिणः। श्रोतुमिच्छामि सकलांस्तान् पुण्यानपि मे वद॥ ८ भृगुरुवाच शृणु भूपालपुत्र त्वं न हि कश्चित् कलौ युगे। हरौ भक्तिं करोत्यत्र नृसिंहे चातिभक्तिमान्॥ ९ स्वभावाद्यस्य भक्तिः स्यान्नरसिंहे सुरोत्तमे। तस्यारयः प्रणश्यन्ति कार्यसिद्धिश्च जायते॥ १० त्वमतीव हरेर्भक्तः पाण्डुवंशेऽपि सत्तमः। तेन ते निखिलं वक्ष्ये शृणुष्वैकाग्रमानसः॥ ११ यः कुर्याच्छोभनं वेश्म नरसिंहस्य भक्तिमान्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १२ प्रतिमां लक्षणोपेतां नरसिंहस्य कारयेत्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १३ भरद्वाजजी बोले—सूतजी! अब मैं सहस्रानीकका चरित्र और भगवान् विष्णुके अवतारोंकी कथा सुनना चाहता हूँ; महामते! कृपा करके वह मुझसे कहिये॥ १॥ सूतजीने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा, अब मैं बुद्धिमान् सहस्रानीकके चरित्रका और भगवान्के अवतारोंका वर्णन करूँगा, सुनिये॥ २॥ राजकुमार सहस्रानीकको जब उत्तम ब्राह्मणोंने उसके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया, तब वे धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगे। राज्यके पालनमें लगे हुए बुद्धिमान् राजकुमारकी देवेश्वर, देवश्रेष्ठ भगवान् नृसिंहमें भक्ति हो गयी। पूर्वकालमें एक बार उन विष्णुभक्त नरेशका दर्शन करनेके लिये स्वयं भृगुजी आये। राजाने अर्घ्य, पाद्य और आसनादिके द्वारा भृगुजीका सम्मान करके उनसे यह कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस समय मैं आपके दर्शनसे पवित्र हो गया। जिन्होंने पुण्य नहीं किया है, ऐसे मनुष्योंके लिये इस कलियुगमें आपका दर्शन परम दुर्लभ है। मैं सनातन देवदेव नरसिंहकी स्थापना करके उनकी आराधना करना चाहता हूँ, आप कृपया मुझे इसका विधान बतायें। तथा मैं देवदेव श्रीहरिके सम्पूर्ण अवतारोंको भी सुनना चाहता हूँ; अतः आप उन सभी पुण्यावतारोंकी कथा मुझसे कहिये'॥ ३—८॥ भृगुजी बोले—राजकुमार! सुनो; इस कलियुगमें कोई भी भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखकर उनकी आराधना नहीं कर रहा है। देववर भगवान् नृसिंहमें जिसकी स्वभावतः भक्ति हो जाती है, उसके सारे शत्रु नष्ट हो जाते हैं और उसे प्रत्येक कार्यमें सिद्धि प्राप्त होती है। इस पाण्डुवंशमें तुम ही श्रेष्ठ पुरुष और भगवान्के अत्यन्त भक्त हो; अतः तुमसे मैं तुम्हारी पूछी हुई सब बातें बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ९—११॥ जो भक्तिपूर्वक नृसिंहदेवका सुन्दर मन्दिर निर्माण कराता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान पाता है। जो भगवान् नृसिंहकी सुन्दर लक्षणोंसे युक्त प्रतिमा बनवाता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पाकर विष्णुलोकको जाता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth