भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 318 में से

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पृष्ठ 125

१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१

स्वभावात् तपति विप्रेन्द्र अधश्चोर्ध्वं च रश्मिभिः। | विप्रवर ! सूर्यदेव स्वभावतः अपनी किरणोंद्वारा नीचे कालसंख्यां त्रिलोकस्य स करोति युगे युगे ॥ १०६ | तथा ऊपरके लोकोंमें ताप पहुँचाते हैं। वे ही प्रत्येक युगमें जनस्तपस्तथा सत्यमेतांल्लोकान् द्विजोत्तम। | त्रिभुवनकी कालसंख्या निश्चित करते हैं। द्विजोत्तम ! ब्रह्मणा मुनिशार्दूल विष्णुभक्तिविवर्धितः ॥ १०७ | मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजीके द्वारा विष्णुभक्तिसे अभ्युदयको प्राप्त ऊर्ध्वगतैर्द्विजश्रेष्ठ रश्मिभिस्तपते रविः। | होकर सूर्य अपनी ऊर्ध्वगत किरणोंसे ऊपरके जन, तप अधोगतैश्च भूर्लोकं द्योतते दीर्घदीधितिः ॥ १०८ | तथा सत्य लोकोंमें गर्मी पहुँचाते हैं और अधोगत किरणोंसे सर्वपापहरः सूर्यः कर्ता त्रिभुवनस्य च। | भूलोकको प्रकाशित करते हैं ॥ १०६-१०८ ॥ छत्रवत् प्रतिपश्येत मण्डलान्मण्डलं परम् ॥ १०९ | समस्त पापोंको हरनेवाले सूर्यदेव त्रिभुवनकी सृष्टि आदित्यमण्डलाधस्ताद् भुवर्लोकं प्रतिष्ठितम्। | करते हैं। वे छत्रकी भाँति स्थित हो एक मण्डलसे दूसरे त्रैलोक्यस्येश्वरत्वं च विष्णुदत्तं शतक्रतोः ॥ ११० | मण्डलको दर्शन देते और प्रकाशित करते हैं। सूर्यमण्डलके लोकपालैः स सहितो लोकान् रक्षति धर्मतः। | नीचे भुवर्लोक प्रतिष्ठित है। तीनों भुवनोंका आधिपत्य वसेत् स्वर्गे महाभाग देवेन्द्रः स तु कीर्तिमान् ॥ १११ | भगवान् विष्णुने शतक्रतु इन्द्रको दे रखा है। वे समस्त ततोऽधस्तान्मुने चेदं पातालं विद्धि सप्रभम्। | लोकपालोंके साथ धर्मपूर्वक लोकोंकी रक्षा करते हैं। न तत्र तपते सूर्यो न रात्रिर्न निशाकरः ॥ ११२ | महाभाग ! वे यशस्वी देवेन्द्र स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दिव्यस्वरूपमास्थाय तपन्ति सततं जनाः। | मुने ! इन सात लोकोंसे नीचे यह प्रभापूर्ण पाताललोक स्थित पातालस्था द्विजश्रेष्ठ दीप्यमानाः स्वतेजसा ॥ ११३ | है, ऐसा आप जानें। वहाँ न सूर्यका ताप है, न चन्द्रमाका स्वर्लोकात्तु महर्लोकः कोटिमात्रे व्यवस्थितः। | प्रकाश, [न दिन है] न रात। द्विजश्रेष्ठ ! पातालवासी जन ततो योजनमात्रेण द्विगुणो मण्डलेन तु ॥ ११४ | दिव्यरूप धारण करके सदा अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए जनलोकः स्थितो विप्र पञ्चमो मुनिसेवितः। | तपते हैं। स्वर्गलोकसे करोड़ योजन ऊपर महर्लोक स्थित तत्रोपरि तपोलोकश्चतुर्भिः कोटिभिः स्थितः ॥ ११५ | है। हे विप्र ! उससे दूने दो करोड़ योजनपर मुनिसेवित सत्यलोकोऽष्टकोटीभिस्तपोलोकोपरिस्थितः। | जनलोक, जो पाँचवाँ लोक है, स्थित है। उससे चार करोड़ सर्वे छात्राकृतिज्ञेया भुवनोपरिसंस्थिताः ॥ ११६ | योजन ऊपर तपोलोककी स्थिति है। तपोलोकसे ऊपर ब्रह्मलोकाद्विगुलोको द्विगुणश्च व्यवस्थितः। | आठ करोड़ योजनपर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) स्थित है। ये वाराहे तस्य माहात्म्यं कथितं लोकचिन्तकैः ॥ ११७ | सभी भुवन एक-दूसरेके ऊपर छत्रकी भाँति स्थित हैं। ततः परं द्विजश्रेष्ठ स्थितः परमपूरुषः। | ब्रह्मलोकसे सोलह करोड़ योजनपर विष्णुलोककी स्थिति ब्रह्माण्डात् परमः साक्षान्निर्लेपः पुरुषः स्थितः ॥ ११८ | है। लोकचिन्तकोंने वाराहपुराणमें उसके माहात्म्यका वर्णन पशुपाशैर्विमुच्येत तपोज्ञानसमन्वितः। | किया है। द्विजश्रेष्ठ ! इसके आगे परम पुरुषकी स्थिति है, इति ते संस्थितिः प्रोक्ता भूगोलस्य मयानघ। | जो ब्रह्माण्डसे विलक्षण साक्षात् परमात्मा हैं। इस प्रकार यस्तु सम्यगिमां वेत्ति स याति परमां गतिम् ॥ ११९ | जाननेवाला मनुष्य तप और ज्ञानसे युक्त होकर पशुपाश लोकस्य संस्थानकरोऽप्रमेयो | (अविद्या-बन्धन)-से मुक्त हो जाता है॥ १०९-११८१/२॥ विष्णुर्नृसिंहो नरदेवपूजितः। | अनघ ! इस प्रकार मैंने तुम्हें भूगोलकी स्थिति बतलायी। युगे युगे विष्णुरनादिमूर्तिमा- | जो पुरुष सम्यक् प्रकारसे इसका ज्ञान रखता है, वह परम नास्थाय विश्वं परिपाति दुष्टहा ॥ १२० | गतिको प्राप्त होता है। मनुष्यों और देवताओंसे पूजित | नृसिंहस्वरूप अप्रमेय भगवान् विष्णु लोककी रक्षा करनेवाले | हैं। वे अनादि मूर्तिमान् परमेश्वर प्रत्येक युगमें शरीर धारणकर | दुष्टोंका वध करके विश्वका पालन करते हैं॥ ११९-१२०॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

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